Wednesday, December 2, 2020

ganesh gani

अन्याय अथवा असमाजिकता का क्रिया व्यवहार है कि वह नैतिक मूल्यों का अतिक्रमण करें । विजय की लालसा का यह छद्म रूप राजनीतिक , आर्थिक और कुटनीतिक वैभवों के समानांतर ही एक  अविछिन्न सत्ता का संघर्ष-सा है ।  मौजूदा हिंदी कविता और कवि इससे अछूते नहीं हैं । परन्तु न्याय की मांग और उसका प्रतिवादी संघर्ष अपने समय के साक्ष्य बन अपनी सार्थकता को साबित करने प्रत्युत्तर हुआ ही है । यह देशी राग है ।
यह देशी ही है जब अपनी धुन में आए तो एक ही सांस में  कितनों को ठिकाने लगा दे । कितनों की पतलून गीली कर दे , कि नाड़े ही खींच दे । वैसे मैं इसका कभी हिमायती नहीं रहा पर हिंदी में कुछ वरिष्ठ - गरिष्ठ पदार्थों की पतनशीलता मुझे भी उनका प्रतिवादी बनाती है । ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण कल्पित , ganesh Pandey अपनी कविताओं में मुखर हो जाते हैं

वरिष्ठ कवियो !

वे जो जिनकी कविताएँ दीवारों पर खुद चुकी हैं
वे जो पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं
वे जो अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं
वे जो छात्रों की भाषा ख़राब कर चुके हैं
वे जो जिनकी प्रतिनिधि कविताएँ कबाड़ी ले जा चुके हैं
वे जो जिन्हें दफ़नाया जा चुका है अपनी क़ब्रों में

कितना लहू पिओगे
कितने युवा कवियों का कलेजा चबाओगे

वरिष्ठ कवियो, जाओ
सुसज्जित सभागारों में आपकी प्रतीक्षा हो रही है
फूलमालायें मुरझा रही हैं आपके इन्तिज़ार में

वे जो जिनकी भाषा एक अरसे से ठहरी हुई है विचार धुंधलाया हुआ है और कल्पनाशक्ति हर-रोज़ क्षीण हो रही है वे जिन्हें रोज़ कच्ची कोंपलें चबाने को चाहिये वे जो अपनी ख्याति के दलदल में धंसे हुये क़दमताल कर रहे हैं

वे जो जिनकी आँखों से लहू नहीं लालच टपकता रहता है हर-घड़ी वे जो किसी असम्भव प्रेम की आशा में अभी भी लिखे जा रहे हैं प्रेम-कविता

वरिष्ठ कवियो, थोड़ा हटो
रास्ता दो युवा कवियों को

एक जो एक मृत चित्रकार के पैसे से हर साल पेरिस में गर्मियाँ गुज़ारता है

एक जो अब भूलता जा रहा है कि जीवन में किन किन स्त्रियों का नमक खाया है

एक बरसों से अचेत है
उसे अचेतावस्था में ही किया गया सम्मानित

एक मुम्बई में घायल है
एक देहरादून के एक होटल में पस्त है

एक जयपुर में उपेक्षित है
एक पटना में सम्मानित है

एक लखनऊ में बांसुरी बजा रहा है
एक भोपाल में चित्रकारी कर रहा है

एक संगीत में डूबा हुआ है एक सिनेमा में
एक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में स्कॉच पी रहा है और दूसरा लक्ष्मी नगर में ठर्रा

आदिवास का एक कवि किसी आदिवासी की हत्या से नहीं
किसी पेड़ से पत्ते झरने से व्यथित होता है

एक कवि कथाकारों की बस्ती में फ़रारी काट रहा है
एक को अभी-अभी निगमबोध घाट पर जला कर आ रहे हैं

एक जो किसी रामानन्द की लात  की प्रतीक्षा में
मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर लेटा हुआ है बरसों से

एक गठिया से परेशान है एक आंधासीसी का शिकार है
एक को नोबेल का शक पड़ गया है

एक ग़ालिब की आड़ में जिन्ना की भाषा बोलने लगा है
एक ने कब लिखी थी कविता उसे याद नहीं

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची
उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुये हैं

वरिष्ठ कवियो, जाओ
अपनी-अपनी क़ब्रों में अपने-अपने तमगों के साथ सो जाओ अब अधिक धूल मत उड़ाओ

कृपया जाओ
खिड़की से धूप आने दो
और मुझे खींचने दो चिल्ला !

कविता : साभार गणेश गनी

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