Friday, March 26, 2021

प्रतिरोध के प्रति उदासीन जनता अपना ही बेड़ा गर्क करती है

साथी हिमांशु कुमार गांधीवादी चिंतक तथा सामाजिक कार्यकर्ता हैं । जनता के काफी निकट और पक्षधर होकर भी वास्तविक सच को नकारते नहीं । वे कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में क‌ई नामचीन हस्तियों का जो हश्र हुआ उसके लिए कोई सरकार या सत्ता कि विपक्षी राजनीतिक दल दोषी नहीं थे । जिसे वे एक  सामान्य सी कहानी के माध्यम से साफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं । वस्तुत: हम लगातार हताश निराश जनता शोर-शराबा तो बहुत करते हैं पर जब घड़ी निर्णायक स्थिति को अपनी विजय में बदल पाने के लिए आती है तब सही कार्रवाई से खुद को अलग कर जनतंत्र का गला घोंटने में मददगार बन जाते हैं । यह हमारे लिए ज़लालत भरा काम है । आओ साथियों पुनर्विचार करें और अपनी गलतियों को सुधारें निकट विधानसभा चुनाव में नीति का वरण करें , दुर्नीति का त्याग करें , ताकि स्वस्थ्य समाज के निर्माण में हम ईमानदार और कारगर बन सकें ।
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पिछली बार ईरोम शर्मिला चुनाव हार गई,

सोनी सोरी चुनाव हार गई,

दयामनी बारला चुनाव हार गईं,

मेधा पाटकर चुनाव हार गईं,

खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते ?

तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. 

पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है 

और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है .

धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . 

उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं .

 ० Himanshu Kumar की वाल से साभार.

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