लोकोदय नवलेखन सम्मान
चयन समिति की संस्तुति के आधार पर वर्ष 2017 का लोकोदय नवलेखन सम्मान मिथिलेश कुमार राय के कविता संग्रह 'आदमी बनने के क्रम में' को दिए जाने का निर्णय लिया गया है।
मिथिलेश की कविताएँ प्रतिरोध की सकारात्मक व शानदार अभिव्यंजना हैं, साथ ही आज के दौर में सत्ता व व्यवस्था द्वारा द्रुत गति से चलाए जा रहे अमानवीयकरण के विरोध में मनुष्यता का विशिष्ट रेखांकन हैं। मिथलेश की कविताओं का सशक्त स्वर महज वैचारिक प्रतिक्रियाएँ नहीं हैं, न ही प्रतिक्रियाओं जैसी शुष्कता है। कवि अपनी प्रतिबद्धता व अनुभव संवेदना को वैविध्यपूर्ण ढंग से साफगोई के साथ उकेरकर आत्मीयता को सार्वजनिक स्वरूप प्रदान करता है जिसमें घिस-पिट चुके जुमलों और कारस्तानियों के खिलाफ मजबूत शब्दों का जीवन्त प्रतिवेदन मौजूद है।
मिथिलेश के लेखन के सम्बन्ध में इन्द्र कुमार राठौर लिखते हैं- "मिथिलेश कुमार राय वस्तुतः लोक जीवन के कवि हैं। ग्राम्य जीवन तथा संघर्षरत लोगों की संवेदना के कवि हैं। उनका यह लोक संघर्षरत लोगों का लोक है, अपनी दिनचर्या के बनिस्बत अपनी जिजीविषा को जूझ रहे लोगों का लोक है। कहना न होगा मिथिलेश की कविता लोक जीवन तथा लोक के संघर्ष में साँसें लेता है। यानी, यह भी कहा जा सकता है मिथिलेश का यह लोक करूणा का लोक है, कातर लोगों का लोक है, दयनीय और निरीह लोगों का लोक है जो मुर्दा शांति से भरे नहीं हैं। पर वे जीवन के उस वस्तु तथ्य सत्यता की तलाश व तपिश से अबोध हैं। दरअसल ऐसी मुर्दा शांति को जगाने की यह कोशिश मिथिलेश कुमार राय की ओर से मुझे लगता है एक प्रारंभिक और बड़ी कोशिश है। यह इसलिए कि हाशिए के ये लोग यथास्थिति स्वीकारे हुए मर-खप रहे हैं और जी रहे हैं बिना किसी राजनीतिक सरोकार के।"
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