Tuesday, May 25, 2021

सांत्वना श्रीकांत की कविताएं स्त्रीवादी रूझान की लगती जरुर है ; पर है नहीं वैसा

आजादी के बाद  ,अर्थात् स्वाधीन भारत की हिंदी कविता के अधिकांश रचाव को देखें तो कह सकते हैं कि यश प्रतिष्ठा मान-सम्मान पुरस्कार व अन्य सभी महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्रों पर एकतरफा आधिपत्य पुरूषों के ही रहे ; तो बड़ा कारण और कमियों में मौज़ूदा दौर की स्त्री कविता का रूदाली चेहरा तथा गंभीर हस्तक्षेप का न होना रहा । यहां तक कि अपने हिस्से की लड़ाई को भी 'वे' न लड़ , वाक ओवर दे छोड़ दीं थीं । कुछेक कवयित्रियों को छोड़ भी दें , फिर भी शेष बचे में सामाजिक राजनीतिक व आर्थिक चेतना का अभाव तो रहा ही ! अतः इन मायनों में स्त्री बहुत पीछे छूटी रह गई । संदेह नहीं , स्त्री के संघर्ष का इतिहास जानें तो वह प्रागैतिहासिक है । मुकाबले और तुलनात्मक हर मोर्चे पर वे पुरूषों की अगुवाई की हैं तथा उसके बड़े भागीदार भी रहीं हैं । मैं तो मानता हूं कि आदमी के मनुष्य बनने की कड़ी की वे पहली सूत्रधार हैं । किन्तु समय के रथ का पहिया और आखेट मनुष्य के पराक्रमी ज़िद और हठ के आगे , तथा किन्हीं मायनों में अपनी शारीरिक संरचनाओं से वे कमजोर हो , रूढ़ सामाजिकता से परास्त हुईं हैं । तत्पश्चात ही वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंग हुईं । अब यह दुर्भाग्य ही कहें कि तब से ही स्त्री , इसी जड़ , पितृसत्तात्मक व्यवस्था के अधीन रह , कराहती हुई दिखीं हैं , छटपटाती हुईं दिखीं हैं , कभी स्व अस्तित्व को भूल , अपने को पुरुष की आधी ही मान अंगीकार भी की । आज हमारे जीवन में यह व्यवस्था इस तरह पैवस्त है कि उससे विलग कोई भी नई चेतना , प्रगतिशील विचार हमें खटकने लगते हैं । सांत्वना श्रीकांत इसी ज़ठर विषाद के बीच कुछ तेरा , कुछ मेरा , कुछ हम दोनो का ; के भाव के साथ हिंदी कविता में दस्तक दे रहीं हैं , चुनौती प्रस्तुत कर रहीं हैं और बता रही हैं कि कहां खोट है , कहां कमियां हैं , कहां धूर्तता और धृष्टता है , कहां कीमियागरी है । कहीं प्रत्यक्ष वीरांगना सी , तो कहीं अप्रत्यक्ष साहसी विदुषी-सी सचेत् और चौकसी लिए मानक तय, कर रही हैं ! आधुनिक भारत को एक अनुकूलन स्ट्रक्चर देने प्रयास कर रहीं हैं !! बताना न होगा , स्त्री की भागीदारी को सुनिश्चित किए बगैर कि दृढ़ता से रखे बगैर , कि क्या वांछित है , क्या अवांछित है , पुरुष के पुरुषार्थ में !!! यह वे स्त्री के पुरुषार्थ से परिभाषित कर रहीं हैं । स्त्री का पुरुषार्थ क्या है ? कैसे होता है स्त्री में पुरुषार्थ ?? तो कहना न होगा इसकी बानगी सांत्वना की कविताओं में , उसके वैविध्य रंगों में दिखाई देगा । 
गोकि बताना न होगा कि सांत्वना श्रीकांत की इस 'स्त्री का पुरुषार्थ' संग्रह के सभी चारों 'स्त्रीकाल' में स्त्री के संघर्ष का संघीय रुप व दीप्त मन की आकांक्षाओं का वेग है । बाज के डैनो सा हवा के विपरीत कहीं गतिमान , तो कहीं सरल प्रवाह और उड़ान लिया हुआ है । सांत्वना श्रीकांत इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक की उदीयमान कवयित्री हैं । अभी हालिया प्रकाशित 'स्त्री का पुरुषार्थ ' उनका पहला संग्रह है । जो सर्व भाषा ट्रस्ट न‌ई दिल्ली से प्रकाशित है । कवयित्री को उदीयमान इसलिए ही कह पा रहा हूं कि बहुत कुछ अच्छा होने के बाद भी उनके कहन में अभी , अधिक और अप्रत्याशित लरजता तथा समर्पण है । निसंदेह यह स्त्रियों के नैसर्गिक गुण हैं । परन्तु स्त्री पर दासता लादने में कि आक्रमण का सबसे नितांत सुलभ मार्ग भी यही से बना है । यक़ीनन सांत्वना की यह कोशिश , उनके द्वारा बिखराव को रोकने / टूटने को सहेजने / बचाने की मंशा से है । कुछ घटे , कि पहले जोड़ लेनें की दृढ़ता से है तथा काफ़ी हद तक भौतिकवाद के विरूद्ध सांस्कृतिकवाद की जड़ों को मजबूती प्रदान करने के सामर्थ्य में है । फिर भी,  चूक पर चूक कुछ ज्यादा सध जाए कि लद जाए , पहले मैं कहूंगा स्त्री को खुद को परखने उन्हें एक नई सौंदर्य दृष्टि विकसित करने की महती जरूरत है , और यह उन्हें ही हासिल करना है । संग्रह में प्रकाशित कविताओं को सांत्वना श्रीकांत ने 'स्त्रीकाल' के नाम से जिस तरह से नियोजित किया है वह काव्य के वैशिष्ट्य से पहले एक स्त्री के जीवन वैशिष्ट्य को गहराईयों में उतार , देख पाने की समग्रता में आया है ।

"तुम भींचना मत 
अपनी मुट्ठियां
कहीं पसीजती हुई हथेलियों से
रिस न जाऊं मैं।" 

सांत्वना श्रीकांत की कविताएं नायक और नायिका के मूल भाव-भेद से उपजती है और वह एक ऐसे लौकिक जगत और लोक में विचरण करती है जहां उनके सोचने ,समझने चाहने को नायिका की प्रधानता में रख देखा गया । यह एक तरह से काव्य का रीतिकालीन रूपक है । जैसे प्रचलित तोता मैना की कहानियों में गढ़ी गई , किस्सागोई में हुआ ।   

स्व से आरंभ कविता जब अपने वैयक्तिक पीड़ाओं, आकांक्षाओं की सीमा को लांघने लग जाए तो उसका वास्तविक रूप सौन्दर्य , निखर बाहर आता है । वह सिर्फ निजी और एकांतिक अनुभूति न रह, निर्वैयक्तिक और व्यापक समाज में प्रक्षेपित होता है । दुख के संदर्भ में तो यह अकाट्य है कि दुख का रंग दुखों के अलग-अलग होने के बावजूद एक-सा अपना होता है । कविता इस परिस्थिति में समाजिक आचरण व व्यवहार का भाग बन , सहारा बनती है । इधर सांत्वना की ढेरों कविताएं इसी तरह से निजी अनूभूतियों के रास्ते समाजिक परिप्रेक्ष्य में दस्तक देने वाली हैं ।

सांत्वना की कविताएं हैं तो असलत: स्त्रीवादी कविताएं ही । मोड कि माडल के वैविध्य में एकांगिक न रहकर वह स्त्री पुरुष के आत्मिक मेलजोल को मजबूती देने के प्रयत्न की कविताएं हैं तथा कठिन बंधनों के परिष्कृत रूप सौन्दर्य की कविताएं हैं । वे अपनी कविताओं में स्त्री के परस्पर ही पुरुष को रखती हैं । जवाबदेही , एकतरफा  न स्त्री पर लादती हैं न पुरुष पर बल्कि दोनों ही के प्रेम और मुक्ति का  विन्यस्त रुप है सामने लाती हैं । कि जोड़ीदार को वह प्रेम में बुद्ध बना देती है

गरम सांसों की छुअन,
होठों की चुभन
समाधि तक चलेगी साथ,
वहीं घटित होगा प्रेम।

और तब देना

मेरे शरीर के 
हर हिस्से पर अपना नाम,
वहां पर बीज बो दूंगी मैं, 
जब आखिरी बार मिलोगे
तब वह बन चुका होगा
बोधिवृक्ष
और-
तुम उसकी छांव में 
बैठ कर
बुद्ध बन जाना।

प्रमाणिक जीवन यथार्थ न कपोल कल्पित स्वप्न- सा होगा , और न ठस्स वैचारिक-सा , होगा तो वह जीवन सम्मत ही होगा

"आंखें मूंद कर भी
तुम्हारी छुअन ही टटोलती है
मेरे अंतस को,
जाते-जाते आखिर में तुम
थोड़ा बच जाते हो मुझमें.."

सांत्वना की इस कविता में अहसास व अनुभूति की प्रबलता है । जो नितांत और निजी है । बावजूद वह निजता के दयारों को फांद अपनी स्पंदन‌ अहसासों से सामाजिक जीवन का रचाव करती है । उनकी इस कविता के बिम्बों को झांकें तो उसमें एक ऐसे जीवन पर्यन्तता से भरा रूह लम्हा और ताज़गी है कि जिसके सहारे जीवन की जटिल दुर्गम रास्तों का पार पाना भी संभव प्रतीत होता है । चूंकि यह अंतस का उभार है , थोड़ा बचे रह जाने का आंतरिक प्रक्षेपण है । स्पंदन अहसासों के खूबसूरत स्त्रोतों से झरनों का फूटना है । यह दीगर है कि इस तरह की कविता में वह जीवन यथार्थ नदारद होते रहे हैं जहां संकट के साथ संघर्ष व टकराव बनता है । अतः लोक जीवन के काव्यवस्तु के तौर ये निष्प्रभावी हो जाते हैं । बतौर एक कवि /कवयित्री को देर सबेर इन संदर्भों से छूटना ही वांछनीय है अन्यथा यह लिजलिजा होगा । 

"तुम्हारे स्वयं में होने के मायने
कर दिए है लिपिबद्ध"

सांत्वना की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में स्त्री का पुरुष में लीन समर्पण है । जो उसके स्वत्त्व से समिष्ट की मिश्रित व्यवस्था व भौगोलिकी में दिखाई देता है । स्त्री के पुरुष पर अधिकाधिक हस्तक्षेप तथा अधिकृत जुड़ाव में रूपायित होता है । सांत्वना के यहां भावात्मक बयार और बहाव से उत्पन्न यह एक विकट स्थिति है  कि "देना" ही देना हुआ ! और देना सुखकारी ही है । फिर अप्राप्य क्या रह जाता है ? कि वे कहती हैं

"अंकित कर दिया है
अपने वर्तमान और भविष्य में
तुम्हें..."

"ताकि सदियों तक जीवित रहे
अप्राप्य का सुख।"

इस अप्राप्य सुख की प्राप्ति का सवाल , कविता के पुनर्पाठ की मांग करती है ।

"तुम्हारे साथ सुख जीते जीते
दुख का आकार और गहराई भूल गई थी"

सांत्वना की कविता में संबंधों की जो रागात्मकता है वह अनुभूति के वैभव में है । यद्यपि एक का जाना और दूसरे का आना होता है । यह दूसरा जो आया है अथवा उपस्थित हुआ है अनुगामी व सहचर बन, आया है । किन्तु सांत्वना के यहां "जाना" ही कहां हुआ ? उनके यहां तो यह जाना क्रिया ही नहीं है । न कभी व्यतीत होने वाली है । बल्कि भीतर ही भीतर और निरापद घटित होने वाली है ।

दरअसल दुख ने मुझे अपने भीतर लील गया
और मैंने तुम्हारा जाना स्वीकार किया।
हालांकि इस तरह के गूढ़ और रहस्यवादी बातें अक्सर हमें भटका जाती है । ओरांग ऊटांग की सैर कराती तथ्य और लक्ष्य से दूर रखें रहती है । कविता किन्हीं मायनों में क्लिष्ट सी हो जाती है और थकावट भरी मशक्कत भी कराती है ।

कवयित्री सांत्वना श्रीकांत की कविताई चेतना एक लंबे और दीर्घ पठन-पाठन के बाद स्त्रीवादी रूझान में आ टिका है । इधर स्त्रीवाद में पुरुषार्थ के मायने को मैं सांत्वना की कविताओं से देख रहा हूं तो सांत्वना के यहां कि यह स्त्री पारंपरिक भारतीय प्रेयसी है ,अथवा पत्नी है । जो ढांचागत परिवार की बड़ी जरूरत है । जिसकी अपनी सोच का भी एक 'सीमित' आकाश है । सीमित इन मायनों में है कि वह अपनी स्थिति और जड़ जुड़ाव से खुद को अलगा नहीं पाती , कांधा बनने के जतन में कांधे से झूल जा रही है और झोल खा जाती हैं । मुंबईया फिल्मी पटकथा के किरदार की तरह , नायिका की भूमिका को जीने के यत्न में वह खोती अधिक और पाती कम हैं । लेकिन सांत्वना के यहां कम में भी तसल्ली अधिक है जिसे वे "अप्राप्य का सुख" भी कहती हैं

"मैंने तुमसे प्रेम किया
बैचैन हुई, नींद त्यागी,
तुम्हें जो पसंद था
इसलिए पसंद किया,
आखिर में मेरे पास
कुछ नहीं बचा मेरा।"

मैं फिर जोर देना चाहता हूं । प्रेम व्यवसाय नहीं है । सौदा भी नहीं है । किए को बताए जाने की अथवा अपेक्षाओं से भी पृथक है । विवश भी नहीं होता है प्रेम । समृद्धि का आधार है प्रेम । पसंद-नापसंद को इस तरह के जस्टीफाई की दरकार नहीं हुई , कभी भी प्रेम में ।

"तुम्हें जो पसंद था
इसलिए पसंद किया,"

सांत्वना की कविता में निश्चितता , अनिश्चितता और द्वंद्व का जो वितान है वह दृष्टव्य पंक्तियों में देखे जा सकते हैं

"और तुम हमेशा
इस प्रायश्चित में रहे
कि मुझे तुमसे प्रेम नहीं!"

"मैं जब कभी
बंद करती हूं आंखें
तुम मेरा माथा चूमते हुए
दिखाई देते हो मुझे,
बांहों में लेकर सुनाते हो
धरती की लोरियां,"

"हालांकि
वास्तविकता यह नहीं है।"

जीवन के क‌ई यक्ष प्रश्न , क‌ई यक्ष आशंकाओं के बावजूद सांत्वना की कविताई खूबी में विश्वास का जीवित रूप , उसके उलट-पलट भाव-विचार , भाव-विभोर , शिकवे-शिकायत भरे सौंदर्य उनकी कविताओं में दिखाई दे जाते हैं ।  यही वह तथ्य है कि सांत्वना जीवन के तार को पारंपरिक राग से छेड़ देती हैं

तुम ब्रह्मांड हो
जहां से हुआ उद्भव मेरा,
हम दोनों के लिए
प्रेम के मायने
इतने अलग हैं
जैसे-
मेरे मौन में तुम्हारा होना,
मेरे हर खयाल की
शुरुआत और अंत का
तुमसे होकर गुजरना।
यहां तक कि
प्रेम का पर्याय तुम हो।

सांत्वना की कविता  ज्ञानमार्गी उपदेश से नहीं , बल्कि भौतिक उद्देश्यपरक , घनीभूत विचार और यथार्थ से बुने गए हैं ।
 
सुनो लड़की ।
तुम छुपना मत,
आंखें नीची मत करना,
दुपट्टा कहीं खिसका तो नहीं,
इसकी भी परवाह न करना,

सिर उठाना और
नीची कर देना उनकी आंखेंं
अपने तेज से।

 सुनो लड़की !

तुम्हें इतिहास नहीं बनना,
तुम्हें पूज्य भी नही होना।
सामान्य जिंदगी चाहिए तुम्हें
जहां-
दहशत न हो अपनी देह
के नोचे जाने की,
फिक्र न हो दबोच कर
पर काटे जाने की,
जहां खिली रहे
तुम्हारी मुस्कुराहट
बिना इस डर के
 
सुनो लड़की सांत्वना श्रीकांत की एक मजबूत और बेहतरीन कविता है ।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सांत्वना श्रीकांत की यह कविता , स्त्री विषयक कविताओं में अतुलनीय कविता है ! इसमें जरा भी संदेह नहीं कि सांत्वना की यह कविता एक स्त्री को लेकर बनी बनाई प्रचलित धारणाओं के खिलाफ साहस और बल की जीवंत कविता है । महत्वपूर्ण यह है कि वे इस कविता में स्त्रीवाद या कि उनकी रूदन से कहीं अधिक बल , उसके प्रतिरोध में दी है । स्त्री मुक्ति अथवा समानता की कामना जड़ता को तोड़ कर ही हासिल किया जा सकता है ! और स्त्री को ऐसा होना होगा !! ऐसा होना , उनके होने के दरकार में है !!!

"अफसोस यह है कि
इस प्रक्रिया में
हर बार वे
बदचलन "हो जाती हैं

 युद्धरत होने 
 तैयार हो जाती हैं
अगली दफा के लिए।

 कह , दशा और दिशाएं दोनों को ही सांत्वना ने इस कविता में बड़ी सजगता के साथ रखी है । औचित्य को बरकरार रखा है । मैं यह बार बार कह रहा हूं कि स्त्री अनगिन साजिशों का शिकार या कि अभ्यस्त न बने , प्रतिरोधी बनें । 

श्रीकांत वर्मा की कविता में राजनीतिक चेतना का एक ट्रेंड रहा

आज के राजनीतिक परिदृश्य पर श्रीकांत वर्मा कितने साफ़ थे । यह अलग है कि वे सत्ता के साथ थे । संभवतः उनमें निरुद्वेग , आवेगहीन जनता को लेकर हताशा आई हो  कि वे सत्ता के विद्रोही रुप को त्याग शरणागत हो गए । ऐसा , मैं इसलिए कह पा रहा हूं कि एक ओर आवारा पूंजी और अतृप्त इच्छाएं है और दूसरी ओर विचार धारा । सत्ता के साथ बने रहने की महत्वाकांक्षा ने आदमी को उसके आत्मसम्मान के न्यून स्तर तक ला खड़ा किया है ‌। स्थितियां यह कि "प्रतिवाद" से बेईमान शब्द आज कुछ और , है ही नहीं। सत्ता की जय-जयकार और यशगान में समाधिस्थ लोग कब जागोगे कि कहते ही रहोगे
महाराज की जय हो !

■ कोसल में विचारों की कमी है
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महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !
युद्ध नहीं हुआ – लौट गये शत्रु ।

वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं
दस सहस्र अश्व
लगभग इतने ही हाथी ।

कोई कसर न थी ।
युद्ध होता भी तो नतीजा यही होता ।
न उनके पास अस्त्र थे
न अश्व न हाथी
युद्ध हो भी कैसे सकता था !
निहत्थे थे वे ।

उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है !
जो भी हो जय यह आपकी है ।
बधाई हो !
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए

वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं
जैसे कि यह –
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है ।


Tuesday, May 18, 2021

पल्लवी मुखर्जी कविता में स्त्री चेतना का आख्यान पाठ रचती हैं, से

आरंभ से मैं मानता आ रहा हूं कि स्त्री एक भरी पूरी नदी है । इसका यह आशय नहीं कि ष
,नदी दोहन की वस्तु है रीत लिए जाने तक । बल्कि स्त्री अपनी समग्र लुटा पाने में समर्थ वह जीवनदायिनी नदी है जो लुट पीस जाने के बाद भी उफ् नहीं करती । पर नदी का दुर्भाग्य तो देखो ! कि कैसे उसे रीत लिया जाता रहा । हिंदी की स्त्री कविता इस रीत लिए जाने की कसक और पीड़ा में अब तक धंसी ; कराह रही है तो उसका एक बड़ा और बुनियादी कारण हमारे पीढ़ी दर पीढ़ी से चली आ रही पौरूष ग्रंथि दोष तथा पितृसत्तात्मक बोध है । अतः नदियों की कसक को समझना , उसे आत्मसात करना जरूरी है । बिना उसे अंगीकार किए , स्वीकारे हम स्त्री पुरुष के बीच के रह ग‌ए टालरेंस नहीं भर पाएंगे और तब तक हिंदी की स्त्री कविता भी अपने मुकाम हासिल नहीं ही , कर पाएगी । यह अलग बात है कि इधर हिंदी में स्त्री विमर्श वह उनके स्वतांत्र्य को लेकर अनेक चर्चा परिचर्चा होती रही , पर जमीनी सच्चाई उसके परिणाम मूलक यथार्थ के धरातल पर कहीं नहीं टिका । चूंकि स्त्रीवादी विमर्श की मांग में क्षणिक लाभ , यौन अभिरुचि का मामला तथा सामाजिक दायित्व बोध के नकार से उपजी स्वतांत्र्य बोध शीर्ष पर रहा । खैर ! मैं पल्लवी की कविताओं पर अपने विचार व्यक्त करना चाहूंगा चूंकि ऊपर जो कुछ कहा वह हिंदी की स्त्री कविता और पल्लवी की कविता को लेकर कहा । पल्लवी मुखर्जी समकालीन हिंदी कविता के अंतिम दशक की कवि हैं । खान नगरी कोरबा से आती हैं व इन दिनों बिलासपुर में हैं । वे अपने समकालीन साथियों में कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी ,गणेश गनी , किशन लाल , भास्कर चौधरी , संजय शाम , निर्मल आनंद , प्रशांत जैन , रामप्रसाद यादव , सतीश छिम्पा , विवेक चतुर्वेदी , पूनम विश्वकर्मा , विश्वासी एक्का , मृदुला सिंह , आरती तिवारी , अनुपमा तिवारी , अखिलेश श्रीवास्तव , सिद्धार्थ वल्लभ , कुमेश्वर कुमार ,अंजन कुमार , घनश्याम त्रिपाठी , राहुल बोयल , अमर दलपुरा , शिव कुशवाहा , रोहित ठाकुर , कुंदन सिद्धार्थ , मिथिलेश कुमार राय ,प्रेम नंदन के परस्पर अपना स्थान बना चुकी हैं । साथी कवियों के बनिस्बत वे निरंतर स्त्री अस्मिता के सवालों , उनकी स्वीकार्यता को लेकर अधिक मुखर रही हैं । उनकी कविताएं संवेदना की आंच से पक बृहद मनुष्यता का मांग करती है । कहना न होगा कि उनकी कविताएं द्वितीय दर्जे के चोटिल दास्तां के इतिहास परक यथार्थ का एक पूरा अभिलेख है । पिछले दिनों योगेन्द्र कृष्णा के प्रतिपक्ष पर उनकी कविता पढ़ी फिर उनकी अन्य रचनाओं को भी खंगाला तो उनमें एक अलग तरह का विश्वास बढ़ा । उनकी कविताओं में वह सब देखा-पाया जिस पर ईमानदार सृजनधर्मिता आकार पाता है । यानी स्त्री कविता के जो दो एकांगिक ढांचे इस बीच कविता में विकसित किए गए हैं उसका जरूरी स्वीकार-अस्वीकार उनकी कविताओं में साफगोई के साथ मौजूद है । वे कविता में स्त्री संवेदना के बनिस्बत उसके मानवीय रूप , रस , गंध , रिश्तों की अहमियत इत्यादि को स्वार्थपरक होने से बचाने की कवायद करती हैं । एक स्त्री अपेक्षाओं के अंबार से लदे रहती है । झुकी रहती है उसके बोझ तले ।  परन्तु दायित्व बोध से भरा होने का जो जीवन चित्र वह विकसित कर रही हैं व उसमें अपने को प्रसन्न बनाती है उसका मौजू दृश्य बिम्ब "रोटियां" कविता की इन दो स्टैंजो में काबिल ‌ए गौर है

                         01

वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की 

                            02

पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी

इन दोनों काव्य पंक्तियों से दो बातें साफ होती है एक - उनकी एकनिष्ठ श्रम शीलता और दूजा उन पर किया जाने वाला भरोसा , जिस पर इत्मीनान की सांस लेता है घर और घर की फसल लहलहा रही होती । पर उसमें उसके इत्मीनान की सांसें ,  या कि उसके फसल के लहलहा उठने की परवाह ( ? ) नहीं होती । यह सिर्फ उस पर ही निर्भर रह जाता है । एक स्त्री के जीवन में ऐसे अनगिन विडंबनाएं है जो उनकी शेष और कविताओं में भी दर्ज हैं । मुझे लगता है स्त्री कविता में एक कवि के इस रूप में  पल्लवी की दर्ज किए गए हलफनामे को देखा जाना चाहिए , पढ़ा जाना चाहिए ।

                       रोटियां
___________________________

वह रोटी बेल रही थी
गोल -गोल
और
साँस ले रहा था घर
इत्मीनान की

आकाश का चाँद
मखमली रोटी की तरह
खिला-खिला था

सिर्फ
आँखों से ओझल थे
टप-टप करती
पसीने की बूंदें जो
माथे से आँचल को
भिगों रही थी

पसीनें की बूंदें
चमक रही थी और
घर की फसल
लहलहा रही थी

इधर वह
रोटी बेलती जा रही थी

                        तुम
___________________________

जिनके घर फूंक दिये जाते हैं
या रौंद दिये जाते हैं
किसी देह की तरह

उन घरों के दुःखों का
लेखा-जोखा
हिसाब-किताब
क्या तुम्हारे
बही खातों में
दर्ज है

या उन्हीं की तरह
भूल चुके हो तुम
जो सिर्फ़ पन्नें पलटते हैं
देखते हैं
सरसरी तौर पे
और
याद रखते है
बस
अपनी भूख

अंतहीन भूख से
मरती आत्मा दिखती नहीं

             दुखों का हिसाब 
____________________________

वह औरत
तमाम पीड़ाओं और दुःखों को
पकड़ती नहीं है मेरी तरह
उड़ा देती है सारी पीड़ाएं
जैसे कोई चिड़िया हो
आँगन की
आँसुओं से गिरती बूंदों में
टिमटिमाते हैं तारें
जुगनुओं की तरह
जो चूल्हे की आँच पर
और चमक उठते हैं
उसकी हांडी से
खदबदाते भात की सोंधी गंध में..
टकराती है
मेरी खिड़की से और
फैल जाती है पूरे कमरे और देश में
उसका मरद
महुए से सराबोर
देखता है उसे जैसे
कोई गिद्ध हो
वह औरत
उसकी आँखों में बैठे
गिद्ध को झपटने नहीं देती
देह की कसावट को
ढाक कर
मगन हो जाती है
भात की सोंधी गंध में

                  हम -तुम
___________________________

तुम जानते हो
मेरी
ज़रूरत भर का नमक
बित्ते भर के
आकाश का विस्तार
जिसमें
बोरी भर के
शब्द होतें हैं
एक भी शब्द के इतर
हमारी सुबह नहीं होती
शब्दों का
ताना-बाना बुनते है हम
रात के
अंतिम प्रहर तक
अंतिम छोर पर
तुम्हारी आँखों पर होती हैं
एकबूंद
उसी बूंद पर
मेरी सुबह होती है..

                     स्त्री
_________________________

स्त्री कोई सड़क नहीं
जिस पर चलकर
तुम ....
अपने लिए
रास्ते तय करते हो
न ही कोई
वटवृक्ष
जिसकी छाया के नीचे
बैठकर
सुस्ताना चाहते हो
स्त्री को
हरसिंगार का फूल भी
न समझना
जो
रातभर खिलकर
टपक जाता है
तुम्हारी हथेली में
मसलने के लिए
स्त्री
धरती की तरह है
जो
नम रहना चाहती है
मिट्टी की तरह
ताकि
एक बीज
फूट सके
उग सके
कोई पौधा
उम्मीद का..


Thursday, April 29, 2021

लोक रूझान की अभिव्यक्ति को मर्दाना अहंकार कह स्त्रीवाद देती है चुनौती

बगैर किसी वास्तविक आशय अथवा तथ्यों की समझ के जब भी हम बात करेंगे वह हल्का ही लगेगा ! गणेश पाण्डेय की आलोचना पद्धति पर लैंगिक भेद का आरोप मढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके कथन में निहित भाव का सारांश लैंगिक न होकर आलोचना के छद्म और विकार पर उनका कहा दारूण सच है । इसके लिए 'मर्दाना' अथवा 'जनाना' आलोचना शब्द के भावों को समझना जरूरी है ।

"मैंने जिसकी पूंछ उठाई
उसको मादा पाया"

 मैं यहां धूमिल की पंक्ति को इसलिए रख रहा हूं कि धूमिल के इस काव्य चेतना में भी क्या उन्हें यही लैंगिक भेद दिख रहा है या वह सच नहीं दिख रहा है जो धूमिल या कि गणेश पाण्डेय दिखा रहे हैं । तब साथी आपके सृजनशीलता पर मुझे संदेह होने लगता है । यह कतिपय कारणों और भावों से भले ही मर्दवादी लगे  , परन्तु होता नहीं है वैसा !

Wednesday, April 28, 2021

फरीद ख़ान और देवेन्द्र आर्य की कविताओं में देश-काल


जब व्यक्ति महत्वाकांक्षा की पराकाष्ठा पर होता है तो वह मनुष्य नहीं रह जाता । वह दुनिया का सबसे निष्कृष्टम और अधम प्राणी होता है । उसके लिए देशकाल, समाज, भाषा, राजनीति, धर्म, न्याय, नीति, संस्कृति, परंपरा, कुछ भी मायने नहीं रखता । बावज़ूद कि निरी स्वच्छंदता और उन्माद से भरा यह मानव प्रकृति का हिस्सा है ; पर कहीं भी प्राकृतिक नहीं है । तथा वह प्राकृतिक हो भी नहीं सकता । जीवन और यथार्थ की कसौटी पर वह हमेशा अग्राह्य ही रहेगा । इसलिए कि यह वस्तु सत्य नहीं है । जीवन सम्मत सत्य का भाग नहीं है । वृथा और अप्रासंगिक है । तथा अवांछनीय है । यानी , सांसारिकता से परे , समाज का कोई भी सत्य ; सत्य नहीं है । मूल्यहीन और आधारहीन स्थापनाओं का वजूद थोथा ही साबित हुआ है । 
इस बीच देश में तीन अलग-अलग महत्वपूर्णं घटनाएं घटी । इन घटित घटनाओं से न मैं स्वयं को अलग कर पाया और न प्रबुद्ध साथी ही । पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की एक बेटी ने भारतीय संविधान का हवाला दे न्यायिक प्रणाली और नागरिक अधिकार की आवाज़ उठा सन् 2002 से लगातार उस अमानवीय कानून के खिलाफ़ भूख हड़ताल पर लगभग 14 वर्ष तक रही और शून्य की दशा में आंदोलन को स्थगित भी की । संविधान का ऐसा माख़ौल किसने उड़ाया और क्यों उड़ाया कि नागरिक अधिकार की रक्षा भी संभव न हो पाई ? खैर चानू शर्मीला इरोम डिगी नहीं हैं । वह अब भी लौह स्त्री हैं । पर देश और उस प्रदेश की जनता ने आम चुनाव के बहाने जो घाव उसे दिया उसी का सच बयां करती है फ़रीद ख़ान की यह कविता हमें आश्वस्त करती है इरोम की मांगें जायज और न्यायिक है ।

यह कविता इरोम पर नहीं है
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यह कविता

उन लोगों पर है

जो गांवों, कस्बों, गलियों, मुहल्लों में

लोकप्रियता और खबरों से दूर

गांधी की लाठी लिए चुपचाप कर रहे हैं संघर्ष

यह कविता इरोम पर नहीं है

यह धमकी है उस लोकतंत्र को

जो फौजी बूट पहने खड़ा है

जो बंदूक की नोक पर इलाके में बना कर रखता है शांति

पिछले दस सालों में जितने बच्चे पैदा हुए हिमालय की गोद में

उन्होंने सिर्फ बंदूक की गोली से निकली बारूद की गंध को ही जाना है

और दर्शनीय-स्थलों की जगह देखी हैं फौज

जहां बर्फ-सा ठंडा है कारतूस का भाव

यह कविता इरोम पर नहीं है

बल्कि उस बारूद की व्याख्या है

जिसके ढेर पर बैठा है पूर्वोत्तर

बावज़ूद चानू आज मेरे लिए लीजैंड लेडी हैं । उनके इस अनथक संघर्ष यात्रा को सलाम ही नहीं ; लाल- लाल,लाल सलाम कहूंगा ।
 
दूसरी महत्वपूर्णं घटना देश में बेटियों पर होने वाली अनियंत्रित सेक्सुअल हरैसमेंट , बलात्कार , छेड़खानी , व हत्या आदि है । जो निर्बाध चल रही है । यह उतनी भी पीड़ा शायद देती जितनी पीड़ा मैनें महसूस किया तब , जब अपराधियों को बचाने तथाकथित राष्ट्रवादी , सेकुलर  लोग सड़क पर आए । वाह ! क्या रे मेरा हिन्दुस्तान ,कितना बड़ा छद्मी है तू । एक ओर बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ और दूसरी ओर हत्यारों की फ़ौज़ में भी तू ही तू । इस तरह मुझे फ़रीद ख़ान की यह दूसरी कविता भी झिंझोड़ रही है-- 

माफ़ी
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सबसे पहले मैं माफ़ी मांगता हूँ हज़रत हौव्वा से। 

मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि उस ने आदम को बहकाया था 

और उसके मासिक धर्म की पीड़ा उसके गुनाहों की सज़ा है जो रहेगी सृष्टि के अंत तक। 

मैंने ही बोये थे बलात्कार के सबसे प्राचीनतम बीज। 

 

मैं माफ़ी माँगता हूँ उन तमाम औरतों से 

जिन्हें मैंने पाप योनि में जन्मा हुआ घोषित करके 

अज्ञान की कोठरी में धकेल दिया 

और धरती पर कब्ज़ा कर लिया 

और राजा बन बैठा 

और वज़ीर बन बैठा 

और द्वारपाल बन बैठा 

 

मेरी ही शिक्षा थी यह बताने की कि औरतें रहस्य होती हैं 

ताकि कोई उन्हें समझने की कभी कोशिश भी न करे। 

कभी कोशिश करे भी तो डरे, उनमें उसे चुड़ैल दिखे। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन तमाम राह चलते उठा ली गईं औरतों से

जो उठा कर ठूंस दी गईं हरम में। 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन औरतों से जिन्हें मैंने मजबूर किया सती होने के लिए। 

मैंने ही गढ़े थे वे पाठ कि द्रौपदी के कारण ही हुई थी महाभारत 

ताकि दुनिया के सारे मर्द एक होकर घोड़ों से रौंद दें उन्हें 

जैसे रौंदी है मैंने धरती। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन आदिवासी औरतों से भी 

जिनकी योनि में हमारे राष्ट्र भक्त सिपाहियों ने घुसेड़ दी थी बन्दूकें 

वह मेरा ही आदेश था 

मुझे ही जंगल पर कब्ज़ा करना था। औरतों के जंगल पर। 

उनकी उत्पादकता को मुझे ही करना था नियंत्रित। 

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ निर्भया से 

मैंने ही बता रखा था कि देर रात घूमने वाली लड़की बदचलन होती है 

और किसी लड़के के साथ घूमने वाली लड़की तो निहायत ही बदचलन होती है। 

वह लोहे की सरिया मेरी ही थी। मेरी संस्कृति की सरिया।  

 

मैं माफ़ी मांगता हूँ आसिफ़ा से।

 तीसरी कविता देवेन्द्र आर्य की है । जिसने सांप्रदायिक आग में  झोंक दिए गए ङां कफ़ील पर कविता लिखी । ङां कफ़ील भारतीय मानस पटल पर कभी धुंधले नहीं हो सकते ।और न धुंधला होगा गोरखपुर का वह अस्पताल । जहां महज एक आक्सीजन सिलेंडर की कीमत ने , न जाने कई मासूम बच्चों की जान ही ले ली ।और कई माताओं- पिताओं की गोद ही सूनी कर दी । जिस पर निरंकुश शासक वर्ग का रवैया देखते ही बन रहा था। देवेन्द्र आर्य की इस कविता का उद्देश्य मुझे नहीं लगता कि कफ़ील को बचाना और योगी को गरियाना ही है । यह देश के वर्तमान राजनीतिक हालात में निरंकुश शासक वर्ग द्वारा सत्य को असत्य में तब्दील करने की चालाकी भरे चाल और चरित्र का भी पर्दाफाश कर रही है । कविता व्ययंग की धार से शुरू होकर उसी व्यय॔ग से आबद्ध देश के कई राजनीतिक घटनाक्रमों ,उनके हराम पंथियों व कारगुज़ारियों का टोह लेती व्यय॔ग पर ही खत्म होती है ।
(गोरखपुर गैस त्रासदी के आरोपी डा. कफ़ील के लिए)

मौत का कोई शीर्षक नहीं होता 
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तेरी नालायकियत यह थी कफ़ील
कि तेरे कारण हमारी नालायकी उजागर हो गयी 
मुसलमान कहीं का !

कम थे मरीज़ क्या तेरे नर्सिंग होम में 
कि नींद नहीं आ रही थी उस रात
चला आया मसीहा बन बच्चों की घुटती साँस बचाने
अब गिन अपनी सांसें 
ऐसी सजा देंगे कि खाली सिलिंडर भी बोल उठेंगे 
हम तो लबालब भरे हैं मालिक 
रिसने को तैयार .

इतनी कमज़ोर नहीं नाक हमारी डाक्टर  
कि बच्चे काट ले जायं  
अब तो वो इलाज होगा कि पानी बोल उठेगा 
मैं इतना बेपानी नहीं सरकार
कि आप के सरोवर से दगा करूँ

मैं तो जापान कभी गया ही नहीं 
बुखार से मेरा कोई ताल्लुक नहीं 
मैं तो कब का टीका जा चुका हूँ 
देख लो अपना रजिस्टर 
असल में टीके का खेल तो फीका किया राप्ती ने .

राप्ती थरथराने लगी 
कसम गऊ माता की 
मैं तो मान की बेला में गोरखपुर थी ही नहीं 
चली गयी थी आसाम फिर बिहार रिश्तेदारी में 
वैसे भी मुझे मेधा से डर लगता है इन दिनों 
कब नर्मदा दीदी को छोड़ मेरे पीछे पड़ जाएँ
मैं ठहरी नमामि गंगे की 
सच्ची कहती हूँ सारा खेल हवा का है 
उसी ने आप के खिलाफ साजिश की है 
इतना भी कम नहीं था अनुदान 
कि आक्सीजन पर भारी पड़ जाय पिछवाड़े की हवा . 

क्यों री हवा ! 
तुझे रोज़ सुबह पवन कह कर मैं बछड़ों की तरह सहलाता रहा
इसी दिन के लिए 
कि तू योगी से मोहब्बत करते करते वियोगी हो जाय 
रोज़ देशी घी का धुआं पिलाया 
भेजे तेरे पास मेवा मिष्ठान्न अग्नि के हाथों 
इसी दिन के लिए म्लेक्छिन !

ऐसा न कहें सरकार 
हवा तो अभी भी आपकी ही है 
आपकी ही पालकी ढो रही है हवा 
ई ससुर अगस्तवा सब गड़बड़ किये है 
कई बार टोका कि सावन में साग 
और भादों में दही की चिंता छोड़ दिमाग की चिंता कर 
कि कहीं मुंह न फुला के बैठ जाये दिमाग 
मगर हुआ वही 
बाकिर गलती उसकी भी नहीं 
पूछ लो कलेक्टर साहब से 
अब तो लालकिला भी जान गया कि जब से 
विपदा को आपदा का ख़िताब मिला है 
उसका दिमाग फूल के कुप्पा हो गया है 
बड़े नहीं फंसे तो फुसला लिया बच्चों के दिमाग को 
संस्कारों की कमीं होगी तो यही सब होगा न !

जिद्दी होते हैं बच्चे 
मरने की ठान ली तो ठान ली
न जीने की फ़िक्र न मरने का गम 
उनके चक्कर में बदनाम हुए हम 

खैर छोड़ो 
बाबा गोरखनाथ की कसम 
ऐसी सजा देंगे कि डाक्टर इलाज करना भूल जाएंगे
और मरीज़ डाक्टर के पास जाना 
एक ही इलाज होगा 
हाथ दिखाना 
जाप कराना 
और मोदियाना 
बुखार छूट जायगा बुखार को 
रामदेव हैं न !

न रहेगा पानी न उगेगा धान
न जायेगी मासूमों की जान
है न मेरा देश महान .  
****
17.8.2017

और अंत में यह कि फरीद ख़ान और देवेन्द्र आर्य दोनो ही की कविता में काव्य भाषा का सधाव , उसका पैनापन, उसकी संप्रेषणीयता कविता को उस शिखर तक ले पाने में सफल हुई दिख रही है जहां तक कि उसे जानी चाहिए जिसका कि वो हकदार है ।

Tuesday, April 27, 2021

जहां कवि होगा : किशनलाल

समकालीन हिंदी कविता के विगत तीन चार दशक निश्चय ही लोक बनाम महानगरीय बोध , फिर प्रतीकात्मक ब्यौरों , चीज़ों और घटनाओं का ज्ञान पाठ का रहा ‌। पर अंतिम दशक अथवा न‌ई सदी के आते-आते कविता के ये तय प्रतिमान अथवा काव्य धारा भी अस्थिर होता दिखा । इन मायनों में सदी का अंतिम दशक जिसमें कमलेश्वर साहू , बसंत त्रिपाठी , भास्कर चौधरी ,सतीश कुमार सिंह, कुमेश्वर कुमार , रजत कृष्ण , संजय शाम , निर्मल आनंद नंदकुमार कंसारी,विश्वासी एक्का , पूनम विश्वकर्मा , मृदुला सिंह ,सरीखे छग से संबद्ध कवियों के अलावा संतोष चतुर्वेदी , गणेश गनी , ब्रज श्रीवास्तव , सुरेश सेन निशांत , मणि मोहन मेहता , प्रेमनंदन , सुमित वाजपेई , सिद्धार्थ वल्लभ , आरती तिवारी , यतीश कुमार , आदि कवियों ने भी अपने - अपने काव्य सृजन का लोहा मनवाया । यह ठीक है कि इन कवियों की कथ्य , शिल्प और भाषा तथा उसकी अंतर्वस्तुएं अलग-अलग रही है पर वे सृजन के स्तर प्रचलित ढर्रे से बाहर निरंतर नवोन्मेष  , नव प्रयोग करते दिखे । किशन लाल भी इन्हीं कवियों में से हैं ।
किशन के इस संग्रह को पढ़ते हुए एक चीज मुझे बार बार ठिठकने को विवश किया और मैंने नोट किया कि उनके कुल रचनात्मकता के केन्द्र में प्रमुख किरदार 'भोग्या' है ; भोगा यथार्थ है , उनका अपना जीवन अनुभव और उसका निचोड़ है । जो कि  मानव के वस्तु रूप में हो रहे रुपांतरण तथा उसके संघातों को न केवल चिन्हांकित कर उसे क्रमबद्ध ही करता है बल्कि उसका विरोध भी करता है ।  यही नहीं ; लोक अथवा महानगरीय भावबोध , प्रतिकात्मक ब्यौरों  और चींजों तथा घटनाओं के बीच किशन की कविता में मुझे एक नया स्वर दिखलाई दे रहा है ; दलित चिंतन और स्त्री विमर्श का स्वर । जो उन्हें अपने समकालीनों से भिन्न बनाती है ।
        किशन जेनुइन कवि हैं । उनकी कविता में जीवन तथा अनुभवों का सान्द्र संसार है। संवेग का स्तर काफी गहरा है । समाजिक सरोकार व उसका ताना-बाना उनकी कविता में जैसी आई - दिखी वैसा छग के काव्य परिदृश्य पर कम ही दर्ज हुई । यानी उससे भी अच्छी बात यह कि इसमें वे जीवन की रागात्मकता से बनी बनाई वाली कुलीनतावादी काव्य धारा से खुद को अलग कर ढांचागत परम्परा को तोड़ वे जीवन से उसके संघर्ष से जुड़कर आगे आए । यह किशन का तेवर है कि उसने बदलाव की सूरत तय की , इबारत लिखी । जो कि उनकी 'ईक्कीसवीं सदी' शीर्षक कविता में दिखलाई पड़ता है । यह कविता किशन के क‌ई-क‌ई और गंभीर आपत्तियों को एक साथ हमारे दृश्य पटल पर रख ग‌ई । किशन इस कविता में जहां अपने लोक के साथ भ्रमण , विचरण करते दिखाई देते हैं वहीं उनका वर्ग चेतना भी उठ खड़ा होता है । यकीनन यह किशन का अपना लोक है और उसके प्रति समर्पण भी । यद्यपि किशन की कविता में वैचारिक आग्रह व प्रतिबद्धता एक सीध पर है पर यह उनका स्वचलित राडार ही है कि वे समाजिक अश्पृश्यता और वैमनस्यता से भरे इस संसार को देख समझ रहे होते हैं नि:शब्द नहीं रहते न गोया छाती पीटते हैं अपितु दलित लेखन और स्त्री विमर्श को एक आधारभूत ढांचा प्रस्तुत करते हैं ।  मसलन 'नारी साक्षरता' 'नहीं' 'किसनुवा' 'ईंट भट्ठे की एक सुबह' 'घृणा' इत्यादि व संग्रह की पहली कविता 'अभिवादन' में यह देखा जा सकता है ।

यह 'अ'
तुम्हारी वह शक्ति है
जो कल खेत पर
ज़मींदार की कुदृष्टि से बचाएगा
जरुरत पड़ने पर
यह थप्पड़ का आकार लेता हुआ
उसके गाल से चिपक जायेगा

किशन चूंकि एक मंझे हुए कलाकार हैं अतः उनकी कविताओं में जिस शिद्दत के साथ समाजिक सहभागिता , जागरूकता , मूल्यों के स्थापन्न वर्गीय चेतना के आरोह वह वैविध्यता का एक बड़ा जखीरा भी किशन की कविताओं में परिलक्षित होता है । यह कम ,विरल नहीं है । कवि के संग्रह की शीर्षक कविता 'जहां कवि होगा' व 'अगर कटते रहे पेड़' में वे अपने उन चुनौतियों के स्थापन्न उस दायित्व का भलिभांति निर्वहन करते हैं जो कि उनका है ।

 संग्रह की दो कविताएं ख़ास कर 'नदी के लिए' और 'नदी का मर जाना' इन अर्थों में एक सशक्त कविता है कि नदी एक जीवित इकाई है । एक पूरी सभ्यता है । और बगैर उसके समूची सृष्टि का मर जाना है । पर पूंजी व बाज़ार के दबावों में बैसाखी पर टिकी हुई सरकारों तथा दलाल पूंजीपतियों , औद्योगिक घरानों की मिश्रित व्यवस्था ने तमाम जानकारी और खतरों के बावजूद उसके उत्खनन ,  दोहन व जल अधिग्रहण कानून ला पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों , मूल्यों  को धता किया । यहां कवि का समाजिक चिंतन‌ व आग्रह बड़े ही मार्मिक रूप में अभिव्यक्त होती है ।
किशन को अपने गंव‌ई -गांव , कस्बे , उसके चौक - चौराहे , हाट-बाजार , दिनचर्या व जिजीविषा से गहरा आत्मीय जुडाव है 'धमतरी' सीरीज की कविताओं में कवि का अपने समय के सापेक्ष तथा उसके इर्द - गिर्द घटित घटनाओं , ब्यौरों से एक सम्पूर्ण समाजिक परिदृश्य ,जीवन दशा का भान होता है । जहां कवि धमतरी के रोमानियत को रिक्शे पर सवार स्कूल की ओर जाते देखता है तो उसके स्याह सच को बच्चों के पालिथीन , प्लास्टिक , कांच के शीशी बोतल बीनते, या कि मक‌ई चौक पर बिकते मजूरों , कि अथवा कोष्टापारा में बीड़ी बनाती स्त्रियों या फिर आदिवासी बालाओ की तीस पैंतीस रूपये में दिन भर खटती दशा व दरिद्र में देखता है।
यह अनायस ही नहीं है तमाम अवरोधों , असहमतियों के बावजूद किशन का बार बार धमतरी के सौंदर्य के लिए ठिठकना , रूकना और अपनी आतुरता और विकलता के बीच रागात्मक होना । यह किसी कवि के गहरे समाजिक बोध और सरोकारों से आती है ।
किशन की सम्प्रदायिक सौहार्द पर लिखी कविता 'एक पल के लिए' एक बेहतरीन व मार्मिक कविता है । यह ऐसे समय में हमें ढांढस बधाती है और पूरा विश्वास जगाती है जब तमाम सम्प्रदायिक शक्तियां कुनबों से निकल कर नग्न प्रदर्शन करते अपनी ताकत का मुजाहिरा कर रहे हों । कभी 'लव जिहाद'  कभी गौ रक्षा ,कभी बीफ के संदेह में, तो कभी गौरी लंकेश , दाभोलकर , कलबुर्गी , पानसरे की नृशंस हत्या करके ही । तब भी किशन का मानव मूल्य के प्रति आस्था उन्हें ज्यादा प्रमाणिक और सत्य बनाती है जो कि इस कविता में दृष्टि गोचर होता है ।

अपने ख़ास मित्रों के जिक्र में
बसंत त्रिपाठी , कुमेश्वर कुमार के बीच
कैसे भुला दूं
फरहत , सलीम , और नासिर अहमद सिकंदर को 

यह कवि का अपना राग है । वह चीज़ों को संग्रहित करता है । विभाजित नहीं करता , अलग नहीं करता । वह देखता है तो उनमें बसे विशाल महामानवों को जिन्होंने उनके जीवन के भीतर मनुष्य होने की समझ पैदा की । उसे गति व दिशा प्रदान की । किशन की कविता में लोक भाषा लोक मुहावरे तथा लोक जीवन की व्यवहारिकी , बारिकी , मूर्त्त वस्तुएं व उनका सूर्ख रंग विपुल है । जो कि उनके लोक जीवन लोक , परम्पराओं से उनके गहरे सानिध्य व सरोकारों से आई है । किशन अपनी कविता में उस लोक का प्रतिनिधित्व करते हैं जो तत्कालीन व्यवस्था की नादानी  ,छद्मों और आडम्बरो से मारे जा रहे हैं ।और व्यवस्था के क्रूरता के प्रति असहाय है । वे व्यवस्था के इस सशंकित चेहरे व स्वास्थ्य से खासी नाराज़ होते हैं । वे उस अमानवीय और क्रूर व्यवस्था के चरित्र और रहस्यों से न केवल पर्दा गिराते हैं अपितु उन लोक जन से मुखातिब होते हैं उन्हें संबोधित करते हैं तथा वैकल्पिकता का मार्ग भी प्रशस्त भी करते हैं । वे कहते हैं

बारसूर कुटुमसर की
अंधेरी गुफाओं से बाहर निकलो
और बीच का
रास्ता तलाशना छोड़कर 
सोचों कि
जीने लिए
कोई तीसरा विकल्प क्या है

किशन की इस कविता से गुजरते हुए एकबारगी लगा कि किशन श्रीकांत वर्मा के मगध के तीसरा रास्ता से प्रभावित हैं जहां तीसरा रास्ता क्या है का साफ़-साफ़ चित्र नहीं बनता । परन्तु किशन की इस कविता में वह स्पष्ट परिलक्षित होता है जो कि उनके प्रतिकार का है , विद्रोह का है और यकीनन संगठित विद्रोह का है ।

किशन के इस संग्रह में वर्ग चेतना की पूरी एक समृद्ध परंपरा भी दृष्टिपात होता है । चूंकि वे ऐसे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो श्रम के अवमूल्यन , विघटन के कारणों को उसके ठीक - ठीक रूप में पहचान तो करते ही हैं साथ ही उसके महत्व का रेखांकत करने कोई कसर नहीं छोड़े ।

धमतरी को जानना हो
तो पहुंचो मक‌ई चौंक
और देखो अपनी आंखों से
बिकते हुए मजूरों को

कवि अपनी इस कविता में अपने आग्रह के जरिए संवाद को बढ़ाता है । मजूर और नियोक्ता के बीच के फांक को स्पष्ट करता है ।

संग्रह में अनेक ऐसी कविताएं हैं मसलन 'पीपी के लिए' 'भाभी: छह कविताएं' विशुद्ध परिवारिक
 पृष्ठभूमि की कविताएं हैं जो हमारे आदिम राग तथा मनुष्य का मनुष्य से रिश्ता और उसके अंतर्संबंधों को गहन सामाजिक अर्थ प्रदान करती है ।

यानी , कुल मिलाकर किशन का यह संग्रह उनके कवि होने के दायित्व बोध में पूर्णतः खरा है और अपनी अंतर्दृष्टि में नया भी ।

Monday, April 12, 2021

अंजन कुमार

कुमार अंजन को बतौर अंजन कुमार नाम से जानता हूं मैं । निस्संदेह उससे बहुत और अतिरिक्त स्नेह सर्वथा रहा है मेरा । पर रचना और चयन के मामलों में मैं उससे इत्तेफ़ाक बहुत देर से रख पाया । शायद यह मेरी कमी थी या फिर धैर्य ? पर मुझे लग रहा है कि इस कवि पर चर्चा अब नहीं तो कब ? अतः आज मैं वैयक्तिक हूं कि अपने चयन मामले में खरा ; यह साथी तय करें । 

अंजन कुमार न‌ई सदी की समकालीन हिंदी कविता में उस समय प्रवेश करते हैं जब देश में विघटनकारी साम्प्रदायिक शक्तियां पूरे ताकत से उठ रहे थे और अपने सामर्थ्य को जुटाने में लगे थे । निश्चय ही यह वह समय था जब गोधरा घटी , बाबरी का ध्वंस हो चुका था और सोवियत गणराज्य नेस्तनाबूत । एक ओर भारत का सेक्यूलर राजनीति छिन्न भिन्न हो , सम्प्रदायिकता के रंग में रंग गया था । पूंजीवाद अपनी पांव पसार उदारीकरण के रास्ते पर चल पड़ा था । अंकल-डंकल झोला लिए देश को झोल रहे थे । नव‌उदारवाद का चेहरा मोटे तौर पर तय हो चुका था पर उसकी पहचान को स्पष्ट रुप में घोषित किया जाना शेष था  ; खैर । 
आश्चर्य कि उस समय का यह नवांकुर कवि चुप नहीं था । अधीर था और बहुत बेचैन भी । उसकी यह बेचैनी और तड़पड़ाहट उन दिनों शिद्दत से उनकी रचनाओं में आकार लेने लगी थी । कुछ ऐसा लिखा जा रहा था उससे ,  कि उसकी शिनाख्तगी तय थी । अतः कहना चाहूंगा कि यह कवि अब नया नहीं है । साज और साध्य के मामले में सजग है । चौकन्ना है । बजाय उस स्त्री के बगल में लेटकर धूमिल के शब्दों में कहूं तो ; अधिक दायित्व बोध से लैस है । ककहरा को बहुत पीछे छोड़ आया है । इस कवि की कविता 'अफीम' अचानक ही मेरे फेसबुक पर दिखाई दी । मेरा मोह जाग गया । दर‌असल अंजन कुमार की इस कविता में कोरोना महामारी के बाद उपजे भय और आशंका के बीच प्रधानमंत्री के लाकडाऊन को सफल बनाने के लिए ढुंढे ग‌ए अवैज्ञानिक सोच और छद्म की मीडियाकरी थी । जिसका अंजन कुमार ने गहरी और सूक्ष्म पड़ताल की है । अंजन ने इस कविता में न केवल  कोरोना के विरुद्ध लड़ाई में दर्ज उस अवैज्ञानिकता को आधार बनाए जाने को नकारा बल्कि सात पर्दे पार के रहस्य को भी बेनकाब किया । अंजन की कविता की बानगी ही इस बात की गवाही है ।

 दृष्टव्य है कविता 'अफ़ीम'
                                                                                                                                                                                                    

                  अफ़ीम
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भय से घरों में कैद 
लोगों के टीवी चैनलों में 
परोस दी गई है अफ़ीम 

जिसे चाटते हुए दिन रात
इतने आदी हो जायेगें एक दिन 
कि हर समस्या का हल 
हम अफ़ीम के नशे में ढूंढेंगे 

तब कितना आसान हो जायेगा
सच को छुपा लेना
हर समस्या के लिए
किसी को दुश्मन बना देना 

कितना आसान हो जायेगा तब
अफीमचियों के हाथों में 
संविधान की जगह 
शस्त्र थमा देना ।     

                                                 तो वही अंजन कुमार दूसरी कविता 'ये आपकी तरह नहीं है साहब' में 'अच्छे दिनो' के आस में एक राज्य से दूसरे राज्य की सीमा लांघ गए लोगों का लाकडाउन के बाद घर को लौट जाने की जद्दोजहद में दर-ब-दर की जो स्थिति उत्पन्न हुई , उस पीड़ा, तकलीफ और कातरता का भयावह दृश्य को बयां किया ।

 बयानगी दृष्टव्य है 

                                                                                                     ये आपकी तरह नही है साहब !
        _______________________

                                        
देख रहे हो साहब ! 
उस आदमी को
इस संकटपूर्ण भयावह समय में भी 
जिसने नहीं छोड़ा अपनी पत्नी का साथ
आपके इस नफरत भरे समय में भी
प्रेम की मिसाल बन 
चलने से लाचार पत्नी को कंधे पर बैठाकर
मीलो का सफर तय कर रहा है जो 

देख रहे हो साहब !
उस रिक्शा चलाने वाले पिता को 
जो बेख़ौफ़ अपनी दो छोटी-छोटी बेटियों को रिक्शे में बैठाये 
कुछ पानी की बोतलों और किताबों के साथ 
कई दिन, कई रात का सफर तय कर 
पहुँचना चाहता है अपने घर

देख रहे हो साहब !
उस लड़के की हिम्मत
जिसने अपने टूटे टांग का प्लास्टर 
खुद अपने हाथों से निकाल दिया है
कि उसे मीलों पैदल चलने में उसे परेशानी न हो

आप देख रहे हो साहब !
ये जो चले आ रहें है चीटियों की तरह 
ये मेहनत, मजूरी कर अपना घर चलाने वाले हैं
ये किसी के पति, किसी के पिता 
किसी के भाई, किसी के बेटे, 
किसी के मित्र, किसी के रिश्तेदार हैं

इनका अपना घर परिवार है 

ये ख़ालिस और मुकम्मल आदमी हैं
इनकी अपनी जिम्मेदारी है
इनके लिए सबसे बड़ी महामारी
इनकी भूख और बेकारी है ।  

तीसरी कविता 'तानाशाह' अंजन के लिए  __  इन मायनों में मील का पत्थर साबित होती है कि इस शीर्षक और विषयवस्तु पर अनगिन कविताएं हैं और अलहदा भी है उनमें यह भी शामिल है ।  तानाशाह की शिनाख्तगी को लेकर समकालीन कवियों ने न केवल वैविध्य काव्य बिम्ब का भरपूर प्रयोग किया है । बल्कि शिल्पगत वैशिष्ट्यता को भी जहीनियत में रखा । मसलन मंगलेश डबराल, कौशल किशोर, मणिमोहन मेहता, भास्कर चौधरी, कुमार अनुपम,  निर्मल गुप्त इत्यादि । बताना न होगा कि अंजन कुमार की यहां प्रस्तुत कविता तानाशाह भी इन्हीं कवियों के परस्पर चाल और चरित्र के छद्म में गूंथें खलनायक का निर्विवाद पहचान करती है जो कि
 कविता के मानकीकरण पर खरा है

               तानाशाह
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तानाशाह 
सबसे पहले चुनता है एक सम्बोधन
जैसे हिटलर ने चुना था फ्रेंड्स 

फिर वह चुनता है वह स्थान 
जो जनता की आस्था केंद्र होता है
जैसे हिटलर ने चुना था म्यूनिख को
 

फिर वह चुनता है 
अपना एक धार्मिक दुश्मन 
जैसे हिटलर ने चुना था यूहदीयों को 

फिर वह चुनता है अपने हितचिंतकों को 
जैसे हिटलर ने चुना था
चरम पूंजीपतियों को

फिर वह चुनता है
अपने सहयोगी को 
जैसे हिटलर ने चुना था कारपोरेट को
 

फिर वह बनाता है अपना संगठन
जैसे हिटलर ने बनाया था 
मिलीशिया, यंग फासीवादी और नागरिक सेवा संगठन 

फिर वह चुनता है अपनी विचारधारा
जैसे हिटलर ने चुना था राष्ट्रवाद

फिर वह 
अपने सहयोगियों और संगठनों के माध्यम से 
पहले बढ़ाता है जनता की आस्था
फिर उठाते हुए उसी का फायदा
फैलाता है अंधराष्ट्रवाद, अफवाहें, भय और नफ़रत
करवाता है अपने दुश्मनों की हत्याएं 
अपने संगठन के हाथों 
जैसे हिटलर ने करवाया था 
यूहदीयों, कम्युनिस्टों, लेखकों, कलाकारों, पत्रकारों 
और तमाम अपने विरोधियों की 
क्योंकि विरोध से डरता है वह
इसीलिए वह कभी नहीं करता संवाद 
किसी भी बात पर
पूछता नहीं किसी से
केवल जारी करता है फरमान 
वह भी इस तरह से
कि उसका हर निर्णय लगता है जनता को
जैसे उनके हित के लिए है 

वह झूठ को इस तरह कहता है बार-बार
की लोग उसे सच समझने लगते हैं
और करने लगते हैं उसका अनुशरण
इस तरह वह जनता की आँखों में 
बांधकर अंधराष्ट्रवाद की पट्टी
भेड़ों की भीड़ में कर देता है तब्दील 
और जब , जैसे चाहे हंकालता रहता है

फिर तोड़ देता उन तमाम 
पुराने सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक ढांचों को 
जो उसकी सत्ता में बाधक है 
ध्वस्त कर सारे सार्वजनिक उपक्रमों को 
कर देता है इजारेदारी पूंजी के हवाले 
क्योंकि वह जनता का नहीं
होता है केवल चरम पूंजीपतियों का हितैषी

इस तरह एक दिन 
लोकतंत्र की हत्या करके
वह सब पर कर लेता है कब्जा
और बन जाता है
सबसे प्रभुत्वशाली तानाशाह 

 
अंजन की इस कविता में एक संप्रभु राष्ट्र की प्रभुता को बचाए रखने की चिंता है ।उसके गांभीर्य को नकारा नहीं जा सकता ।बताना ना होगा कि इधर हाल के बदले हुए हालात से मध्यमवर्गीय चयन और चुनाव पर इस कविता में सवालिया क्षोभ है । चूंकि चीज़ों के परस्पर सच दृश्य में नहीं है । वह गायब है । फासीवाद और हिटलर के क‌ई अदृश्य चेहरा और उसका बिम्ब है । जिसके सहारे तानाशाह की स्थापनाएं आगे बढ़ता है और जब चरम की प्राप्ति के बाद वह पूरा नंगा हो जाता है तब चीजें बिखरी हुई होती है । कहना तो नहीं चाहिए ,पर देश दुनिया में जितने भी उथल पुथल हैं , वह सहूलियत परस्ती से है । इस सहूलियत परस्ती अर्थात् कि गंवारूपन का जिम्मा सबसे अधिक मध्यमवर्ग ने उठाए । इसमें संदेह नहीं है । यह वही मध्य वर्ग है जिसने अपने -अपने गांव को लौट रहे दुखीजनों के दुख को देख रो लिया और क्ष‌ण भर में सब को दरकिनार कर गाने लगा । पर उसने एक वास्तविक और जिम्मेदार नागरिक बोध से दुःख के कारकों पर ऊंगली रखने की जहमत उठाया नहीं कभी । वह नौ बजे , नौ मिनट के प्रोपैगंडा में आतिशबाजी करते दिखा ,थाली पीटा। अंजन की इन कविताओं में ईमानदार कवि की अभिव्यक्ति है । समाजवादी स्थापनाओं का नज़रिया है अंजन की कविताओं में प्रतीक बिम्ब की प्रधानता है के साथ सीधे फ़ूल को फूल और  शूल को शूल कहने के सामर्थ्य भरे हुए हैं । इस क्रम में उनके यहां 'नाटकबाज' 'गिद्ध' 'मसखरे' जैसी अनेक कविताएं हैं  
        

                   मसखरे
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मसखरों का 
कोई इतिहास नहीं होता
लेकिन हर इतिहास में होते हैं मसखरें
राजा, रानी, मंत्री
हर किसी को
हँसाते, गुदगुदाते, खुश रखते
मसखरे

मसखरों की मसखरी ही 
उनका रोजगार होता है 
उनका दाना-पानी
सो उसी के सहारे बने रहते हैं 
हर दरबारों में 
यहां तक कि अंतःपुरों में भी 
कब, किसे, कैसे खुश रखना है
यह बहुत अच्छे से जानते हैं मसखरें

अपने स्वार्थ सिद्धि में लीन
आत्ममुग्ध मसखरें
सामाजिक सरोकारों से परे
केवल मसखरें होते हैं

न वे गंभीर होते हैं किसी के लिए
न कोई गंभीरता से लेता है उन्हें ही
हर कोई पसंद करें उन्हें
इसी में खुश रहते हैं मसखरें

नये-नये किस्से
नये-नये जुमले
नये-नये झूठ
ही इनकी संपत्ति 
या यूं कहे कला होती है

ऐसे मसखरों से 
भरा पड़ा है इतिहास

मगर
इतिहास कभी भी 
मसखरों का रहा नहीं। 

एक बात और कि वैचारिक बोध और असहमति की कविताओं में ख़ासी मशक्कत के बाद भी चीजें घूम फिर कर वहीं आ जाती हैं ।  अपने संधान और लक्ष्य भेदन के लिए वह सीमित अस्त्र तथा विचारों में विश्वसनीय बने रहती है । अंजन के यहां वैचारिक कविताओं के परस्पर 'अंधेरे की उजली गुफा' 'बीड़ी बनाती स्त्रियां' 'आवाज़'  'संवादहीनता' जैसी कलात्मक और संवेदनशील कविताओं का विस्तृत कैनवास है । जिनमें चीज़ों का दिखना और होने के बीच के फांक का भयावह सच है ।  'अंधेरे की उजली गुफा' शीर्षक कविता में यह बिम्बों में उजागर हुई है। 

        अंधेरे की उजली गुफा
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उदास चेहरों के बीच
एक लालटेन थी
जिसमें अंधेरा नहीं
समय जल रहा था

अंधेरा
उजाले की मोटी दीवार के पीछे खड़ा हंस रहा था

उन कटे हुए हाथों पर
जो जमीन में हाथ गड़ाये
ढूंढ़ रहे थे अपनी घड़ी
जिसमें समय न जाने कब से
दफ्न पड़ा था

उन बूढ़ी आँखों पर
जो ढूंढ़ते हुए अपनी आँखों की रोशनी
ले आये थे मुफ्त में
जीवनभर का अंधेरा अपने लिए

उन स्त्रियों पर
जो गई थी देश के विकास में नसबंदी कराने
और दे आई थी अपनी जानें

उन तमाम लोगों पर
जो सायों की तरह उतरते सीढ़ियाँ
अपने घरों की
और गुम हो जाते भीड़ में
अपने खो चुके चेहरों की तरह

अंधेरा हंस रहा था
जिस उजाले पर
एक अंतहीन अंधेरे की उजली गुफा थी
एक तिलस्म अनंत इच्छाओं और भूख का
जिसकी मोहपाश में बंधें
गिरते है जहाँ, एक-एक कर
ठगे, पर फूले हुए चेहरे लिए
आश्चर्य लोक के यात्री बन सभी

उजाले के शोर में गुम
बाँधें हुए आँखों पर रंगीन चमकदार पट्टी
सब दिखते एक से
एक से भाव और उत्तेजना में लिप्त
अपने को ही उधेड़ते
खोलते आदिम वासनाओं के द्वार
भटकते रिक्तता के मरूस्थल में
उजाले की चमकती मृगमरीचिकाओं के साथ
रेत होते जीवन तक

जहाँ पाने के लिए कुछ भी नहीं
एक और नई इच्छा के सिवा
और इच्छा भी किसी इच्छाधारी सर्प की तरह
अपना रूप बदल-बदलकर डसने को तैयार
जहर बुझे तीरों की तरह आँखों को बेधती हुई
विषाक्त करती पूरे जीवन को

मैं गिरता हूँ इस उजली गुफा में
सूखी चाम पर
चूसी गई हड्डियों पर
पथराई आँखों पर
क्षत-विक्षत भूखी नंगी सैकड़ों मृत देहों पर
दबी हुई सरकारी योजनाओं के बड़े-बड़े
विज्ञापनों के नीचे
जो कभी खबर नहीं बन पायी
किसी भी अखबार की मुख्य पृष्ठ की
ना ही दिखाई गई बार-बार किसी भी टी.वी. चैनल पर
जैसे दिखा दी जाती है अक्सर
किसी माडल के अधोवस्त्र के गिरने की खबर
बार-बार लगातार पूरी रोचकता के साथ

एक उजली और चमकदार गुफा है यह
जिसमें हर बड़ा चेहरा
प्रेतआत्माओं-सा घेरे हुए
लगातार लगा हुआ है

आत्महीन
विवेकहीन
चरित्रहीन
और व्यक्तित्व विहीन
करने में हमें।                           

 एक कवि कलाकार जब बहुत सारे अदृश्य चित्रों को , हमारे समय के अनेक सामाजिक , राजनीतिक यथार्थ को , दृश्य चित्रों में बदलने की लालसा से सराबोर होने लगता है और वह उसे उस मानक रूप में दर्ज नहीं कर पा रहा होता है जिसकी मंशा उस पर बलवान होती है ; अर्थात कि चीजों के दृश्यांश के लोभ संवरण से वह मुक्त नहीं हो पाता और वैचारिक तथा कलात्मकता के ऊहापोह और जंजाल से घिर कर वैकल्पिक दशा के निर्माण में धारहीन होता महसूस करता है ; तब वह बिम्ब के सृजन को श्रेयस्कर मानता है । बिम्ब विधान अपनी कथन को बहुत कम शब्दों में समेट उसे अधिक व्यापी बनाने की वह काव्य कला है जिसमें एक के परस्पर अनेक ध्वनि , लय , अंतर्लय गोते लगाने लगते हैं । और सृजन अपनी समग्रता में अभिमुखित होता है । अंजन के यहां विचारधारा और कला का यही टकराव बिम्बों के सृजन का कारण है । 'स्वप्न और यथार्थ' कविता इसी उहापोह से जनित कविता है । जिसमें विचार और कला के बचाव का जोखिम तथा जद्दोजहद है।   

        स्वप्न और यथार्थ के बीच
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कुत्तों के रूदन में 
गहरी हो चुकी रात
गूंज रही है सूखे पत्तों पर

चांद 
अटका हुआ है पेड़ की शाख पर 
किसी उदास गेंद की तरह
और तारें धुंध में कहीं
दूर निकल गये हैं भटककर

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है

जहां सारे जरूरी मूल्य
पेड़ पर चमगादड़ की तरह
उल्टे लटके चीख रहें हैं
और सारा शहर
चादर से बाहर निकाले पांव
एक कभी न खत्म होने वाले
स्वप्न में डूबा हुआ है

एक ऐसा रहस्यमय स्वप्न
जो जितना विराट है 
उतना ही जठिल भी
जो जितना सुंदर है  
उतना ही भयावह भी

नहीं है तो सिर्फ
तर्क करने की जगह
संदेह करने की वजह
आश्चर्य है कि इसमें नहीं है 
कोई विराम चिन्ह भी
जहां थोड़ी देर ठहरकर
यह देखा जा सके
कि घंटे को पकड़ने के चक्कर में
मिनट के कांटे से गिरकर
सेकंड के हाथों
कैसे मारे जा रहें हैं
हम लगातार

घड़ी हाथ में बंधी है
या हाथ बंधे है घड़ी से
कि सारे जरूरी प्रश्न 
छुटते जा रहें हैं यक-ब-यक
समय के अभाव में
हर चेहरा होता जा रहा है विद्रूप
दिन-ब-दिन एक भाव के अभाव में

मनुष्यता जैसे कोई पिछले जमाने की 
बात हो गई हो
और अपराधबोध
कोई पुरानी दिल की बिमारी

यथार्थ से कोसो दूर
एक स्वप्न में डूबा यह शहर
बिल्कुल उस चिड़िया की तरह है
जिसे दाना तो दिखाई देता है
पर अफसोस जाल नहीं

जो एक रात भटककर
जा पहुंचती है किसी कमरे में
ढूंढ़ते हुए एक सुरक्षित कोना
और अगले दिन मिलती है
मरी हुई

यह स्वप्न और यथार्थ के बीच
चूक गये समय की सर्द रात है

जहां रात के ब्लैकबोर्ड पर 
खींचते हुए आड़ी-तिरछी लकीरें
उस नदी से बेखबर है सभी
जो खतरे की निशान से 
ऊपर बह रही है।

'बीड़ी बनाती स्त्रियां' श्रम साध्य लोगों की अंतर्कथा है । उनके साध्य से तादात्म्य संबंध की नाप है । लय और तुक का परिमाप है जो कि मशीनीकरण के इस युग में भी यांत्रिकता को उसके परस्पर चुनौती देता है ।  साहस और सामर्थ्य से भरे हुनरमंद मजबूत हाथों की हौसला-अफजाई है ।       

          बीड़ी बनाती स्त्रियां
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वे गोल बनाकर
बैठी हुई थी स्टेशन के एक कोने में
ऐसे, जैसे बैठी हों किसी आँगन में

उनके चेहरे पर 
न कहीं पहुँचने की बैचनी थी
न ही किसी सफर की थकान
एक समान भाव से बैठी 
बनाती हुई बीड़ियाँ
तैयार करती हुई बीड़ियों बंडल
वे इस तरह कर थीं बातें
कि जैसे बातें करना भी 
उनके इस काम में शामिल हो
न कोई हँसी, न कोई मजाक
कभी-कभी तो लगता
कि अपने आप से ही 
बतिया रही हैं सब

मैं जब तक देख पाता 
बीड़ी बनाने की सही-सही विधि
बीड़ी बनकर तैयार हो जाती

बीड़ी बनाते हुए
इतने अभ्यस्त हो चुके थे उनके हाथ
कि हाथ, हाथ नहीं
यंत्र लग रहे थे
जिनसे फूटने के बजाय कोई गीत
आ रही थी मशीन की धीमी आवाज

मानो वह
बीड़ी बनाती स्त्रियाँ नहीं
किसी यांत्रिक दुनिया के जीवित कल पुर्जे हों।

अतः कहना न होगा कि नई सदी की हिंदी कविता में अंजन कुमार अपनी इन कविताओं के बल बेहतर हस्तक्षेप करते नजर आए हैं । उनका मैं स्वागत करता हूं


युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...