हिंसा अपने किसी भी रूप में रहे बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है । भय और अक्रांतकारी सत्ता अपने राजनीतिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इस बर्बरता का पक्षकार बराबर बना हुआ है नतीजतन न्याय भी , नाउम्मीदी में बनी हुई है । संवेदना मनुष्य के भीतर नैसर्गिक है । मनुष्य अपने स्वभाविकता में कभी भी उतना उग्र नहीं है जितना कि अन्याय या अप्रीतिकर परिघटनाओं के बाद होने लगता है मसलन निर्भया कांड , उन्नाव रेप केस , कि रांची में हुई घटना को लेकर होता दिखा । वह तब और अधिक उग्रता में देखा गया कि उसने न्यायिक प्रक्रिया की लचरता से आजिज़ आ , पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर को भी जायज माना । हालांकि यह दुखद पहलू है कि वह न्याय प्रणाली से और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनासक्त हुआ। लेकिन इनघटनाओं-परिघटनाओं के विपरीत एक कवि ने उसे , स्त्री को उनकी सार्थक समाजिक सरोकार से वंचित रखे जाने के षडयंत्र के रूप में देखा है और कहा ---
बेटियों डरना मत
इसलिए हो रहा है यह सब
कि तुम लौट जाओ
घर की कैद में
पर तुम्हें बढ़ना है आगे
मुकाबला करना है
यह कविता उन्हें लेकर , उनसे जुड़ी तमाम चिंताओं को लेकर, पूर्णतः स्त्री अस्मिता को लेकर है । एक पिता की चिंता , एक भाई की चिंता , एक पूरे परिवार की चिंता भी इस कविता में अभिव्यक्त होता है । कविता केवल बलात्कार को ही लेकर लिखी बिल्कुल भी नहीं है । परन्तु कवि ने इस कविता को सम समायिक बलात्कार की घटनाओं से जोड़ इसकी व्याप्ति को और अधिक व्यापक किया । किसी कवि की कविता में मौजूदा समय का भान और भविष्य की संभावनाओं की संकल्पना उसके काव्य संप्रेषण को अधिक पुष्ट बनाती है । यह इस कविता के भीतर मौजूद है ।
कवि में एक ओर जहां स्त्रियों से साहस से उठ खड़े रहने का आग्रह है वहीं उस समय और स्थिति को देखने की आकुलता है , प्रतीक्षा है । उनके लौटने में लौटना वैसा नहीं है , जैसा भय से उत्पन्न लौटने में होगा । वे साफ़ और मुखर हो कहते हैं 'लौटना'
पर हत्यारों के भय से नहीं
अपनी काम खत्म कर लौटना वापस
मैं सदियों तक उस घड़ी का इंतजार करूंगा ।
साहस बंधाती और बल देते कविताओं की श्रृंखला में कवयित्री लता पराशर , सांत्वना श्रीकांत , Virender Bhatia की कविता का उल्लेख मुझे जरूरी इसलिए लग रहा है कि ये कविताएं भी स्त्री चेतना के प्रति उतनी ही धैर्यवान और साहसी कविताएं हैं जो जड़ता के विरूद्ध डंट कर खड़ी है ।
लता पराशर की कविता की मानें तो स्त्री का शिक्षित होना ही उनमें वैकल्पिक सशक्तिकरण ला सकता है , उन्हें बलशाली बना सकता है । लता की मुक्ति कामी सोच कलुषता से मुक्त जीवन में शिक्षा रूपी मशाल जलाकर उजियारा भरने के आभा को प्रकट करती है
मेरी प्यारी
मेरी लाडली
बच्चियां
तुम्हारे संग होने से
अपने को
तुम लोगों में
ढूंढने लगती हूं
अपनी
पढ़ाई के
प्रत्येक टूट को
फिर से
महसूस करने लगती हूं
कबसे इन दरारों को
भरने की
नाकामयाब
कोशिश कर रही हूं
शुभाशीष
पढ़ो और गढ़ो खुद को
वर्षों पहले
हमनें भी
सबको परे धकेल
बहुत मुश्किल से
तुमलोगों तक
खुद को खींचकर लाई हूं
तो सुनो
किसी की उतना ही सुनना
जितना जरूरी हो
अपने आप को
समझने के लिए
किताबें उठाओ
शब्दों को पी जाओ
जी लो
खुद को
पूर्णता में
हर कोई
इस संसार में
अकेला ही है
कांधे को छोड़ो
पैर मजबूत करो
बेड़ियां खोलना सीखो
भेड़ियों को
भगाना सीखो
सीखो
जिंदगी जी लेना
सीखो
अखबार में
छपी खबर से
घबराओ नहीं
कितनी लड़कियां
मिशाल बनी
कितनी मशाल बन
रौशन हुईं
कलुषता
जल जाए
इतना रोशनी
फैलाओ
चलो
फैसला करने की
हिम्मत जुटा लो
बस खुद को
जिंदा रखने
'सुनो लड़की' सांत्वना श्रीकांत की कविता वस्तुत: मूल अंग्रेजी में है जिसका अनुवाद जगदीश नलिन ने किया है इसमें कोई दो राय नहीं कि सांत्वना श्रीकांत की कविताएं , स्त्री विषयक कविताओं में अतुलनीय कविता है ! इसमें जरा भी संदेह नहीं कि सांत्वना की इस प्रस्तुत कविता की धार एक स्त्री को लेकर बनी बनाई प्रचलित धारणाओं के खिलाफ साहस और बल के सहारे आगे आती है और उन धारणाओं के खिलाफ जाती है । महत्वपूर्ण यह है कि वे इस कविता में स्त्रीवाद या कि उनकी रूदन से कहीं बेहतर बल , प्रतिरोध में देती हैं । स्त्री मुक्ति अथवा समानता की कामना जड़ता को तोड़ कर ही हासिल किया जा सकता है और स्त्री को ऐसा होना होगा ! ऐसा होना , उनके होने के दरकार में शामिल है
No comments:
Post a Comment