Friday, March 26, 2021
दुष्ट षड्यंत्रकारी छल के मासूमियत में न जाएं
"अब तो समय ऐसा हो गया कि पतले दूध की शिकायत करो तो ग्वाला भी गाय का मनोबल गिराने का आरोप लगाता है "। इसे हमारे आज के भारतीय समाजिक राजनीतिक ,दशा के निहितार्थ में भी देखा-समझा जा सकता है । भक्त मंडली का यह मनोचित दशा सिर्फ यही आ, नहीं ठहरते , बल्कि आरोप-प्रत्यारोप और शक्ति संपन्नता का सामंती अवशेष अब तो कला रूपों में भी अभिव्यक्त होने लगा है ।
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युद्ध करूणा का अंत है
यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...
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सुरेश शर्मा बीसवीं सदी के नवें दशक के कवि हैं । मानवीय मूल्यों के स्थापत्य के प्रति कटिबद्ध तथा निरंतर चिंतनशील कवि हैं । उनकी रचनाशीलता समा...
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