Tuesday, December 14, 2021
सिद्धार्थ वल्लभ
एक कवि स्वप्न देखता है , स्वप्न को जीता है , और वह अपनी स्वप्नदर्शी दृष्टि से उसे यथार्थ के जमीन में उतारता चला जाता है । कवि की स्वप्न जीवी आकांक्षा एका नहीं चलता वह बहुआयामी होता है । सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की प्रक्रिया में उनके उत्थान की कामना लिए होती है । सिद्धार्थ वल्लभ भी इसी कामना के कारण आज समकालीन हिंदी कविता में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते आगे आए हैं । यह दहकता आग का गोला-सा , सीधी-साफ , खरी-खोटी कहने नहीं चूका कभी । पर यह कवि , आखिर जीवन और अपने सपनों में चाहता क्या है ? और चाहता है तो किसके लिए चाहता है तथा क्यूं चाहता है ? कोई तो बात है ! जो सिद्धार्थ वल्लभ की कविता में यह तरूण करूणाई में आई । सिद्धार्थ वल्लभ अपनी इस कविता में यह बता पाने में कि समझा पाने में इसलिए कारगर है कि सम्पूर्ण विश्व अपने ही बुने तानों-बानों में इस कदर उलझ गया है और व्यथित है कि वह अपनी जड़ता के नकार में अब बेहतरी देख रहा है । परन्तु यह उस हठी सांप और मेंढक के दास्तां की तरह है जिसमें सांप मेंढक को निगल भी नहीं पाता और उगल भी । पूरा विश्व समुदाय आज अपनी भौगोलिक सीमाओं ,अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के चलते आयुध के ढेर में बदला-बदला सा दिख रहा है । समाज में एक मनुष्य दूसरे के प्रति पराभाव से ऐसा भरा है कि प्यासे हों , एक दूसरे को सूरत- ए - हाल नीचा दिखा ही ले। इस व्यग्रता व बेचैनी का कोई और छोर कहीं नहीं दिख रहा । ऐसे में हमें अब पारम्परिक स्त्रोतों की ,नैसर्गिक मूल्यों की आवश्यकता , शिद्दत से महसूस होने लगा है । कोई ऐसा राष्ट्र अथवा समाज नहीं बचा कि सिद्धार्थ की आकांक्षाओं का आकांक्षी न होगा यकीनन । सिद्धार्थ वल्लभ अपनी इस कविता में इसी सलीके की पहचान कर रहे हैं
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