आरंभ से मैं मानता आ रहा हूं कि स्त्री एक भरी पूरी नदी है । इसका यह आशय नहीं कि ष
,नदी दोहन की वस्तु है रीत लिए जाने तक । बल्कि स्त्री अपनी समग्र लुटा पाने में समर्थ वह जीवनदायिनी नदी है जो लुट पीस जाने के बाद भी उफ् नहीं करती । पर नदी का दुर्भाग्य तो देखो ! कि कैसे उसे रीत लिया जाता रहा । हिंदी की स्त्री कविता इस रीत लिए जाने की कसक और पीड़ा में अब तक धंसी ; कराह रही है तो उसका एक बड़ा और बुनियादी कारण हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही पौरूष ग्रंथि दोष तथा पितृसत्तात्मक बोध है । अतः नदियों की कसक को समझना , उसे आत्मसात करना जरूरी है । बिना उसे अंगीकार किए , स्वीकारे हम स्त्री पुरुष के बीच के रह गए टालरेंस नहीं भर पाएंगे और तब तक हिंदी की स्त्री कविता भी अपने मुकाम हासिल नहीं ही , कर पाएगी । यह अलग बात है कि इधर हिंदी में स्त्री विमर्श वह उनके स्वतांत्र्य को लेकर अनेक चर्चा परिचर्चा होती रही , पर जमीनी सच्चाई उसके परिणाम मूलक यथार्थ के धरातल पर कहीं नहीं टिका । चूंकि स्त्रीवादी विमर्श की मांग में क्षणिक लाभ , यौन अभिरुचि का मामला तथा सामाजिक दायित्व बोध के नकार से उपजी स्वतांत्र्य बोध शीर्ष पर रहा । खैर ! मैं पल्लवी की कविताओं पर अपने विचार व्यक्त करना चाहूंगा चूंकि ऊपर जो कुछ कहा वह हिंदी की स्त्री कविता और पल्लवी की कविता को लेकर कहा । पल्लवी मुखर्जी समकालीन हिंदी कविता के अंतिम दशक की कवि हैं । खान नगरी कोरबा से आती हैं व इन दिनों बिलासपुर में हैं । वे अपने समकालीन साथियों में कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी ,गणेश गनी , किशन लाल , भास्कर चौधरी , संजय शाम , निर्मल आनंद , प्रशांत जैन , रामप्रसाद यादव , सतीश छिम्पा , विवेक चतुर्वेदी , पूनम विश्वकर्मा , विश्वासी एक्का , मृदुला सिंह , आरती तिवारी , अनुपमा तिवारी , अखिलेश श्रीवास्तव , सिद्धार्थ वल्लभ , कुमेश्वर कुमार ,अंजन कुमार , घनश्याम त्रिपाठी , राहुल बोयल , अमर दलपुरा , शिव कुशवाहा , रोहित ठाकुर , कुंदन सिद्धार्थ , मिथिलेश कुमार राय ,प्रेम नंदन के परस्पर अपना स्थान बना चुकी हैं । साथी कवियों के बनिस्बत वे निरंतर स्त्री अस्मिता के सवालों , उनकी स्वीकार्यता को लेकर अधिक मुखर रही हैं । उनकी कविताएं संवेदना की आंच से पक बृहद मनुष्यता का मांग करती है । कहना न होगा कि उनकी कविताएं द्वितीय दर्जे के चोटिल दास्तां के इतिहास परक यथार्थ का एक पूरा अभिलेख है । पिछले दिनों योगेन्द्र कृष्णा के प्रतिपक्ष पर उनकी कविता पढ़ी फिर उनकी अन्य रचनाओं को भी खंगाला तो उनमें एक अलग तरह का विश्वास बढ़ा । उनकी कविताओं में वह सब देखा-पाया जिस पर ईमानदार सृजनधर्मिता आकार पाता है । यानी स्त्री कविता के जो दो एकांगिक ढांचे इस बीच कविता में विकसित किए गए हैं उसका जरूरी स्वीकार-अस्वीकार उनकी कविताओं में साफगोई के साथ मौजूद है । वे कविता में स्त्री संवेदना के बनिस्बत उसके मानवीय रूप , रस , गंध , रिश्तों की अहमियत इत्यादि को स्वार्थपरक होने से बचाने की कवायद करती हैं । एक स्त्री अपेक्षाओं के अंबार से लदे रहती है । झुकी रहती है उसके बोझ तले । परन्तु दायित्व बोध से भरा होने का जो जीवन चित्र वह विकसित कर रही हैं व उसमें अपने को प्रसन्न बनाती है उसका मौजू दृश्य बिम्ब "रोटियां" कविता की इन दो स्टैंजो में काबिल ए गौर है
01
वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की
02
पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी
इन दोनों काव्य पंक्तियों से दो बातें साफ होती है एक - उनकी एकनिष्ठ श्रम शीलता और दूजा उन पर किया जाने वाला भरोसा , जिस पर इत्मीनान की सांस लेता है घर और घर की फसल लहलहा रही होती । पर उसमें उसके इत्मीनान की सांसें , या कि उसके फसल के लहलहा उठने की परवाह ( ? ) नहीं होती । यह सिर्फ उस पर ही निर्भर रह जाता है । एक स्त्री के जीवन में ऐसे अनगिन विडंबनाएं है जो उनकी शेष और कविताओं में भी दर्ज हैं । मुझे लगता है स्त्री कविता में एक कवि के इस रूप में पल्लवी की दर्ज किए गए हलफनामे को देखा जाना चाहिए , पढ़ा जाना चाहिए ।
रोटियां
___________________________
वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की
आकाश का चाँद
मखमली रोटी की तरह
खिला-खिला था
सिर्फ
आँखों से ओझल थे
टप-टप करती
पसीने की बूंदें जो
माथे से आँचल को
भिगों रही थी
पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी
इधर वह
रोटी बेलती जा रही थी
तुम
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जिनके घर फूंक दिये जाते हैं
या रौंद दिये जाते हैं
किसी देह की तरह
उन घरों के दुःखों का
लेखा-जोखा
हिसाब-किताब
क्या तुम्हारे
बही खातों में
दर्ज है
या उन्हीं की तरह
भूल चुके हो तुम
जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं
देखते हैं
सरसरी तौर पे
और
याद रखते है
बस
अपनी भूख
अंतहीन भूख से
मरती आत्मा दिखती नहीं
दुखों का हिसाब
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वह औरत
तमाम पीड़ाओं और दुःखों को
पकड़ती नहीं है मेरी तरह
उड़ा देती है सारी पीड़ाएं
जैसे कोई चिड़िया हो
आँगन की
आँसुओं से गिरती बूंदों में
टिमटिमाते हैं तारें
जुगनुओं की तरह
जो चूल्हे की आँच पर
और चमक उठते हैं
उसकी हांडी से
खदबदाते भात की सोंधी गंध में..
टकराती है
मेरी खिड़की से और
फैल जाती है पूरे कमरे और देश में
उसका मरद
महुए से सराबोर
देखता है उसे जैसे
कोई गिद्ध हो
वह औरत
उसकी आँखों में बैठे
गिद्ध को झपटने नहीं देती
देह की कसावट को
ढाक कर
मगन हो जाती है
भात की सोंधी गंध में
हम -तुम
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तुम जानते हो
मेरी
ज़रूरत भर का नमक
बित्ते भर के
आकाश का विस्तार
जिसमें
बोरी भर के
शब्द होतें हैं
एक भी शब्द के इतर
हमारी सुबह नहीं होती
शब्दों का
ताना-बाना बुनते है हम
रात के
अंतिम प्रहर तक
अंतिम छोर पर
तुम्हारी आँखों पर होती हैं
एकबूंद
उसी बूंद पर
मेरी सुबह होती है..
स्त्री
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स्त्री कोई सड़क नहीं
जिस पर चलकर
तुम ....
अपने लिए
रास्ते तय करते हो
न ही कोई
वटवृक्ष
जिसकी छाया के नीचे
बैठकर
सुस्ताना चाहते हो
स्त्री को
हरसिंगार का फूल भी
न समझना
जो
रातभर खिलकर
टपक जाता है
तुम्हारी हथेली में
मसलने के लिए
स्त्री
धरती की तरह है
जो
नम रहना चाहती है
मिट्टी की तरह
ताकि
एक बीज
फूट सके
उग सके
कोई पौधा
उम्मीद का..
बहुत ही भावपूर्ण और अर्थपूर्ण सृजन !
ReplyDeleteभाव पूर्ण कवितायेँ.....पल्लवी बहुत बहुत सारगर्भित...नारी चेतना की अंतर अभिव्यक्ति.....
ReplyDeleteअत्यंत ही गहरा अर्थ समेटें हैं यह कवितायें,कवियत्री को शुभकामनाएँ
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