Friday, March 26, 2021

पितृसत्ता द्वंदात्मक भौतिकवाद का एक कुरूप सच है

पुरुष अंततः पितृसत्तात्मक राज व्यवस्था का अधिपति हैं ! उनके मुकाबले स्त्रियां मुझे अधिक सहनशील व प्रगतिशील लगती हैं । पर उनमें भी एक खोट है ; कि वे परम्परा और रूढ़ के महीन फर्क से निजात नहीं पातीं । इससे क‌ई-क‌ई बार वे स्त्री विरोधी भी होने लगती हैं । विरासती पितृसत्ता इसी फांक व द्वंद से ही कामयाब होते रहे हैं और यह सत्ता अपने चरमोत्कर्ष का जश्न मनाती है । कहना न होगा कि इन मायनों में देश , समाज , पूंजी , बाजार सब लकवाग्रस्त और बीमार हैं ।

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