किशन लाल का यह दूसरी पारी है ; यह कहना निश्चय ही न्यायिक ही होगा कि वे अंतिम दशक की हिंदी कविता में अपनी स्पष्ट पहचान बना लेने के बाद उपन्यास पर जोर आजमाइश करते दिख रहे हैं । हालांकि यह किशन लाल का पहला उपन्यास है पर हिंदी के अन्य उपन्यासकारों में उनकी इस नई उपस्थिति को उनके कहन की शैली और संवादात्मक उपस्थिति के बीच एक जबर्दस्त रिस्पांस की उम्मीद है । आमतौर पर प्रचलित तौर तरीकों के विपरीत किशन का यह उपन्यास देशज है । जमीनी उपन्यास है । जो आत्मकथात्मक दलित चेतना के कई बड़े हस्ताक्षरों में ओमप्रकाश वाल्मीकि , शरण कुमार लिंबाले , जयप्रकाश कर्दम , तुलसी राम , मोहनदास नैमिषराय , मलखान सिंह आदि का ही विस्तार रुप है ।
किशन लाल के इस नए और ताजा उपन्यास का शीर्षक 'किधर जाऊं' एक दृष्टया किसी भटकाव अथवा विकल्पहीनता का बोध कराती है पर तह में जाएं तो बिल्कुल अलग ही प्रतीत होता है । एक अन्वेषी दृष्टि और दृढ़ता का भान होता है । मूलतः छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के देमार में जन्में किशन लाल के इस उपन्यास में छग की उर्वर माटी की उर्वरता भी संदेह के घेरे में है । जहां जैसा कि दिखता है , वैसा सब कुछ सामान्य नहीं है । बहुत विषमताओं से ऊपजा गहरा असंतोष है । वर्ण व्यवस्था अथवा श्रेष्ठता बोध के आगे बौना होता समाज का चरित्र चित्रण है ।
किशन लाल के इस उपन्यास में छत्तीसगढ़ के मोची जाति की रोज़मर्रा , उनके लोक जीवन , लोक परंपरा , रीति-रिवाज , काम- काज , सामाजिक , राजनीतिक तथा आर्थिक संघर्ष शिद्दत से उजागर हुई है ; यकीनन यह आम जन के लिए अनछुआ पहलू है । मैं खुद भी अनछुआ था , आधी अधूरी रही ही थी , मेरी जानकारी । परन्तु इस उपन्यास को पढ़कर,जातीय बोध के दंश से असह्य दुख व पीड़ा को समझने में यह मेरे लिए बहुत मददगार हुई । मोची जाति पर केन्द्रित किशन के इस नवीनतम उपन्यास का मुख्य किरदार सूरज एक पढ़ा लिखा नौजवान है जो एक अच्छा संवेदनशील इंसान भी हैं ; के इर्द गिर्द पूरी कहानी चलचित्र के भांति घूमती है और सूरज में उसका खोया बचपन , किशोर सूरज के मन का उद्देलन तथा युवा सूरज का विस्फोटक संघर्ष आकार पाता है ।
उपन्यास लोकोदय प्रकाशन लखनऊ से नवलेखन पुरस्कार योजना से सम्मानित और प्रकाशित हुई है । नीचे दिए पते से विभिन्न माध्यमों से इसे मंगाया जा सकता है
No comments:
Post a Comment