विजय सिंह के संदर्भ में यह बताना काफी है कि वे समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में पहचाने गए ; अलावा इसके उनका रंगकर्म से भी गहरा जुड़ाव रहा है तथा वे समकालीन युवा लेखन को प्रोत्साहित करने वाली पत्रिका समकालीन सूत्र के संपादक भी हैं । यूं तो समकालीन हिन्दी कविता के नवें दशक में छग ने बड़ी महत्वपूर्ण साझेदारी की ; पर इस दशक के कवियो के साथ हिन्दी जगत के अन्यायपूर्ण रवैये ने छग को उनके जायज हक से महरूम ही रखा । कहना न होगा इस दशक में विजय सिंह के परस्पर नासिर अहमद सिकंदर , शरद कोकास , बुद्धिलाल पाल , त्रिजुगी कौशिक , आलोक श्रीवास्तव , माझी अनंत ,जयप्रकाश मानस , पूर्णचंद्र रथ , लक्ष्मीनारायण पयोधि , शाकिर अली , पथिक तारक ,विजय राठौर आदि रचनाकार अपनी रचनात्मकता के बूते सतत गतिमान रहे पर उनका वैसा मूल्यांकन नहीं हुआ जिसका कि वे वस्तुतः हकदार थे । इस संदेहास्पद वैचित्र्यपूर्ण स्थिति के निमित्त तत्कालीन आलोचना की बड़ी चूक को नकारा नहीं जा सकता । चूंकि इस दशक में छग की हिंदी कविता में जो उभार दिखा वह पहले नहीं था । इस दशक के कवियों में जहां विजय सिंह अपने लोक जीवन , लोक राग तथा लोक संवेदना में रचा-बसा आदिम राग को लेकर उपस्थित होते हैं , वही नासिर अहमद सिकंदर अपनी समाजिक भूमिका के साथ आते हैं और उन समाजिक दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो शरद कोकास अपनी गहन इतिहास बोध तथा राजनीतिक चेतना के साथ आ खड़ा होते हैं । विजय सिंह की अनेक कविताओं के ही आधार पर मुझे विजय सिंह की कविताओं में जो दिखा , वह है लोक जीवन का संघर्ष व उसका स्थापत्य और उसकी प्रचुरता । यहां प्रस्तुत कविता 'बोड़ा' उनकी मेरे इसी कथन की पुष्टि भी करती है । बोड़ा वस्तुतः छग में ही पाए जाते हैं ऐसा नहीं है । पर यह छग के लोक में ,उनके जीवन में वर्षा के आगमन के साथ बस्तर अंचल में उसके लोक के साथ उपस्थित होता है । जिसकी धमक का केन्द्र जगदलपुर का संजय बाज़ार होता है जिसे अपनी मुंडी पर उठाए ढो लाती हैं हर चुनौतियों से लबरेज़ गांव की बायले । विजय सिंह की कविता में बोड़ा वस्तुतःमहज एक खाद्य पदार्थ का नाम भर नहीं है बल्कि विजय सिंह के बोड़ा कहते ही एक सम्पूर्ण दृश्य का नाम हो जाता है। जहां बस्तर का लोक , उनका जीवन और उनका संघर्ष तथा उनकी दिनचर्या ; और क्रियाकलाप का अद्भुत दृश्य भी उपस्थित हो जाता है
"पहली बारिश में भीगकर
जंगल की मिट्टी हँसती है
और धूप की उजास में
सरई जंगल जी उठता है "
वही उनकी बोड़ा बोड़ा के शोर से और नापती हैं सोली- पैली से बोड़ा जब वे , तो शहर के चमचम बाज़ार को भी कर देती हैं फीका में उनका सतत् संघर्ष और निश्छल श्रम तथा उस मिट्टी की धमक दिखलाई पड़ता है ।
" बोड़ा - बोड़ा के शोर में ,बोड़ा के स्वाद में अच्छे - खासे शहर के बाजार को सांप सूंघ जाता है
वे नापती हैं सोली - पैली से बोड़ा
बोड़ा खरीदने वालों की भीड़ में
हर बार हारता है
शहर का चमचम बाज़ार !"
विजय सिंह की कविताएं लोक जीवन की कविताएं होती है । लोक जन का संघर्ष होता है । लोकमूल्य को स्थापित कर रही होती है । उनका लोक युद्धाभ्यास का आदी नहीं है , वह बेहद सरल और सहज है । कृत्रिम नहीं है , आवरणी नहीं है ,और छद्म का वाहक भी नहीं है । उनकी कविताएं वस्तुतः आदिम राग की अनुगूंज है , स्मृतिशेष कविताएं है । पर यह यहां तक बिल्कुल सही है इसमें कोई संदेह भी नहीं है । परन्तु इधर समय ने करवट बदल लिया है और उसका यथार्थ भी पहले से भिन्न हुआ है आज बस्तर जल रहा है , और एक जलता हुआ यथार्थ वह अपने भीतर समेटा हुआ धधक रहा है । जिसे हम केवल इन लोक संवेदनाओं लोकस्मृति से संभवतः नहीं भर पाऐंगे । एक यथार्थ वह है और एक यथार्थ यह भी है । जिसकी अपनी जटिलताएं बड़ी है और इसे पकड़ा जाना , समकालीन कविता का विषय भी बनना ; उतना ही जरूरी है जितना कि अन्य । मुझे ज्ञात है एक रचनाकार की अपनी शैली होती है , सीमाएं होती है पर कई - कई बार वे इन सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं । अतः बस्तर के इस प्रतिनिधि रचनाकार से मेरी अपेक्षाएं भी बढ़ी है । कविता में लोक जीवन , उनके दिनचर्या की भाव भंगिमाओं , हास- परिहास का बेजोड़ दृश्य के परस्पर उन जटिल यथार्थ को भी विजय सिंह चिन्हित करें और लाएं , वही , उसी विशुद्ध स्थानिक भाषा और उसके प्रकृति के साथ । बस्तर जी उठेगा । बस्तर के पृष्ठ पर जो स्याह है वह उनकी कविता की विषय वस्तु बने उनका कथ्य बने तो मैं समझता हूं बात बहुत दूर तक जाएगी ।
बोड़ा
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बस्तर में यह बोड़ा का मौसम है .मेरी एक कविता भी है " बोड़ा " कविता अधिकांश मित्रों ने पढ़ी है फिर भी कुछ साथी संभवत: उन्होंने बोड़ा नहीं पढ़ी है उनके लिए बोड़ा की जानकारी के साथ कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ ..
बोड़ा साल में एक बार बाजार में आने वाली मौसमी सब्जी है , जो जगदलपुर के बाजा़र में आते ही एक हजार रू. प्रति किलो ग्राम से बिकती है .. बस्तर के साल जंगलों में साल वृक्षों की जड़ों के पास नैसर्गिक रूप से ज़मीन के भीतर पनपने वाला छोटा सा गोल ( बाटी के बराबर) मशरूम को बोड़ा है .यह मानसून के पूर्व होने वाली बारिश - उमस में अकुंरित होता है ..जिसकी बाज़ार में बहुत मांग है ..शहर के बाज़ार में आते ही यह हाथो - हाथ बिक जाता है .
बोड़ा
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पहली बारिश में भीगकर
जंगल की मिट्टी हँसती है
और
धूप की उजास में सरई जंगल
जी उठता है
सरई जंगल में यह
बोड़ा के आँख खोलने का समय है
और उधर दूर
बिहाने - बिहाने ( सुबह )
टुकनी मुंड में उठाये ,हाथ में कुटकी लिए गाँव की औरतें बोड़ा
कोदने (खोदने ) के लिए निकल पड़ती हैं जंगल की ओर
वे पहुँचती हैं सरई के जंगल में
एक पंक्ति ,एक लय ,एक ताल में
वे जानती हैं
बोड़ा कोई नहीं बोता ,सरई जंगल बोता है प्रकृति की छांव में
वे जानती हैं छोटा - मटमैला
जंगल का बोलता गोला
धरती का सीना चीर
किस जगह फूटता है
शहर के बाज़ार को आँख तरेरने के लिए
गांव की बायले (औरत) मन
लोहुन - लोहुन ( झुक - झुक कर ) पाना ( सूखी पत्ती ) को हटा- हटाकर
भुई (भूमि) को कोदती ( खोदना ) बोड़ा को बीनती हँसती - बतियाती सरई जंगल में आगे बढ़ती हैं
बोड़ा खोदकर ,बोड़ा बिनकर
बोड़ा टुकनी ,सोली - पैली ( नाप का पुराना पैमाना ) मुंडी में उठाकर
बोड़ा बेचने दस - दस ,बीस - बीस कोस दूर जंगल से नंगे पांव चली आती हैं जगदलपुर के बाज़ार में
वे आती हैं
और शहर के बाज़ार में
हड़कम्प मच जाता है
बोड़ा - बोड़ा के शोर में ,बोड़ा के स्वाद में अच्छे - खासे शहर के बाजार को सांप सूंघ जाता है
वे नापती हैं सोली - पैली से बोड़ा
बोड़ा खरीदने वालों की भीड़ में
हर बार हारता है
शहर का चमचम बाज़ार
विजय सिंह
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