Wednesday, June 29, 2022

अनिल चतुर्वेदी की कविताएं

अनिल चतुर्वेदी का 'शहर उदास नहीं होता' पढ़ लिया ; और मैं उदास नहीं हूं । उदास नहीं हूं तो इसलिए कि 90 के दशक में जिन्हें बकौल कवि पहचाना जाना चाहिए था , वे कविता की दुनिया से लगभग गायब हो गए और आज जब फिर मिले , पुनः लिखना हुआ , तो कवियों में शुमार होने की काबिलियत के साथ  , पूरे शबाब में मिला । ऐसा कम ही कवि होंगे जो बकौल समाजिक , राजनीतिक चेतना से संपन्न हो , एक लंबी चुप्पी और विराम के बाद पुनः सक्रिय लेखन से जुड़ आगे आया हो ; तो निश्चित तौर अनिल चतुर्वेदी उसमें शामिल किए जा सकेंगे , यह कहने मुझे जरा भी संकोच नहीं होगा ! अनिल चतुर्वेदी 90 के दशक से लिख रहे थे । कि वैयक्तिक कारणों से इस राह की यात्राएं उन्हें स्थगित करनी पड़ीं ।  किन्तु अभिरुचि और साथ नहीं छूटा । कि साहित्यिक दखल के तौर पर पहले संवाददाता और फिर बतौर संपादक के रूप में वे विभिन्न अखबारों में काम करते हुए अपनी उपस्थिति को किसी मंंजे हुए कलाकार में भाष्य बनाते ग‌ए । वे विगत कुछ सालों से स्वतंत्र लेखन और कवि कर्म में तगड़ा हस्तक्षेप करते दिखाई दिए हैं । इसे कोई कवि , कलाकार  जज्बा ए जूनून के परस्पर सघन सिक्त जीवन अनुभवों , वैचारिकी और संवेदना के रास्ते चलकर ही संभव बना सकता है । अनिल चतुर्वेदी में संघर्ष तथा कामयाबी का यह गुर इन मायनों में स्वस्फूर्त तथा वंशानुगत है अर्थात् 

*तेज धार का कर्मठ पानी काट रहा है तट चट्टानी*

के जैसा ही जीवट और जुझारूपन में भरा, दिखाई देता है ।

 यह समय था ‌। सोवियत संघ के विघटन का , फिर देश में भूमंडलीकरण , उदारीकरण के दबाव के बाद अचानक से आए शीतकाल का । चारों ओर लोग-बाग में भय आशंका और सिर्फ निराशा दिखी । जो मनुष्य के मानसिक स्थिति पर इतना गहरा प्रभाव डाल चुका था कि उबरना कठिन हो चला था । वह असुरक्षा बोध से घिरा एक सेफ जोन की तलाश में चुप्पी को अपना कंदरा की तरह प्रयोग में लाने लगा ‌। हर दूसरी बात पर सिर्फ समझौते को अपना आखिरी प्रस्ताव की तरह स्वीकार किया था । ‌ स्थिति देखने समझने में यह थी  कि

"धरती की सारी नदियां मिलकर भी 
समुद्र का खारापन कम नहीं कर पातीं !"
 

अर्थात् विभिन्न छोटे बड़े आंदोलनों से तत्कालीन व्यवस्था कहीं भी विचलित नहीं थी ! यानी कि

"इतनी सारी नदियों से कोई फर्क नहीं पड़ता" (उन्हें)

"समुंदर का पानी न घटता है न बढ़ता है !"

यद्यपि आवाजाही थी फिर भी उन ताकतों के आगे विवश था मनुष्य कि

"जबसे वह इस धरती पर है 
पोषक बना हुआ है इसी व्यवस्था का"

व्यंग-व्यंजना में अनिल चतुर्वेदी कमाल दिखाते हैं । मध्यवर्ग उनके निशाने पर आते हैं । जिसे वे एक लंबी रूग्णता में देखते हैं , कहते हैं कि

"यह उसकी समझौतापरस्ती है 
या विवशता 
वह अब भी राजा के बगैर नहीं रह सकता!"

वे कहते हैं मनुष्य का नियंत्रण व्यवस्था पर हो किन्तु चीज़ें इसके उलट बह रही है कि

"वह सम्राट की तर्ज पर ही शासक चुनता है
 उसकी इच्छा पर शंख और थाली बजाता है 
फिर अपनी बदहाली का राग सुनाता है"

जबकि सृष्टि की यह सर्वोत्कृष्ट रचना अपनी निरी कायरता और कातरता के खोल में दुबक चुप्पा है । इस कविता के कुछ काव्य पंक्तियों में अनिल के यहां भी घालमेल है जबकि लक्ष्य अपने कांसेप्ट पर ही केन्द्रीकृत है । वे मानते हैं कि व्यवस्था का विरोध नागरिक समाज के सश्रम संघर्ष से ही फलित होगा । छद्म और समझौतापरस्ती से हासिल में निराशा हाथ आएगी । 

अनिल चतुर्वेदी ने नागरिक बोध और चेतना का खासा प्रभाव है कि वे निराशा के बनिस्बत ओज और नाराजगी में अपने सारे निर्णय सुरक्षित करते हैं । यह उनके 'व्यवस्था' क्रम की उन आठ कविताओं में शिद्दत से आए हैं ।  मसलन 'व्यवस्था -1'

सुबह की अगवानी में
चहचहाते हैं परिंदे 
एक आदमी ही है 
जो खामोश है

अनिल चतुर्वेदी इसी समाज के ही घटक हैं । और जिनके लिए ; जो उनका आग्रह है वे भी इसी समाज के ही घटक हैं । इसलिए वे उन्हें बार-बार अपने लपेटे में लेते हैं


वही 'व्यवस्था-2' में वे व्यवस्था के कुठाराघात और उसके व्युत्पन्न से उपजी खाई को ब्लैक होल में देखते हैं । 

"जब सब कुछ सिमट रहा हो
केन्द्र की ओर
पूरी बात परिधि में ही घूम रही हो
समझ लीजिए 
कि तारा मर रहा है
और बन रहा है ब्लैक होल

मैं इधर देखता हूं और पाता हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां दृष्टि साफ़ है , फोकस में एक पुष्टि की तरह मौजूदा समय है । दृष्टव्य व्यवस्था-3


"फूल और कांटों की दोस्ती
किसी व्यवस्था के
तहत ही है होती"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में बात अपने ठसक और दावेदारी में है । यथा 'व्यवस्था- 4'

"सूर्य तरेरता है आंखें 
और सहमी हुई पृथ्वी उसका चक्कर लगाती है"

वही इन कविताओं को अभिव्यक्त करने अनिल चतुर्वेदी ने खूब बिम्ब विधान गढ़े हैं । मसलन कि 'व्यवस्था- 5' में वे कहते हैं कि कीमियागरों ने जब घोड़े को घोड़ा , कुत्ते को कुत्ता , गधे को गधा भेड़िए को भेड़िया बनाया और शेर को शेर रहने दिया , तो रत्ती भर संदेह नहीं होना चाहिए कि धूर्त चालाक व्यवस्था के निर्माण की धुरी के निमित्त में यह वैमनस्यता ही रही । अनिल की ये कविताएं संदेह और सवालों के हवाले , आकार लेती है । सवाल यह आदमी कौन था ? क्या वाकई आदमी था कि लोक जन का असली दुश्मन ! जिसने सहूलियतों को पैमाने पर रख व्यवस्था बनाया । जैसा कि 'व्यवस्था -6 'में वे कह रहे हैं कि आबाद जंगल की सभ्यताएं भी आखेटकारी शिकारियों के अधीन अपनी मासूमियत में जूझ रही है और उसे ज्ञात सूत्र हाथ नहीं आ रहे कि

"नागरिक व्यवस्था नागरिक नहीं है"

व्यवस्था की मार और उसके झोल में फंसे आदमी की गहरी चिंता यदि अनिल चतुर्वेदी के यहां उनके पक्ष में है , तो वे जरूरी लताड़ भी हैं जो उनकी नादानियों और बेवकूफियों से खड़े किए जा सके । उनके सवाल होते हैं सरकार से , व्यवस्था से , यदि सरकार जनता के लिए जनता के द्वारा चुनी हुई है और वह नाकाम है अथवा कि विभिन्न कारगुजारियों के बाद भी किस आधार और ताकत से सत्ता पर बची हुई  है , बनी हुई है ? पाई-पाई तिनका-तिनका जोड़ मनुष्य ने जिस व्यवस्था का निर्माण किया , उस व्यवस्था के होने न होने का क्या अर्थ रह जाता है जिसके होने पर भी न पाई बचती है न पूंजी । प्रतीकात्मक बिम्ब की इस कविता में अनिल चतुर्वेदी बहुत तीखे और तेज़ होते हैं

"कितनी मुश्किल से 
चिड़िया अपना घोंसला बनाती है 
फिर भी अपने चूजे को नहीं बचा पाती 
अक्सर सांप निगल जाता है उसके चूजे"

जबकि व्यवस्था के नाम कार्यपालिका , न्यायपालिका और व्यवस्थापिका है । फिर भी

"परिंदा क्यों अपने चूजे क्यों नहीं बचा सकता 
क्यों सांप को उसकी मनमानी से नहीं रोका जा सकता"

सवाल हैं । सवाल दर सवाल कि

"सूरज जो अभी कुछ देर पहले ही निकला था 
सारी दुनिया में फैला था 
क्यों नहीं कुछ करता है 
आखिर वह भी तो इसी व्यवस्था का हिस्सा है"

फिर ये निर्मम बेरुखियां कहां जन्म लेती हैं ? यहां , यह किसी तरह का असहाय या पराजय बोध नहीं है । बल्कि सिक्त संवेदना है जो असहाय कि निरूपाय कभी नहीं होती । वह निरंतर गतिशील हो अपने जीवित होने के सबूत के साथ आगे आती , अभिव्यक्त होते रही है ।  बल्कि किन्हीं मायनों में यह थके हारे निरूपाय और निर्बल लोगों के हिस्से की धूप को इकट्ठी करने की जद्दोजहद में मनुष्यता के मांग को दुहराती है । अर्थात् 

"मैं चुप नहीं हूं 
नहीं रह सकता 
मेरे हृदय की सीप में मोती की तरह 
पल रही है एक कविता"

रसूख से अभिमान और प्रदर्शनप्रियता , फिर आडंबर और अतीत जीविता हमारे समय का सच बनता जा रहा है । यह भंगुर है । आज का आदमी यदि अपने अनुभवहीनता में अपने रसूख को सच मान , स्वांग तथा स्वार्थ में अपने मूल भावों से फिसल रहा है तो यह उसकी बेगैरत को दर्शाता है । यह दावा अनिल चतुर्वेदी का भी है

"फिलहाल आदमी बहुत बाद में है 
और आदमकद यहां कोई नहीं"

अर्थात् कि

"मैं उस धरती पर रहता हूं
जहां सूर्य भी बहुत छोटा दिखाई देता है
और सितारे दिख जाएं 
यही बहुत है"

फिर किस बिसात की बात ! क्या अभिमान या कि गुमान !! वृथा है , व्यर्थ है  सभी । इस तरह के अकाट्य कर देने वाले भाव विचार भी अनिल चतुर्वेदी में बहुतेरे हैं ।

साधारण आदमी की तरह हुआ है पलटू राम । नाम , पात्र और परिवेश में ग्राम्य ग्रामीण पलटू राम बेपरवाह अल्हड़ , श्रम साधक किसान है । परिस्थितियों ने उसे कृत्रिमता से विरक्त नैसर्गिक स्वभाव में मस्त रहना सिखा दिया । तब नहीं था ऐसा वह जब साधारण किसान था !  यूपी , बिहार , महाराष्ट्र , कर्नाटक, हरियाणा और पंजाब में यह इसलिए आ खड़ा हुआ चूंकि सामने हत्यारी सत्ता थी । उसकी फौजें थी । दलाल और आवारा पूंजी का मोहपाश था और बस्स 'वे' ही थे

"यह कम नहीं कि वह पेड़ नहीं हुआ ......( और )
 कम अज कम किसान के रूप में 
आत्महत्या करने से बच गया !"



इसलिए कि पलटू राम ने एक स्थिति के बाद खुद को तैयार किया ।

मैं पुनः पुनः कह रहा हूं कि अनिल चतुर्वेदी के यहां शब्द से अधिक चित्र यथार्थ गहराया हुआ है । उनके प्रतीक और बिम्ब अलग ही आख्यान रचते हैं और कालीन परत चढ़ाए नक्काशी से अधिक , चीजें उन्हें सरल रूप सौंदर्य में स्वीकृत होते है । जैसा कि दिन निकलता है रात होती है ; सुबह होती है शाम होता है । एक व्यापक समाज के सच को अपने तरह से देखती फिर उसे अभिव्यक्त करती इस कविता में अनिल चतुर्वेदी ने कृत्रिम पद्धति के जीवन सच और उस मुखौटे के प्रति भी हमें आगाह किया है कि 'नया साल' शब्द है । सिर्फ नाम है तथा शेष चीजें भरमाई हुई हैं । चूंकि जो मचा था

"समुंदर में हाहाकार वह
तो पहले जैसा ही है 
और नदियां 
अपनी नीयति में 
सिकुड़ कर लीन हो रहीं  
वृक्षों की वेदना पहले जैसी ही रहीं 
रामलाल का साल तो सालों से ठहरा हुआ है"

जीवित आदमी की चेतना कभी निरपेक्ष नहीं होगी । वह कभी डि-रेल नहीं होगा । सारी कोशिशें नाकाम होगी यद्यपि वह उपेक्षा भी करेगा तो अपनी सापेक्षता को अलगा नहीं पाएगा । मनुष्य का समाज विज्ञान इसी रूप में स्वीकृत है । इसी में प्रभावी है । चाहे वह लाख कोशिश करें देश , समाज , अर्थ , राजनीति से शून्य नहीं हो सकता ! कोई भी कोशिश उसका नाकाम होगा न विफल रहेगा

"घटना से निरपेक्ष 
मैं अपनी खामोशी में 
कुत्तों की उपेक्षा कर 
रातभर 
सोने की नाकाम कोशिश में लगा रहा"

देश समाज और राजनीति की जहीन समझ के बाद आदमी निरपेक्ष नहीं हो सकता । तेज हांफते-भागते जिंदगी के फलसफे में तेज नहीं है कुछ भी । विकास क्रम में मनुष्य और प्रकृति तथा जीव जगत का व्यवहार अपने गत्यात्मकता में क्रमिक है । वह सघन और घनीभूत है । देखने के बनिस्बत परखने में दृष्टांत होता है कि कैसे

"धीरे-धीरे उतरती है शाम 
रीत जाता है दिन 
धीरे-धीरे लोहे में लगती है जंग 
धीरे-धीरे वेदना की आंच में पकती है रूह 
धीरे धीरे अंकुरित होता है प्रेम"

तमाम-तमाम नैसर्गिक प्रक्रियाओं के बाद अनिल चतुर्वेदी में जो भौतिकी का द्वंद दिखाई देता है वह जमीन के स्तर में मजूर ,  किसान , कामगार के पक्ष में आ खड़े होता है ।

'शर्माती हुई स्त्री' अपने सौंदर्य बोध के लिहाज़ से एक 'अच्छी कविता' है । अस्तु स्त्री चीज नहीं है । वस्तु नहीं है ,अस्तित्व है स्त्री । अतः कोई भी पैमाना या कि मानकीकरण इसके लिए कतई ठीक नहीं । वह देवी अथवा शक्ति , या कि कोई आराध्या नहीं है । यदि हम कुछ निर्धारित कर रहे होते हैं , तो यकीन मानिए सत्ताधीशों की तरह कभी हम भी आक्रामक होंगे ही !  हम उस प्रकृति और सौंदर्य की अनुभूति पर आधिपत्य मान जंगलों और फसलों की तरह उसे सचेष्ट काटेंगे । अतः जरूरी सावधानी के साथ कहना चाहता हूं कि उसके अस्तित्व के साथ सहज और सरल बने । उस एक शर्माती हुई स्त्री को कायनात की सबसे अप्रतिम परिघटना की तरह देखें । लेकिन ठहर कर देखें । उसके सप्रमाण जीवंतता को अवांछित तारीफ़ और प्रशंसा से भरें नहीं । चूंकि कायनात के सबसे अप्रतिम सौंदर्य की हम बात करें तो यह उसके ठहराव में नहीं , उसके गतिमान में है।  उसे गति दें । उसे उसी तरह देखें , उसी तरह से लें , जिस तरह आप हैं । यह सही है कि

"वह शर्माती है 
और क्षण भर के लिए 
यह पृथ्वी ठहर जाती है 
सूर्य अपनी राह भटक जाता है"

इस अभिभूत सौंदर्यानुभूति को किसी ठहराव का आधार न बनाएं  ।

दृश्य बिम्ब भी अनिल चतुर्वेदी के यहां रक्ताभ लिया प्रतीत होता है । मसलन कि यह 'शाम का एक बिंब' है जहां

"लाल हो गया है आसमान  चू पड़ेगा अभी बादलों से रक्त" 

या कि दूसरा बिंब निसंग रात्रि का है जहां

"गहन अंधकार 
सृष्टि है निस्तब्ध

और मरसिया पढ़ रहे चांद सितारे हैं

परिवर्तन प्रकृति सम्मत परिघटना है । आप चाहकर भी उसे नहीं रोक पाएंगे कि नियंत्रित कर सकेंगे , कि हिस्सेदारी ही तय कर सकेंगे ! परन्तु नवीनता की चाह में वांछनीय तथा नवीन क्या हो ? यह तय कर सकेंगे । अंधाधुंध औद्योगिकीकरण रीयल स्टेट बाजार में भू माफियाओं की तूती बोल उठी है । कि बंधक बनाए गए वे किसान के माथे पर सवार हैं , जिनके घर पूंजी और बाजार है , सत्ता का सरोकार है । कि अनिल चतुर्वेदी को कहना होता है

"शायद इसीलिए हमारी राजनीति में 
इन सवालों से गुजर कर जाने का कोई रास्ता नहीं है"

और 

"हम उम्मीद करते हैं कि वह विद्रोह करें"

कम मुश्किल नहीं है । ताबूत तक घुटने टेक चुकी जनता के असहयोगात्मक रूख से कि वे विरोध अपने दम करें । हालांकि वे ऐतिहासिक किसान आंदोलन से साबित कर सके हैं कि आन पर जब आए बात , मिट ना पाए साथ ।


'कुछ हिस्सा उनका भी है' बकौल Bhaskar Choudhury  कि

"सूर्य की किरणों पे हक तो हमारा भी होगा 
ये और बात है 
तुम्हारी छत ने उसे रोका होगा"

अर्थात कि यह

"तुम्हारी जिद है चल जाएगी पर आंसुओं के समंदर में तुम्हारी नीव भी ढह जाएगी"

यकीं कर ऐ ज़ालिम यह गरीब गुरबा की बद्दुआ है लग जाएगी ! सच कि

"चांदनी की बात है वह तो तुम्हारी है !" 

किन्तु बकौल बिस्मिल अज़ीमाबादी हम कहेंगे जरूर

"वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमां
अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" ।

की उक्ति में अनिल चतुर्वेदी शोषक को निशां पर रखते हैं और अंदाजे गुफ्तगू कहते हैं कि 

"अब सोच लो 
तीर का अगला निशाना तुम सरीखा बाज़ है"

यह कि

"खूब खेले तुम परिंदों से
मर गया अहसास है ।"

अनिल चतुर्वेदी की यह कविता उनके आरंभिक दिनों की है फिर भी अपनी चेतना और छाप में वैचारिकी को लेकर डंटी हुई है ।

'यही सोच रहा था' शीर्षक कविता फ़ौरी तौर पर लिखी कविता लगेगी परंतु इस कविता में जो रिसाव है  वह मिक साइनाइड की तरह जहरीली विषबुझी सी है जो अपने मारक क्षमता से सरलीकरण के भ्रम को तोड़ती है ;  तोड़ती है कि कविताएं रचना सामान्य बात भर नहीं है । खैर रूग्ण मानसिकी संघर्ष के पथ के बजाय डिमांड और वर्चस्व से चीजों को हासिल चाहता है । मसलन


"वे मेरा ख्याल रखें 
मैं जब भी कुछ कहूं उसे आदेश समझें 
उसका फ़ौरी अनुपालन करें"

परंतु यह पराकाष्ठा होगी कि

"पहले भी जब कभी 
मैं बीमार हुआ था 
तब मुझे राजा बनने का ख्याल आया था"

अथवा कि

"और जबकि यथार्थ यह है कि राजा बनने का ख्याल सबसे पहले किसी बीमार को ही आया था"

प्रकृति में संतुलन , अर्थात् समतामूलक परिवेश डिमांड की तरह हुआ ! संतुलन की यह मांग नैसर्गिक तथा अगेंस्ट नेचर के मध्य दीवार की तरह खड़ा है । यह अस्तित्ववादी मानुषिक विचार है । परन्तु भौतिक जीव जगत इस आशय की कोई ठोस पुष्टि के अभाव में , इससे इत्तेफाक नहीं रखता । क्योंकि धूप ,  पानी , हवा , नदी-नाले , पहाड़-पर्वत के किसी भी पर्याय में वह चराचर को उपभोग में अंगीकार किया है । यह तो हम पर निर्भर करता है कि उसे हम बनाए रखते हैं कि छिन्न-भिन्न करते हैं । इसलिए ही कह रहा हूं कि इस पर नजरिया अस्तित्ववाद के बजाय भौतिक समाज विज्ञान के आधार विकसित किए जाएं । एक कवि कलाकार इसी में वरेण्य है । वह देखता है कि

"हत्याओं का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता 
फिर भी शहर उदास नहीं होता"


पाता है कि थाना , कोर्ट-कचहरी , भूख-भीड़ सा 

"सत्ता की मीनार पर 
हत्या एक सीढ़ी है"

जीवन संग्राम में निरंतर युद्ध लड़ा जाता है ,शहर उदास रहे ना रहे कवि उदास होता है ! और मैं इसलिए उदास नहीं हूं तथा आशान्वित हूं कि कवि अपने दायित्वों का निर्वाह निरंतर ईमानदारी से कर रहा है ।

''कितनी झूठी सांत्वना , कितना गहरा छलावा है"

'निर्बल के बल राम हैं' । यह भारतीय निम्न मध्य वर्ग है जो अक्सर ही मारा जाता है । कहने को

"दावा है कि संविधान में 
उसके लिए न्याय की मुकम्मल व्यवस्था है" (निष्प्रभावी) 

जो

" इसी तंत्र के हिस्से हैं"

सोचो कि,  देखो कि

"मसलन कितनी ही प्रार्थना करो 
पर इंद्र बारिश नहीं करा सकते 
और पशुपतिनाथ को चूहे कुतर रहे 
देवियां तो सारी की सारी बन गई हैं (महाठगनी) 
हुकूमत की चेरी"

अनिल चतुर्वेदी ठीक पहचान करते हैं कि

"समस्या इतनी ही नहीं 
वस्तुत:  लोक पर तंत्र का शिकंजा 
कुछ इस तरह से कस चुका है 
कि लोक कराह भी नहीं सकता 
और विडंबना यह कि 
लोक समझता है कि तंत्र वही चलाता है"

यथार्थ बोध से लैस अनिल चतुर्वेदी की इस कविता में आज के राजनीति विज्ञान की बखूबी पड़ताल है ।

यह इक्कीसवीं सदी का आरंभिक समय और दूसरे दशक के उत्तरार्ध से प्रारंभ हुआ तीसरा दशक है । कहना न होगा कि जिस अनुपात में चीजों का स्थगन , विलोपन की भाषा में पुनर्निर्माण ही ; होने चाहिए उससे कहीं कई गुना तेजी से चीजें बदल रही है कि

"मैं चलता हूं लगता है 
लोग देखते हैं मेरी ओर"

अर्थात् कि 'मेरी आदमीयत संदेह के घेरे में' है । यही है वह बदलाव , कि पैदा हुई संदेह और ठिठक गए कदम ! आशा दुराशा के बीच पेंडुलम सी लटकती रह गई देह । जबकि 

"मैं कोशिश करता हूं 
भीड़ से तादात्म्य करने की 
और अकेला हो जाता हूं"

'मेरी आदमियत संदेह के घेरे में है' यहां इस कविता में कवि ऐसा इसलिए कह रहा है कि वह अपने होने के अर्थ में आदमी होने की शर्त को जीता है , कि तब पाता है आदमी और आदमीयत की परिभाषा भीड़ की तरह खतरनाक स्थिति में है  ।

यथार्थ नंगा होता है , जब कभी अभिव्यक्त होता है । प्रभावी कागज दवात के माध्यम अनुभूत सच और विचार को जब हम उसके कला धर्मी रूप में अभिव्यक्त करते हैं तो प्रभावी कारकों के बाद भी कला की महीन परतों से वह ढंक जाया करती है मसलन कि जहां 'भूख की सत्ता है'

"भूखा बालक रोटी मांगते 
आंखों से ओझल हो गया 
अब उसे किताब के पन्नों में खोजा औ पढ़ा"


दैनंदिन देश , समाज और व्यवस्था की भाषा दुभाषिए-सी होने लगी है । चीजों को भाष्य बनाना दुष्कर हो गया है । प्रतिमानों में , विचारों में सामंजस्य लाए जाने की महती आवश्यकता है । यह अनिल चतुर्वेदी 'पिता की पुत्र को नसीहत' शीर्षक कविता में कैसे साफ कर रहे हैं ,देखा जाना चाहिए 

".... क्या आते ही रोने लगे
...... मगर मेरे बच्चे रोना अब कारगर अस्त्र नहीं रहा""" । यह उक्ति भी फेल हो चुकी है की मां बच्चा को तब तक दूध नहीं पिलाती जब तक कि बच्चा रो नहीं देता अर्थात् दुनिया बहुत बदल चुकी है अब । ईजाद भाषा में सिखाया जाएगा दूध पीना । इस तरह से कि


"लोमड़ी की तरह पेश आओ
जब शेर सामने हो 
भेड़ियों के बीच फ़ौरन भेड़िया बन जाओ 
हां वफादारी के लिए हमेशा कुत्तों पर भरोसा रखो 
गिरगिट की तरह रंग बदलना तो कतई सीख लो
एक बात तो गांठ बांध लो सिर्फ इंसान होकर तुम नहीं जी सकते हो"

बहरहाल जिस तेजी से दुनिया बदल रही है

"एक आखरी बात और कहूंगा मेरे बच्चे
की उम्मीद बिल्कुल ही खत्म नहीं हुई है
तुम इंसान हो 
इस दुनिया को बदल भी सकते हो"

वस्तुतः इस कविता में कवि की यही वास्तविक एंट्री है जो इंटरवल के बाद की है

देव , दानव  ,ऋषि  , गंधर्व , हूर परी मिथ कथाएं हैं । वाचिक परंपरा ने इसे बल दिया । किंतु मनुष्य मिथ नहीं है । कागज कलम दवात मिथ नहीं है । स्वभाव से नरभक्षी शेर , विषैले सांप मिथक नहीं है । सोख़्ता स्वभावत: है । प्रैक्टिकल में है । किन्तु असुर और दानवों की विनाश की बात की जाए तो  मिथक से बड़ा उपाय कुछ नहीं । अतः वह वांछनीय हो जाता है । तब / जब

"रात की स्याही से 
दिन के कागज पर 
लिखना चाहता हूं एक शब्द-उम्र"

कि जिसे पढ़ , चाहता हूं

"एक नरभक्षी शेर की आंखों में आंसू आ जाए
जहरीला सांप फेंक दे अपनी विष ग्रंथियां
और एक आदमी बन जाए तो दधीच 
दान कर दे अपनी अस्थियां असुरों के विनाश के लिए"

तब

"सोख्ते की तरह मेरा यह (शब्द)
सोख ले
आदमी का दर्द उसकी सारी विपत्तियां"

जबकि 

"मैं परेशान हूं 
कैसे लिखूं .....
वह सब इस तेज़ बारिश में"

दया , करूणा , क्रोध चेतना , सौंदर्य की जितनी अर्थवत्ता अपनी है सार्थकता भी उसी अनुपात में और उतनी ही है । यह एक चेतना संपन्न मानव के भीतर संश्लिष्टता में पाए गए हैं । अर्थात्

"जहां आदमी होने की शर्त नहीं टूटती"

निश्चय ही वही जहां कोई कृष्ण पैदा हो जाता है । अनिल चतुर्वेदी इन चीजों के महत्व को अपने अंगूठे के मुहर से स्थापत्य देते हैं की यह दुनिया , इसी  के साथ बची रहे ।

भूख हमारे समय का सबसे बड़ा समकालीन यथार्थ है । हम न डरते कदाचित् कि यह न होता ! किंतु डर जाते हैं और खौफ खाते हैं तो इसलिए कि एक आग हमारे भीतर जलता रहता है । जबकि उसने जंगल और प्रकृति पर विजय प्राप्त किया ,लांघा समुद्र को , तोड़ा पर्वतों को । यह भी कि चांद के सीने पर पैर रखा । फिर

"आखिर कहां से आया होगा खौफ़ 
पहली बार आदमी के सामने"

निश्चय ही ऐसा है कि 

"जब आदमी ने आदमी पर आक्रमण किया होगा , 
तब वह पहली बार डरा होगा !"

या कि

"आदमी सबसे पहले डरा होगा 
जब वह भूख से लड़ा औ मरा होगा"

कि

"आज भी उसके हृदय पर अंकित है 
पराजयबोध के वे निशान 
आज भी वह होता है भूख से सर्वाधिक भयाक्रांत"

अनिल चतुर्वेदी ने अपनी अधिकांश कविताओं में भूख , मनुष्यता , इंसानियत , आदि को स्थायी तथा केन्द्रीय भाव दिया । भले ही कहीं-कहीं ठिठकना भी हुआ । जो  एक निरंतर गतिशीलता से उचट क‌ई क‌ई बार पुष्ट में अपुष्ट को लिए आ ही जाता है ।  यह द्वंदात्मक भौतिकी में आत्मसंघर्ष की प्रक्रिया है । जो उनके यहां बना रहता है । मसलन कि इंसानियत से दूर हुआ जा रहा मानव के देह तक में बह रहा रक्त का रंग तब भी साबूत लाल है ।

एक लेखक का पक्ष होता ही है । वह कहीं ना कहीं , किसी ना किसी ओर झुकेगा ही ! यह झुकना , झुकना नहीं , अपितु पक्षधर होना होगा । इन अर्थों में अनिल चतुर्वेदी की पक्षधरता वाम मार्ग को जाती है । चूंकि उनकी पहली और जरूरी चिंता में मनुष्यता का बचाव है । यद्यपि अनिल चतुर्वेदी में एक आदमी के दुख , पीड़ा , संतोष और सरोकारों का संवेदनागत विस्तार दिखाई देता है किंतु देखता हूं कि उनमें वामपंथ से एक दार्शनिक दूरियां भी है , जो अज्ञेय को जाता है । यह लोच है । जबकि वामपंथ वस्तुतः एक सीधा-साधा संघर्ष पथ है । क्रियाशील गतिशीलता का पथ है । अर्थात की कार्रवाई का पथ है । मैं इसे एक रचनाशील आदमी में दुर्बलता की तरह कोट करते आया हूं ।

"जो छले गए हैं रोशनी में 
वे लोग इसे जानते हैं 
रात जितनी अंधेरी होती है सितारे उतने ही चमकते हैं"

या कि

"इसे वे कैसे जानेंगे 
जो खुशी के गीत गाते हैं"

अलबत्ता जानेंगे वे

"जिन्होंने सीख लिया है तैरना 
गमों के समंदर में 
किनारे खुद ब खुद चलकर उनके पास आते हैं"

'जो छले गए हैं रोशनी में' कविता गीतात्मक शैली की जीवन अनुभव से निकली कविता है । जिसमें यथार्थ का जो गहरापन हैं वह महसूस करना होता है उसके उद्दीपन में तप्त देह की आंच को आभास करना होता है ।

आजादी को गर्वानुभूत मान प्रदान करने में राष्ट्रगान एक वह शै है जिससे हम अपने सामूहिक चेतना को बल प्रदान कर सकते हैं । अभिभूत हो सकते हैं , यह भी कि अपनी आजादी के अर्थ को हासिल करने के लिए ही , यह हुआ ! तभी तो 1947 घटी । किंतु अनिल चतुर्वेदी की कविता की बयानी  सैंतालीस के बाद और मोहभंग की है । जो मिली , अप्रत्याशित असफलता के रूप में मिली ; जस की तस में मिली ।

"जब राष्ट्रगान गाया जा रहा था
तब देश के करोड़ों भूखे लोगों ने उसे पेट से सुना"

और यह वही सिमट गया ।
जबकि वह लड़ाई भी उनके भूख से मुक्ति के लिए थी । आज जब हम सत्तर साल के इतिहास की बात करते हैं तो बरक्स में हासिल की बात भी हो ;  परन्तु यह अब भी जस का तस है ।

कवि हो और प्रेम की सघन अनुभूति तथा विस्तार ना हो , कैसे संभव है ? कोई भी सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक चेतना का सृजन तथा उसके फ्लैशबैक में प्रेम ही वह सिक्त भाव है कि हासिल में

"महासागर की अनंतता में खोई हुई तुम्हारी निगाहें 
जो झुकी हैं इस तरह कि न जमीं देखती हैं न आसमान 
यह शायद देश काल से पार सुदूर अंतरिक्ष में 
देख रहीं हों तुम्हारा देह रहित विस्तार"

अनिल चतुर्वेदी अपनी इस कविता में प्रेम के यथार्थ को दार्शनिक स्वीकृति प्रदान करते हैं , कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं

"धरती की छाती फाड़ कर फूट पड़ने वाले बीज की ताकत भी तुम ही हो 
अनंत काल से सूर्य का चक्कर लगा रही पृथ्वी का धैर्य भी तुम ही हो"

अर्थात्

जिसे मैं कह सकूं बस यही है प्यार 
ओ मेरे प्यार !

अनिल चतुर्वेदी की इस कविता को देखते हुए मुझे बांग्ला कवि रवींद्रनाथ  टैगोर , माइकल मधुसूदन , क़ाज़ी नजरूल इस्लाम का स्मरण हो आया ।

"तुम इस धरती पर होते हुए भी इस धरती के नहीं हो 
तुम्हारी अलौकिकता के प्रति मेरा चिर नमस्कार 
ओ मेरी चेतना के दुलारे 
तुम्ही तो हो भूखे के प्रति करुण चीत्कार  
बलात्कारी के खिलाफ सतत् आक्रोश भी 
तुम्ही हो"

प्रकृति विज्ञान की कोई भी मूर्त-अमूर्त घटनाओं के पीछे कोई ना कोई कारण होता ही है तथा कोई न कोई उसका जवाब देह भी होता है । यह अतिशय ही है कि इस व्यवस्था में , यहां जवाबदेह नहीं हैं ।

"हम एक ईश्वरीय व्यवस्था में जी रहे हैं 
जहां ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं 
हर जगह मौजूद है 
कण-कण में विद्यमान हैं पर किसी घटना के लिए वह जिम्मेदार नहीं"

यह अपने तरह का एक अनिवर्चनीय दकियानूस विचार है । यह कैसे संभव है ! यक्ष प्रश्न है जिसके लिए हम भीड़ और भेड़ हुए  , नहीं चुकते-मानने 'वह किसी भी घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं' । अस्तित्ववादी दर्शन और उसकी स्वीकार्यता गहरे में पैठ बनाई हुई है तो सवाल तो बनने ही चाहिए कि

"हत्यारा खुलेआम घूम रहा"

 हमारी चुनी हुई व्यवस्था है और वह जिम्मेदार नहीं है । ऐसा कैसे चलेगा ! अस्तु या हमारा दुर्भाग्य है कि दुनिया उसकी है , और उसकी दुनिया में ,जो हैं

 "बलात्कारी नैतिकता पर भाषण दे रहा है" 


'पतंग उड़ाता हुआ लड़का' संग्रह की बेहतरीन कविताओं में है । यह देश असमय और चलते चलते बूढ़ा होता जा रहा है । अहसासात से परे वह धर्म की अफीम के नशे में है और हमारे भाग्य विधाता हैं कि निरंतर उसे बरगलाए हुए हैं । वह अपनी धुन में आसमान की तरफ देखता है , पतंग उड़ाता है , आटा , तेल , नमक  ,दाल के बढ़ते भाव को समझने की चेतना से वंचित रह जाता है फिर उसकी दिनचर्या में शामिल रह गया

"पड़ोसी लड़के की पतंग काट कर 
जश्न मनाता है 
पतंग उड़ाता हुआ लड़का बूढ़ा हो गया है"

अनिल चतुर्वेदी की कविताओं की ध्वनियों को बिना पकड़े उसकी व्यंजना को पकड़ पाना मुश्किल है जैसा कि उनकी अधिकांश कविताओं में है ।



"उन्होंने बलात्कार किए /सिर्फ इसलिए क्योंकि 
उनकी शक्लें हूबहू हमसे मिलती थीं !
वे हमारी तरह हंसते , रोते थे 
और हमारे सुख-दुख में 
शरीक होने की कला में माहिर थे ।"

नारों का अपना शोरगुल है । महत्त्व अभी इसलिए नहीं कहूंगा कि 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' चूंकि यह भी एक नारा ही है । आश्चर्यजनक और बेतहाशा प्रचलन में इस बीच जो वाक्य सबसे अधिक सामने आया , वह 'गर्व से कहो मैं हिंदू हूं' ही है । यह नारा शोरगुल पैदा करने वाला नारा है । शोरगुल में कुछ भी सुना नहीं जा सकता । ‌ जैसे मनाही हो । यह कविता आवश्यक कला मांगो में भले ही खराब नहीं भी उतरे , किंतु भाव की सानिध्य प्रबलता से वह जो कहना चाह रही है , कहती है । मसलन कविता 'वोट बैंक' पृष्ठ संख्या 101को देखें

"हिंदू होने पर गौरवान्वित 
महसूस कराए जाने की 
यह प्रक्रिया 
शासक के लिए मतदाताओं 
के एक वर्ग के चयनित 
किए जाने की मुकम्मल तैयारी है"

जबकि यहां जो बात है , वे बातें कुछ और कहती हैं

"ये बात अगर 
शेर , कुत्ते या घोड़े को कहनी हो 
मसलन 
मैं कुत्ता हूं , मैं शेर हूं .....
तो इसका आशय क्या है ! मुझे इंसान होने पर नहीं 
हिंदू होने पर गर्व है"


नहीं भाई नहीं !

"आप इस मुगालते में न रहें 
कि मतदाता 
शासक का चुनाव करते हैं असल में शासक ही 
अपने मतदाताओं का 
चुनाव करता है"

संग्रह में 'कुर्सी' 'अभिनंदन' 'वे हत्यारे' 'प्रजातंत्र में शासक' 'व्यवस्था सीरीज की चार कविताएं' तथा 'प्रजा और तंत्र' व 'जनता ने थालियां बजाई' 'यह प्रजातंत्र है' 'प्रजातंत्र दो' जैसी अनेक राजनीतिक मुहावरों की कई महत्वपूर्ण राजनीतिक कविताएं हैं । जो वर्तमान व्यवस्था के चाल चरित्र को उजागर करने पूरी मुस्तैदी से जुटी हुई है । ये कविताएं हमारे समकालीन राजनीति के उन तमाम क्रूर सच्चाइयों को भलिभांति न सिर्फ देखती है पहचानती भी है , आगाह करती है ।
कविता , कला है की सच्चाईयों को स्वीकार करते हुए , स्वीकारता हूं कि कविता एक वक्तव्य भी है । अपने समय को दर्ज करता हलफ़नामा है । जो उनके इन तमाम राजनीतिक कविताओं में कमबेशी बनते-बिगड़ते दिखेंगे । परन्तु ये अपने वास्तविक सच होने के कारण इस आरोप से मुक्त भी हैं । यह भी कि अनिल चतुर्वेदी की कविताओं में कहीं कहीं पराजय बोध निरूपायता और अपने असहाय होने की गुंजाइश तथा स्वीकारोक्ति में भी दिखे हैं , फिर भी अंत में मैं यही कहूंगा कि ये कविताएं अपने भावबोध , अभिव्यक्ति की सीमाओं को दरकाने में कसर नहीं छोड़ते तथा व्यापक समाज के हितार्थ अपना ध्यान आकृष्ट कराने सफल होती है । कहूंगा कि इन कविताओं की खूबी में अनिल चतुर्वेदी के द्वारा प्रयुक्त प्रतीक , बिम्ब विधान और उनका व्यंगात्मक शैली है जो कविता को अपने शिल्प की अनगढ़ता से बांधे रखती है ।


संग्रह के प्रकाशन में जरूरी संपादन मशवरा न मुहैया कराना बिम्ब-प्रतिबिंब की कोताही और हड़बड़ी को दर्शाता है । काफी लापरवाही बरती गई है । यह शीर्षक और कविताओं के रिपीटेशन में झलकता है । जवाबदेही बनती है । प्रकाशन सिर्फ व्यवसाय नहीं है , जिम्मेदारी भी है ।

खैर अनिल चतुर्वेदी को खूब बधाई व स्नेह कि वे अपना पहला संग्रह ला सके । सस्नेह सादर

Friday, April 29, 2022

गणेश पाण्डेय

बगैर किसी वास्तविक आशय अथवा तथ्यों की समझ के जब भी हम बात करेंगे वह हल्का ही लगेगा ! गणेश पाण्डेय की आलोचना पद्धति पर लैंगिक भेद का आरोप मढ़ते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनके कथन में निहित भाव का सारांश लैंगिक न होकर आलोचना के छद्म और विकार पर उनका कहा दारूण सच है । इसके लिए 'मर्दाना' अथवा 'जनाना' आलोचना शब्द के भावों को समझना जरूरी है ।

"मैंने जिसकी पूंछ उठाई
उसको मादा पाया"

 मैं यहां धूमिल की पंक्ति को इसलिए रख रहा हूं कि धूमिल के इस काव्य चेतना में भी क्या उन्हें यही लैंगिक भेद दिख रहा है या वह सच नहीं दिख रहा है जो धूमिल या कि गणेश पाण्डेय दिखा रहे हैं । तब साथी आपके सृजनशीलता पर मुझे संदेह है ।

Tuesday, December 14, 2021

सिद्धार्थ वल्लभ

एक कवि स्वप्न देखता है , स्वप्न को जीता है , और वह अपनी स्वप्नदर्शी दृष्टि से उसे यथार्थ के जमीन में उतारता चला जाता है । कवि की स्वप्न जीवी आकांक्षा एका नहीं चलता वह बहुआयामी होता है । सम्पूर्ण मानव जाति के विकास की प्रक्रिया में उनके उत्थान की कामना लिए होती है । सिद्धार्थ वल्लभ भी इसी कामना के कारण आज समकालीन हिंदी कविता में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते आगे आए हैं । यह दहकता आग का गोला-सा , सीधी-साफ , खरी-खोटी कहने नहीं चूका कभी । पर यह कवि , आखिर जीवन और अपने सपनों में चाहता क्या है ? और चाहता है तो किसके लिए चाहता है तथा क्यूं चाहता है ?  कोई तो बात है ! जो सिद्धार्थ वल्लभ की कविता में यह तरूण करूणाई में आई  । सिद्धार्थ वल्लभ अपनी इस कविता में यह बता पाने में कि समझा पाने में इसलिए कारगर है कि सम्पूर्ण विश्व अपने ही बुने तानों-बानों में इस कदर उलझ गया है और व्यथित है कि वह अपनी जड़ता के नकार में अब बेहतरी देख रहा है । परन्तु यह उस हठी सांप और मेंढक के दास्तां की तरह है जिसमें सांप मेंढक को निगल भी नहीं पाता और उगल भी । पूरा विश्व समुदाय आज अपनी भौगोलिक सीमाओं ,अपनी महत्त्वाकांक्षाओं के चलते आयुध के ढेर में बदला-बदला सा दिख रहा है । समाज में एक मनुष्य दूसरे के प्रति पराभाव से ऐसा भरा है कि प्यासे हों , एक दूसरे को सूरत- ए - हाल नीचा दिखा ही ले। इस व्यग्रता व बेचैनी का कोई और छोर कहीं नहीं दिख रहा । ऐसे में हमें अब पारम्परिक स्त्रोतों की ,नैसर्गिक मूल्यों की आवश्यकता , शिद्दत से महसूस होने लगा है । कोई ऐसा राष्ट्र अथवा समाज नहीं बचा कि सिद्धार्थ की आकांक्षाओं का आकांक्षी न होगा यकीनन । सिद्धार्थ वल्लभ अपनी इस कविता में इसी सलीके की पहचान कर रहे हैं

Sunday, December 12, 2021

स्त्री कविता

हिंसा अपने किसी भी रूप में रहे बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है । भय और अक्रांतकारी सत्ता अपने राजनीतिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इस बर्बरता का  पक्षकार बराबर बना हुआ है नतीजतन न्याय भी , नाउम्मीदी में बनी हुई है । संवेदना मनुष्य के भीतर नैसर्गिक है । मनुष्य अपने स्वभाविकता में कभी भी उतना उग्र नहीं है जितना कि अन्याय या अप्रीतिकर परिघटनाओं के बाद होने लगता है मसलन निर्भया कांड , उन्नाव रेप केस , कि रांची में हुई घटना को लेकर होता दिखा । वह तब और अधिक उग्रता में देखा गया कि उसने न्यायिक प्रक्रिया की लचरता से आजिज़ आ , पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर को भी जायज माना । हालांकि यह दुखद पहलू है कि वह न्याय प्रणाली से और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनासक्त हुआ। लेकिन इनघटनाओं-परिघटनाओं के विपरीत एक कवि ने उसे , स्त्री को उनकी सार्थक समाजिक सरोकार से वंचित रखे जाने के षडयंत्र के रूप में देखा है और कहा --- 

बेटियों डरना मत
इसलिए हो रहा है यह सब
कि तुम लौट जाओ
घर की कैद में
पर तुम्हें बढ़ना है आगे
मुकाबला करना है

 यह कविता उन्हें लेकर , उनसे जुड़ी तमाम चिंताओं को लेकर, पूर्णतः स्त्री अस्मिता को लेकर है  । एक पिता की चिंता , एक भाई की चिंता , एक पूरे परिवार की चिंता भी इस कविता में अभिव्यक्त होता है । कविता केवल बलात्कार को ही लेकर लिखी बिल्कुल भी नहीं है । परन्तु कवि ने इस कविता को सम समायिक बलात्कार की घटनाओं से जोड़ इसकी व्याप्ति को और अधिक व्यापक किया । किसी कवि की कविता में मौजूदा समय का भान और भविष्य की संभावनाओं की संकल्पना उसके काव्य संप्रेषण को अधिक पुष्ट बनाती है । यह इस कविता के भीतर मौजूद है । 
कवि में एक ओर जहां स्त्रियों से साहस से उठ खड़े रहने का आग्रह है वहीं उस समय और स्थिति को देखने की आकुलता है , प्रतीक्षा है । उनके लौटने में लौटना वैसा नहीं है , जैसा भय से उत्पन्न लौटने में होगा । वे साफ़ और मुखर हो कहते हैं 'लौटना'

पर हत्यारों के भय से नहीं
अपनी काम खत्म कर लौटना वापस
मैं सदियों तक उस घड़ी का इंतजार करूंगा ।

साहस बंधाती और बल देते कविताओं की श्रृंखला में कवयित्री लता पराशर , सांत्वना श्रीकांत ,  Virender Bhatia की कविता का उल्लेख मुझे जरूरी इसलिए लग रहा है कि ये कविताएं भी स्त्री चेतना के प्रति उतनी ही धैर्यवान और साहसी कविताएं हैं जो जड़ता के विरूद्ध डंट कर खड़ी है ।

लता पराशर की कविता की मानें तो स्त्री का शिक्षित होना ही उनमें वैकल्पिक सशक्तिकरण ला सकता है , उन्हें बलशाली बना सकता है  । लता की मुक्ति कामी सोच  कलुषता से मुक्त जीवन में शिक्षा रूपी मशाल जलाकर उजियारा भरने के आभा को प्रकट करती है  

मेरी प्यारी
मेरी लाडली
बच्चियां
तुम्हारे संग होने से
अपने को
तुम लोगों में
ढूंढने लगती हूं
अपनी
पढ़ाई के
प्रत्येक टूट को
फिर से
महसूस करने लगती हूं
कबसे इन दरारों को
भरने की
नाकामयाब
कोशिश कर रही हूं
शुभाशीष
पढ़ो और गढ़ो खुद को
वर्षों पहले
हमनें भी
सबको परे धकेल
बहुत मुश्किल से
तुमलोगों तक
खुद को खींचकर लाई हूं
तो सुनो
किसी की उतना ही सुनना
जितना जरूरी हो
अपने आप को
समझने के लिए
किताबें उठाओ
शब्दों को पी जाओ
जी लो
खुद को
पूर्णता में
हर कोई
इस संसार में
अकेला ही है
कांधे को छोड़ो
पैर मजबूत करो
बेड़ियां खोलना सीखो
भेड़ियों को
भगाना सीखो
सीखो
जिंदगी जी लेना
सीखो
अखबार में
छपी खबर से
घबराओ नहीं
कितनी लड़कियां
मिशाल बनी
कितनी मशाल बन
रौशन हुईं
कलुषता
जल जाए
इतना रोशनी
फैलाओ
चलो
फैसला करने की
हिम्मत जुटा लो

बस खुद को
जिंदा रखने

'सुनो लड़की' सांत्वना श्रीकांत की कविता वस्तुत: मूल अंग्रेजी में है जिसका अनुवाद जगदीश नलिन ने किया है  इसमें कोई दो राय नहीं कि सांत्वना श्रीकांत की कविताएं , स्त्री विषयक कविताओं में अतुलनीय कविता है ! इसमें जरा भी संदेह नहीं कि सांत्वना की इस प्रस्तुत कविता की धार एक स्त्री को लेकर बनी बनाई प्रचलित धारणाओं के खिलाफ साहस और बल के सहारे आगे आती है और उन धारणाओं के खिलाफ जाती है । महत्वपूर्ण यह है कि वे इस कविता में स्त्रीवाद या कि उनकी रूदन से कहीं बेहतर बल , प्रतिरोध में देती हैं । स्त्री मुक्ति अथवा समानता की कामना जड़ता को तोड़ कर ही हासिल किया जा सकता है और स्त्री को ऐसा होना होगा !  ऐसा होना , उनके होने के दरकार में शामिल है


Tuesday, September 14, 2021

कविता शरद कोकास

बच्चों और बचपन की दुनिया में कितनी कौतूहल भरी रहती है , निरा और उदात्त चित्त में कितना कुछ  समाया रहता है कि उमंग- पतंग है ,और नर्म व गर्म लिहाफ़ में ढंका वस्तुनिष्ठ उत्साह फिरकी लेता लट्टू । यह मैं नहीं एक शोधार्थी पुरातत्ववेत्ता की कविता कह रही है । नवें दशक के प्रारंभिक दिनो से अपनी काव्य यात्रा में निकल पड़े प्रगतिशील मूल्य बोध के इस जागरूक कवि का रचना संसार निरी जिद्द से प्रमाणिक तथ्यों - दस्तावेजों तक का सफ़र यूं ही तय नहीं करता वह उसकी बानगी भी बनती है ।कवि की कविता में उसका बचपन न केवल  शकुंतला पुत्र भरत के जैसे कुलांचे मारते- दिखता बल्कि नादान और चालाक खरगोश के मानिंद  संपृक्त भी ।समकालीन हिन्दी कविता में 'लोकगान' की अतिरंजना के बनिस्बत लोक संवेदना तथा लोकमंगल की कविताओं को ज्यादा स्वीकृति तथा सफल मानी गई और शरद की कविताओं में ये सारी खूबियाॅ उनके समाजिक व वैज्ञानिक बोध के साथ उदधृत हुई है । शरद के बचपन और उसके राग को मुद्दत बाद महसूस कर रहा हूं ठीक वैसा-जैसा भूख - रोटी को महसूसता है ।यह शरद का गैर राजनीतिक पक्ष होकर भी एक पक्षधर कवि की सामाजिक पक्षधरता के सन्निकट का प्रस्थान बिंदु बनता है । इस बीच शरद की 'हमसे तो बेहतर हैं रंग' व 'पुरातत्ववेत्ता' इत्यादि संग्रह हम पाठकों के मध्य आ चुका है । लिहाजा कवि की दृष्टि ज्यादा गंभीर और पैनी बन गई है । अतः कहना न होगा शरद अपने समकालीन - सहयात्रियों में महत्वपूर्ण  बन गए हैं ।

Saturday, August 28, 2021

एकता नाहर

कोई अधिक अथवा अधिकारिक जानकारी नहीं है मुझे । परन्तु यह केवल एक कविता ही है जो मुझे एकता नाहर का मुरीद बनाती है । पेशे से पत्रकार साथी एकता नाहर विद्रोही तेवर की हैं । अपनी उपस्थिति को सीधी सपाट बयानी में दर्ज़ करती हैं । हालिया प्रकाशित उनके काव्य संग्रह 'सूली पर समाज' की कविता साभार वेब पत्रिका 'अपना मोर्चा डाट काम' से ।
इस कविता को पोस्ट करने की वजह ‌और आशय साफ है समकालीन हिंदी कविता में यौनिकता के मार्फत आती अश्लीलता के बनिस्बत इस कविता से कवि कुछ यथार्थ को पकड़े ना कि अश्लील संवाद अथवा रेखाचित्र बनाएं । जहां एक उत्कृष्ट रचना अपनी रचनात्मकता में पूरी तरह समाजिक होती है। समाज में फैले वैमनस्य भावों को ठीक-ठीक रेखांकित करती है , सवाल खड़ा करती है । न्यूनतम के प्रति ईमानदार होती है । वही छद्म रचनाशीलता आपको पब्लिश करायेगा । आह ,वाह से नवाजेगा । सरोकारी नहीं बना पाएगा । यह समझने की जरूरत है । 

सपाट सीने वाली लड़कियां
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सपाट सीने वाली लड़कियां हर जगह से ठुकराई गयीं

 

रिश्ते की बात करने आए लड़के वालों ने 

जब नजर भर के उसे देखा तो फिर 

उसका कोई और हुनर मायने न रहा 

 

पुलिस की नौकरी में आवेदन करने से भी, 

लोक सेवा आयोग ने शर्तों में लिखा है

कि कितने इंच का होना चाहिए सीना

 

किसी चित्रकार ने अपने खूबसूरत चित्रों में

जगह नहीं दी उस स्त्री को

जिसके सीने पे उभार न था

चित्र बनाने के लिए सुडौल शरीर का बिम्ब सबसे आकर्षक था.

 

आए दिन देखा तिरस्कार 

सहेलियों की बातों में, पति की नज़रों में 

अंतरंग क्षणों में भी वो प्रेमी के सामने सहमी-सहमी सी रही

कभी खुद को ही आइने में देख हुई शर्मिंदा 

कभी पैडेड ब्रा में छिपाती रही खुद से खुद को ही 

 

उसके लिए छाती पर दुपट्टा डालना

भरे बदन वाली लड़की जितना ही जरूरी था 

ताकि वो बचा सके खुद को उस पर हंसती हुई लालची नज़रों से 

हां...भरे बदन का मतलब भरी हुई छातियों से ही है शायद. 

 

ये लोग नहीं कर सके उन्हें पूरा प्रेम 

लेकिन इन सबने चुटकुले बना कर हंसा उन पर खूब 

क्योंकि हम बड़े हुनर बाज हैं 

हर चीज को अपने चुटकुलों में जगह देते हैं.

Tuesday, August 24, 2021

रंजीत वर्मा की कविताएं दहकते सवालों और अपने बेबाकपन से पहचाना जाता है

इधर रंजीत वर्मा ने कुछ बेबाक और दहकते सवालों को अपना काव्य विषय बनाया । उनकी कविताई में काव्य विषय का चयन और कहन की शैली का जो तारतम्य है वह मुझे भी प्रभावित करता है । यानी कथ्य और शिल्प के बीच यथार्थ का जो गुथम-गुथी उनकी कविताओं में देखा गया , वह एक अलहदा खूबियों में परिलक्षित होता है । कहना न होगा कि रंजीत वर्मा की काव्य दृष्टि अपने सामर्थ्यवान खूबियों के कारण न सिर्फ सराही जाती हैं बल्कि हमारे समय को एक गंभीर इतिहास बोध से जोड़ , मंत्रणा से भर देता है । रंजीत वर्मा की कविता वस्तुत: हिंदी कविता में प्रतिरोधी चेतना की सशक्त कविताओं के साथ , हमें अपने वास्तविकता से रूबरू कराए रखने वाली जरूरी कविताएं हैं  । ये कविताएं अपने लक्ष्य तथा मुहिम के साथ आती हैं । कोई दुराव कि छिपाव नहीं होता । मतलब कि जब कोई कवि आग को आग की तरह और पानी को पानी की तरह देख-समझ लेता है तो बात को वह गोलियों के बौछारों की तरह धांय-धांय उड़ेल ही देता है । रंजीत वर्मा की शिनाख्तगी भी इसी रूप में किया जा सकता है । हमारे समय के तमाम लीपा-पोती को रंजीत वर्मा सीधे-सीधे यानी फूल को फूल और शूल को शूल कहने , देर नहीं करते । वे अपनी कविता में , कोई क्रियेटिव स्केच यदि बनाते भी हैं तो स्केच के बाहर के दृश्य और संभावनाओं को भी तल्खी में बता जाते हैं । किन्तु इधर देख रहा हूं कि हिंदी कविता में कुछ कायर और कोढ़ दिमाग के कवियों का समाज सक्रिय हो गया है , उनके द्वारा कविता की मुख्यधारा को कोसना और गरियाना जारी है । प्रतिरोध अथवा क्रांति की कविताओं से ये लोग अपने लिजलिजे संदर्भों की कविता से तुलना  करते , मुख्यधारा की कविता से अड़ाने की चेष्टा में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं । परन्तु मुख्यधारा की कविता है कि उत्तरोत्तर गतिमान है । वजहें जो भी है पर यह साफ़ है कि उनकी पेट से जुबां तक इंफेक्शन वैचारिक कविताओं के बेधक साहस से गहराया हुआ जान पड़ता है । जहां तक मैं देख पा रहा हूं ये लोग हर दूसरे-तीसरे लफ्ज़ पर वाम को गरिया विचारधारा के ऊपर लांछन लगाने को अपनी शग़ल बना चुके हैं । घिन मुझे उन तथाकथित काव्य प्रेमियों के प्रयोजन व उस तरीके पर नहीं आते  , जो पीछे दरवाजे से सत्ता की चाकरी बजाते हुए अपना काम कर रहे होते हैं । यकीनन यह चरित्र उनका ऐतिहासिक चरित्र है ! पर मुझे घिन और उबकाई आने लगती है उनके घटिया और गैर जरूरी अल्लुक खल्लुक दांव-पेंच पर । घिन आती है उस मानसिकता पर जो सुन्दर , सजीव , और यथार्थ कला से लबरेज़ कविताओं को नकार ढुलमुल कविताओं और लिजलिजे विचारों की डुगडुगी बजाते खड़े हो जाते हैं  । वाम कवियों लेखकों में तकनीकी त्रुटियां हो सकती है , किन्तु उनके विचारों में उनके तरह के कोई भी घटिया पूर्वाग्रह नहीं है , जैसा कि इधर के उन लिजलिजे दिलों दिमाग वाले कवियों में है ।  बेसिकली ये खलियार लोग हैं । उकताए लोग हैं । और असल में अफीमी ,भंगेड़ी लोग हैं । जो चड्डी में हैं और त्रिशूल भाले के नुकीले इशारे पर चड्डी में ही दौड़ पड़ते हैं । हिंदी कविता की ऊर्वर भूमि में यदि ये लोग चिन्हित नहीं हुए या नकार दिए गए तो दोष विचारधारा का कि मार्क्सवाद का नहीं है । दोष उस भाव भूमि की है जिसमें प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी का भान नहीं है । ये वो 'वीर' हैं  और उसकी संतानें हैं जिससे एक दिन इतिहास को शर्मिंदा होना ही है ।  सस्नेह सादर पढ़िए रंजीत वर्मा की कविताएं  Ranjit Verma Mili Mukherji Prashant Jain Prashant Rahi u Pratibha Upadhyaya Jyoti Sparsha Jyoti Khare Mamta Kalia Mamta Singh Naresh Saigal नदीम हसन चमन Rajanand Jha वि राग विनोद Yugal Gajendra अरविंद यादव  योगिता यादव Ramprakash Kushwaha Ram Pyare Rai Ramkumar Tiwari Shubhra Singh

आओ मुझे गिरफ्तार करो
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अगर तुम लिखने के जुर्म में 
वरवर राव को गिरफ्तार कर सकते हो
तो मुझे क्यों नहीं
मैं भी तो कविताएं लिखता हूँ
आओ मुझे गिरफ्तार करो

लेकिन यह जान लो
तुम भले मुझे गिरफ्तार कर लो
कविताओं को गिरफ्तार नहीं कर पाओगे
कहाँ गिरफ्तार हुईं वरवर राव की कविताएं भी
वे आंधियों के हवाले हैं
वे खुद आंधियां हो चुकी हैं
और बेखौफ अपना काम कर रही हैं
तुम आओ मुझे गिरफ्तार करो

ऐसा क्या है कि तुम
वरवर राव की कविता से तो डरते हो
मेरी कविता से नहीं
क्या मेरी कविता में कुछ कम कविता है
क्या मेरे प्रतिरोध में कुछ कम प्रतिरोध है
कहाँ रह गई कमी मुझमें
मैं भारी बोझ में जी रहा हूँ
मैं इन्हें ठीक करना चाहता हूँ

मैं जीवन से लाऊंगा चुनकर हर जरूरी चीज
भूख 
टूटी हुई नींद
अनवरत जागते सपने
उदासी गुस्सा भय अपमान
मैं लाऊंगा सब
अपनी हार
और उम्मीद भी
लेकिन नहीं नहीं
मैं कविता को ही ले जाऊंगा
किताब के पन्नों से निकालकर बाहर
हर पल चोट खाती जिंदगी के बीच
जहाँ हर पल सैलाब उमड़ता रहता है

अगर फासिस्ट यह सोचता है
कि काल कोठरी का ठंडा भय दिखाकर
बर्फ कर देगा वह मेरी कलम की स्याही को
वह भोथरे कर देगा शब्द 
कलम के भीतर ही
तो वह गलती में है
यहाँ खून में डुबोकर अंगुलियाँ 
कविता लिखने का रिवाज है
यही कहा था फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 
अपने जमाने के फासिस्ट से

ओ मेरे जमाने के फासिस्ट
सुनो
यह उठती करोड़ों आवाजें 
ढाह देंगी तुम्हारी जेल की दीवारें
मैं भीतर की आवाज में शामिल होना चाहता हूँ

      मुर्दाखोर हँस रहा था
____________________

एक जिंदा आदमी भटकता है
एक जिंदा शहर की तलाश में
और मुर्दा हो जाता है

टेलीविजन पर एक मुर्दा
चीखता हुआ पूछता है मृत सवाल
जिसका मृत जवाब
चीखता हुआ देता है दूसरा मुर्दा 
टेलीविजन पर

मृत सपने लिए
करोड़ों लोग निकल पड़े हैं
वे जहाँ से आ रहे हैं
वह जगह पहले से मरी हुई थी
वे जहाँ जा रहे हैं उसे 
मुर्दों की बस्ती घोषित किया जा चुका था

जनतंत्र पहले ही मर चुका था
संसद मर चुका था
अदालतें मर चुकी थीं
बहसें मर चुकी थीं
फैसले जो भी आते थे
मरे हुए आते थे
संविधान का नाम
मरी हुई किताबों की सूची में
सबसे ऊपर लिखा मिलता था

मरे हुए लोग देख रहे थे
लोगों को मरते हुए
प्लेटफॉर्म पर
सड़क पर
पेशाबघर में
और उनके इस तरह मरने पर 
वे उन्हें गालियाँ दे रहे थे

मुर्दाखोर हँस रहा था
जिंदगी मौत से ज्यादा काली हो चुकी थी।

आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
____________________

मैंने सबसे पहले गोगोई की जाति जाननी चाही
पता चला कि वे ताई अहोम हैं
जिसे अनुसूचित जाति में शामिल करने की 
कशमकश चली थी 
इसी सरकार की शुरुआत में
आगे क्या हुआ पता नहीं

मुझे तुरंत राष्ट्रपति की जाति का ख्याल आया
वे भी अनुसूचित जाति के निकले
और अपने प्रधानमंत्री तो खैर
खुद को पिछड़ी जाति का
कहते ही रहते हैं

जातियों को लेकर
यूपीए के समय जो संजोग थे
उस पर भी एक नजर डाल लीजिए
प्रधानमंत्री सिख थे
और सत्ताधारी दल की अध्यक्ष क्रिश्चियन
और शुरूआती चार वर्ष मुस्लिम राष्ट्रपति 
मतलब तीनों अल्पसंख्यक थे
इस बीच तीन वर्षों के लिए 
भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर
कम से कम एक दलित तो थे ही

यह दो हजार चार से दो हजार बीस तक के 
भारत के लोकतंत्र में मौजूद
सबसे ताकतवर पद पर बैठे 
लोगों की बातें हैं
इतर इन सबके कुछ ऐसे राज्य भी रहे
जैसे बिहार और उत्तरप्रदेश
जहां पिछले तीस वर्षों से लगातार
या तो पिछड़े मुख्यमंत्री रहे या दलित
लेकिन इन सबके बावजूद
ऐसा कभी लगा नहीं कि
सामाजिक न्याय की जड़ें देश में गहरी हुई हों
या ब्राह्मणवाद ज़रा भी 
टस से मस हुआ हो
या पूंजीवाद की चूलें हिली हों
हालांकि कोई कह सकता है कि
इस बीच कुछ ब्राह्मण राष्ट्रपति भी हुए थे
और कुछ ब्राह्मण मुख्य न्यायाधीश भी 
लेकिन यह जान लीजिए
अगर ये नहीं होते तब भी सब कुछ 
इसी तरह घटित होता

दरअसल ब्राह्मणवाद एक सिस्टम है
भारत में शताब्दियों से जो अपना काम कर रहा है
पहले यह सामंतवाद का मजबूत किला था
आज यह पूंजीवाद के कत्लगाह का जिम्मा
अपने हाथों में लिए हुए है
कोई भी व्यक्ति या जाति
अपनी पूरी ताकत लगा कर भी
इसे खत्म नहीं कर सकता 
ब्राह्मण भी नहीं
भले ही यह वाद उसका अपना हो
हां वह इसे मजबूत जरूर कर सकता है
और यह काम वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा
खतरनाक ढंग से कर सकता है
बल्कि कहिए कि यही वह कर भी रहा है

अगर इन्हें देखना है तो
कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं
साहित्य की दुनिया में ही देख लीजिए
यहां ब्राह्मणवाद का जोर इतना है कि
आज जब करोड़ों लोग सड़कों पर
भूखे मर रहे हैं
आत्महत्याएं कर रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
तब ये लोग उनकी सुध लेने की जगह
रामचन्द्र शुक्ल के नब्बे साल पहले लिखे गये 
इतिहास-लेखन को लेकर
उठे बेहद पुराने सवाल पर तलवार खींचे हुए हैं
जबकि सामान्य जानकारी रखनेवाला भी जानता है
कि इतिहास रोज बनता है
और उसे रोज लिखना पड़ता है
लेकिन इनके लिए वक्त जैसे ठहर चुका है
इतिहास की गति को अगर ये समझते तो जानते
कि बाद के नब्बे साल का इतिहास काफी है
पहले की दबा दी गई कड़ियों को ढूंढ निकालने के लिए
लेकिन इन्हें इन सबसे क्या मतलब
ये ब्राह्मणवाद की खुराक बन चुके लोग हैं
तनिक भी आँच आए उन पर
ये बर्दाश्त नहीं कर पाते
ये अपनी कविता की आलोचना पर बिफर जाते हैं
ये इस कदर अहम् के शिकार होते हैं
कि साथी लेखक की मृत्यु पर उसे नहीं पहचानने को
अपने बड़े होने के प्रमाण के तौर पर 
दुनिया के सामने रखने से भी नहीं हिचकते

आपको इनका रवैया भले ही अटपटा लगे
लेकिन सिस्टम को बनाए रखने में
इनका रवैया बड़ा कारगर साबित होता है
ये लोग चाहे किसी भी जाति के हों
अंततः ब्राह्मणवाद का कलपुर्जा होकर रह जाते हैैं
यह उनकी मजबूरी होती है
और विडंबना यह कि 
इसे वे अपनी मजबूरी नहीं समझते
वे उसे खुशी-खुशी अपनाते हैं
और खुद को धन्य समझते हैं
और ताकतवर होने का भ्रम पालते हैं

आपको ब्राह्मणवाद खत्म करना है
तो आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
दिमाग में पहले से जमी
गर्द की मोटी परत आपको झाड़ फेंकनी होगी।

        जन्म की तारीख
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पहले मुझे 
ऐसे लोगों से ईर्ष्या हुआ करती थी 
जिनके जन्म की तारीख दो अक्टूबर
चौदह नवंबर
पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी
हुआ करती थी

कई बड़े साहित्यकारों का
जन्मदिन भी देखा है मैंने
किसी बड़े ख़ास दिन पर पड़ते हुए
जैसे कि बुद्ध पूर्णिमा बसंत पंचमी 
या मजदूर दिवस 

मेरे जन्म की तारीख
एक सामान्य तारीख है
लेकिन मैं यह सोचकर खुद को 
खुशनसीब मानता हूँ 
कि अगर वह कोई महान दिन नहीं है
तो वह पांच अगस्त भी नहीं है
छह दिसम्बर नहीं है
छब्बीस जून या
सत्ताईस फरवरी की सुबह नहीं है
तीस जनवरी भी नहीं है

तारीख तो तारीख होती है
अगर इनमें से कोई भी तारीख होती
तो क्या हो जाता
आप जिंदगी में क्या करते हैं असल बात यह है
तारीखें नहीं
आप प्लीज़ ऐसा कुछ मत कहिएगा

यह भी नहीं कहिएगा
कि हजारों वर्षों में हजारों बार
ये तारीखें आई होंगी
ऐसे में यह हिसाब रखना असम्भव है
कि किस तारीख में कितना खून गिरा
और किसका गिरा
बेमतलब का उपदेश है यह सब
अब आप चुप हो जाइए
और सुनिए क्या कह रहे हैं लोग

मुझे तो मिलने लगे हैं वैसे लोग
वे इतराते हुए कहते हैं 
कि जिस दिन
तीन सौ सत्तर हटाया गया था
या जिस दिन नागरिकता के सवाल पर
असम में लोगों को खदेड़ा जा रहा था
या जिस दिन राममंदिर का शिलान्यास किया गया था
या कश्मीर की घाटियों में ताला लगाया गया था
बस समझिए कि वही हमारे जन्म की तारीखें हैं
वे अब आठ नवंबर नहीं कहते
अपने जन्म की तारीख नोटबंदी बताते हैं

कुछ लोग तो ऐसे मिले
जो दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी गौरी लंकेश
कि हत्याओं की तारीखों से जोड़कर
बताते थे अपने जन्म की तारीखें 
और छूरे चमकाते थे

एक बड़े गर्व से कह रहा था
कि उसके जन्म की तारीख वही है
जिस दिन पहलू खान की हत्या की गई थी
एक की मुस्कुराहट बहुत घिनौनी थी
उसने उसी घिनौनी मुस्कुराहट के साथ कहा
वह जिस दिन पैदा हुआ था
उसी दिन आसिफा का बलात्कार किया गया था
और फिर हत्या

अगर कुछ कहना है तो यहाँ कहिए
जितनी ताकत है अंदर
सब बटोरकर चीखते हुए कहिए
हाथ-पांव सुन्न हो रहे हैं तब भी कहिए
बाहर देखिए दरवाजे पर खड़ा है पागलपन
जिसके अंदर आते ही
जिंदा रहने को तरस जाएंगे।

शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
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वे जहाँ से आ रहे थे
वहाँ उनके लिए कुछ नहीं बचा था
न कोई उम्मीद न कोई सपना
वे हारे हुए सैनिक की तरह लौट रहे थे
शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
जो उसे नोच खाने के लिए
मंडरा रहा था 
चिमनियों के ऊपर

वे हजारों मील के सफर में थे
कभी उनके पांव के नीचे पहाड़ आते थे
कभी दबी आग 
कभी उनके साथ चलती आती थी 
लोहे की वीरान पटरियाँ
उनके पांव के नीचे पत्थर होते थे 
कांटे होते थे
गहरी खाइयां होती थीं
उनकी नींद में
थोड़ा बारुद रखा होता था

हमसफ़र रास्ते
जिनसे होकर कभी 
उनका जाना हुआ था
लौटते वक्त 
उनके खून के ताजे धब्बों से 
तर-बतर थे
हत्यारे हर कदम पर थे

हत्यारा जब भी हत्या करता था
पीछे उनकी कहानियाँ 
छोड़ जाता था
कभी टूटे चप्पल
कभी मैले-कुचैले कपड़े
इस बार पटरियों पर
रोटियाँ छूटी थीं
जिसके पास भूख की
अनगिनत कहानियाँ थीं

कुछ कहानियाँ उनका पीछा करती
गाँव तक चली आई थीं
अफसोस कि
गाँव वही नहीं रह गया था
वहाँ उनके पहुंचने से पहले
अफवाहें पहुंच गयी थीं
धमकियां पहुंच गयी थीं
अफसोस यह भी है
कि वे भी अब वही मजदूर नहीं रह गये थे
वे सस्ते मजदूर में बदलते जा रहे थे
वे बंधुवा मजदूर में बदलते जा रहे थे

यही समय है साथियों
कि आप रोक दें अपना पलायन
और खड़े हो जाएं डटकर सामने
हर उस तिकड़म के खिलाफ
इस उलटे बहते समय के खिलाफ
जो आपको सस्ता बना रहा है
बंधुवा बना रहा है

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि आपका नहीं होना 
रोक देगा देश का 
घूमता पहिया

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि बौखलाए हुए हैं पूंजीपति
और बौखलाई हुई हैं 
सरकारें भी
यह सोचकर कि उनसे ज्यादा जरूरी हैं 
आप देश के लिए
लोग यह समझने लगे हैं

वे मुसीबत बनकर टूट पड़े हैं 
आप पर 
अपनी जरूरतों के लिए
आपको निचोड़ने के लिए

जब वे खुलकर सामने आ गये हैं
तो आपकी ओर से देरी क्यों
आप भी टूट पड़ें
उनपर मुसीबत बनकर
अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए
हक और अरमान के लिए
श्रम के लुटेरों को
सबक सिखाने का
यही वक्त है
इंतजार क्यों

       यह कैसा झूठ है
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यह कैसा झूठ है
जिससे न्यू इंडिया गढ़ा जा रहा है
जहाँ जनता के पैसों को करदाताओं का पैसा 
कुछ इस तरह बताया जा रहा है मानो
वे कोई मुठ्ठी भर लोग हों
जो देश का खर्च उठाने के लिए 
सदाशयता में अपनी जेबें ढीली करते हों
जबकि सच्चाई यह है कि हल्कू भी देता है टैक्स

और वह सिर्फ टैक्स ही नहीं देता
श्रम भी करता है हाड़तोड़
वे जिसे जीडीपी कहते हैं
कभी उसके महक को देखो
हल्कू के पसीने की गंध मिलेगी 
यहां तक कि वे जिस कमाई पर टैक्स देते हैं
उसके पीछे भी हल्कू का ही श्रम लगा है
और तब यह कहना कि 
कर्जे से लदा अंबानी देश चलाने वाला करदाता है
और कड़ी मेहनत कर
देश का पेट भरने वाला हल्कू 
कर के उस रुपये पर मौज करनेवाली जनता
तो यह कपट और दुष्टता से भरे वक्तव्य 
के सिवा और कुछ नहीं है

हमारी मांग है
कि देश को देश की तरह समझा जाए
एनजीओ की तरह नहीं
करदाता को करदाता समझा जाए
फंडिंग एजेंसी नहीं
कर में प्राप्त धन को
अतिरिक्त कमाई करने के अपराध में
वसूला गया दंडित धन समझा जाए
अनुदान में दिया गया धन नहीं

हमारी यह भी मांग है
कि देश को देश ही समझा जाए 
कोई दुकान नहीं 
जहां वे हमसे कहें कि शिक्षा खरीदो
स्वास्थ्य खरीदो
न्याय खरीदो
खुशियां खरीदो सपने खरीदो उम्मीदें खरीदो
बिजली खरीदो पानी खरीदो
सुरक्षा खरीदो

जब देखो तब
वे लगातार कहते रहते हैं
खरीदो खरीदो खरीदो
लेकिन हम जानते हैं
मन में उनके चलता रहता है
बिको बिको बिको 
उन्हें लगता है कि यह
खरीदेगा नहीं तो बिकने का सोचेगा कैसे
दरअसल उनको बिक जाने वाले लोग चाहिए
अपनी मेहनत का वाजिब दाम मांगती 
मेहनतकश अवाम नहीं
उन्हें गुनहगारों की गिड़गिड़ाती भीड़ चाहिए
ताकि उसकी जिंदगी को 
वे जब चाहें चबा जाएं
जब चाहें उसके नुमाइंदे को
खरीदकर अपने गोदाम में डाल दें

यह कैसी सोच है आपकी सरकार
बेशर्मी की हद पार कर
आप बहुत आगे निकल गए हैं
यहाँ हम देश को सहेजे रखने में 
दांव पर लगा दिए हैं अपना सब कुछ
और आप पूरे देश को बरबाद कर
उसे भीख की जिंदगी जीने को बाध्य किए हुए हैं
क्या यह महज संयोग है कि
इसी दौरान भारत का एक आदमी
एशिया का सबसे धनी आदमी बन जाता है
और हमसे कहा जाता है कि
हम इसे अपनी उपलब्धि समझें
क्या आपको दिख नहीं रहा यहां हमारी जिंदगी
कीड़े-मकोड़ों से भी बदतर हो गई है
अन्न के दाने को तरसती पूरी आबादी
सड़कों पर रेंग रही है

दुश्मन हैं देश के तो
दुश्मन की तरह खुलकर सामने आइए
छिपकर वार करने जैसा घृणित काम मत कीजिए।

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...