Friday, October 30, 2020

कैलाश मनहर

एक रिवाज सा चल निकला है इन दिनों , पनाहगाह के लिए बेरुखी , बेमुरव्वत । यह हादसों के शहर में हद से कही दूर , और आगे तक है । ज़ालिम जमाने ने दस्तूर ए ख़ास के अर्थ को तार-तार कर दिया है । ऐसे वीभत्स और डरावने समय में स्वार्थ के अलावा कोई नजदीकी भी नहीं , सब अपनी माने खो रहा हो , तब कैलाश मनहर जैसे साथी उस टिमटिमाते दीपक के लौ की तरह हाजिर होते रहे हैं और आश्वस्ति से भरते रहे हैं कि कुछ हाथ अब भी है बिल्कुल सही सलामत और साबूत । विश्व पर्यावरण दिवस पर लिखी इस कविता के अनेकार्थ कम सटीक और जीवन्त नहीं है , बजाय इस मीडियोकरी समय के छद्म से जो प्रकृति , पर्यावरण के प्रति संजीदगी में आए हैं और व्यापक मनुष्य के जीवन में बड़ा हस्तक्षेप कर बड़े बुजुर्गो के प्रति मान सम्मान के नज़रिये को प्राथमिक बनाए जाने के गुण से हमें सम्पन्न बनाता है । कैलाश मनहर की इस कविता के विजुअल से कहीं अधिक अन सीन में दृश्य है । जिसे समझने के लिए मनुष्य में जैविक दृष्टि की वांछनीय दरकार है 

धूप बहुत तेज़ है
और मैं जिस पेड़ की छाया चाहता हूँ
वह धूप में खड़ा है

#विश्व_पर्यावरण_दिवस

Wednesday, October 28, 2020

विनय कुमार

समकालीन हिंदी कविता में कुछ बेहतर लिख रहे कवियों की कविता में मौजूद यथार्थ बोध , उनकी गहन दृष्टि संपन्न चेतना व अनुकरणीय  संघर्षशीलता , हमेशा मुझे आकर्षित करता रहा है । मुझे याद आता है इस बीच शाहीन बाग और लाकडाऊन को लेकर लिखे कविताओं के मजबूत पक्ष के बराबर अब तक किसी भी विषय संदर्भ में इतनी कविताएं , शायद ही कभी लिखे गये हों । प्रतिरोध का इस तरह से जागना आश्वस्ति प्रदान करता है । परन्तु इसी के परस्पर विनय कुमार ने बहुत ही आत्मीय और दाम्पत्य प्रेम की कविताएं लिखा है । यह गौर किया जाना चाहिए कि अपने समय के त्रासद सच को एक कवि दूर देश में बैठी पत्नी तक अपने 'पाती' के माध्यम से कैसे पहुंचाता है !
 विनय कुमार की इस कविता की बड़ी ख़ास बात यह है कि इसमें भी वही त्रासद सच , विडंबना बोध ,  नागरिक व्यथा का यथार्थ गहरे अर्थों  में अभिव्यंजित हो रहा है और वह भी शांति में । विनय कुमार के यहां इस कविता में न कोई ताबड़तोड़ गुस्सा है और न निरुपायता ही । किन्तु भाव और संवेग से रची इस प्रेम कविता (स्वकीया प्रेम )की अपनी अंतर्दृष्टि है । जो न‌ई है । Vinay Kumar

पढ़िए विनय कुमार की कविता 'पाती' साभार जानकीपुल
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 इन दिनों घर में अकेला हूँ। बेटी मेडिकल कॉलेज में मरीज़ों की सेवा में और पत्नी न्यू जर्सी,अमेरिका मे बेटे के पास ।कल अरसे बाद उसके नाम कोई पाती लिखी। उसे भेजी तो बोली – सबको पढ़ा दो। सो, अपना या ख़त दरबार ए आम में-
 
 
                  पाती
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                      १

लोगों के फ़ोन बहुत आ रहे
पूछते हैं – कैसा हूँ
यह जानकर सहानुभूति चचकारते हैं
कि में अपने घर में निपट अकेला हूँ
 
परेशान हो जाता हूँ कई बार
तो पैर बहलाते हैं
चलो छत पर
पंछी आ रहे होंगे
 
जवाब देते हैं दो हाथ
और दस उँगलियाँ
सारी की सारी इंद्रियाँ
 
आँखें कहती हैं –
मेरे पास सूर्य
और चंद्रमा दोनों की रोशनी है
 
कान कहते हैं
मेरे पास बेगम अख़्तर की आवाज़ है
लता और किशोर और जगजीत की भी
 
नासिकाएँ यक़ीन दिलाती हैं
कि उनके पास फूलों की ही नहीं
पहली बारिश में भीगती सूखी मिट्टी की साँस भी है
 
जीभ कहती है – बोलो क्या चाहिए
इतना लंबा मेन्यू है मेरे पास
पढ़ते – पढ़ते नींद आ जाएगी
और हथेली दोस्तों के नाम गिनाने लग जाती है !
 
                      २
ख़ुद को बहलाने की भी एक हद होती है
पेड़ों और फूलों और पंछियों के चेहरे याद हो गए हैं
 
मोहल्लों के कुत्तों को
उनकी आवाज़ से पहचानने लग गया हूँ
समझने लगा हूँ कि सारे कौए इसी मुहल्ले के नहीं
कुछ राजेंद्रनगर और बाइपास के पार से भी आते हैं
और वे अपनी गोष्ठियों में कोरोना के ख़िलाफ़
कविता नहीं पढ़ते
 
                         ३
इस विवश एकांत से अधिक कौन जानता है
कि हज़ारों मील दूर
बच्चों को गोद में लिए एक मचान पर बैठी हो तुम
मृत्यु की ख़बरें बाढ़ के पानी की तरह बढ़ रही हैं
 
किसी मार खाए बच्चे की तरह
परदे की ओट से झाँकते हैं वे दिन
जब दूरियों की पैमाइश घंटों में होती थी
 
मील अपनी लम्बाई लिए वापस आ गए हैं
 
रोटी हम दोनों के पास है तकिए भी
लेकिन नींद
खिड़की के शीशों पर
ओस की तरह टपकती है
शीशे धुंधले हो जाते हैं और सो जाते हैं
आँखें जागती हैं
मगर शीशों के पार कुछ भी दिखाई नहीं देता
तुम्हारा डर समझाता है
खिड़कियाँ मत खोलो
मूँद लो आँखें और सोने की कोशिश करो
और तभी अशुभ आवाज़ों वाली गाड़ियाँ
पत्रहीन वृक्षों की ठूँठ नींद को चीरती गुज़र जाती हैं
 
अच्छी चीज़ें बूँद-बूँद बह रही हैं उधर
जिधर जाना मना है
 
                      ४
उत्तरी अमेरिका एक महादेश है
कई महानताएँ बसती हैं वहाँ
सोने के पर्वत रखने की गगनचुंबी तिजोरियाँ
और बर्फ़ के विस्तार के नीचे सोने का नगर
वे हथियार जो सब कुछ ख़त्म कर सकते हैं
 
सबको मार सकने की ताक़त जिसके पास
तीन-चार फ़ीट गहरे गड्ढे खोद रहा है
 
गलियाँ यहाँ भी सूनी हैं
मगर बुलेवार्ड का सूनापन अंतरिक्ष जैसा लगता है
ठीक कहती हो तुम
यह झोपड़ी और महल के गिरने का फ़र्क़ है
 
जो भी ही संयम का मचान कभी नहीं गिरता प्रिये
कह देना बच्चों से
कि पुरखों की यह बात अमरदीप है
जिसकी रोशनी में
पृथ्वी के सबसे पुराने नागरिकों में से एक -भारत – ने सहस्राब्दियाँ पार की हैं
 
                     ५
यहाँ का समाचार अच्छा है
हवा साफ़ है आसमान नीला
कल बारिश हुई थी
मैं बालकनी में बेंत की कुर्सी पर देर तक बैठा
लगा, रामगिरि पर बैठा हूँ
 
                       ६
पंछियों का दाना-पानी बदस्तूर जारी है
कुत्तों की रोटियाँ भी
 
पड़ोसी की गायों का रंभाना अच्छा लग रहा इन दिनों
उनके लम्बे और छोटे आलाप
ऋगवेद के गायत्री छंद की याद दिलाते हैं
 
मुहल्ले का कोई समाचार नहीं मिला है
यानी ठीक ही होगा सब
अपना मुहल्ला तो पहले भी शरीफ़ों का था
अब तो सामाजिक दूरी को
क़ानून का दर्जा ही मिल गया है
 
सुरक्षा सबसे बड़ा सरोकार है
भला आदमी वह जो दो मीटर दूर से मिले
संदेह को स्वभाव में बसाने को कोशिश जारी है
 
                      ७
मुल्क का क्या कहें
पहुँचती ही होंगी ख़बरें तमाम
मलाई की परत पतली हो गयी है
पराठे रोटियों में बदल गए हैं
कल की तमाम उड़ानें रद्द हैं
अचानक लगे ब्रेक के बावजूद
पहिए घूम रहे हैं
जगह-जगह जलते टायर की गंध है
 
बजती थालियों, जलते दीयों और बरसते फूलों के बीच
बहुत चूल्हे ठंडे हो गए हैं
राजाओं को कहाँ रहता ध्यान
कि पैरों और हाथों के बीच पेट भी होता है
 
जो ठीक से षडरस नहीं जान पाए
क्या जान पाते कि वाइ-रस क्या बला है
जिनके पास ताले ही नहीं
कैसे समझ पाते कि क्या होती तालाबंदी
बहकावे सिखावे और बहलावे के वोटर
क्या बूझ पाते कि ‘सर्वजन सुखाय’ बोलती
सियासत के मन में क्या है
 
बाँसों से घिरे हैं रास्ते
भूख के बाड़े में बँधे हैं करोड़ों पेट
 
मज़दूरी की शान
कारख़ानों और इमारतों की उदासी में दफ़्न हो गयी है
 
सूबों और तहसीलों की सरहदों पर
भय है भूख है भीख है
नहीं है तो भरोसा
 
नेह के नमक के लिए दौड़ रहे लाखों पैर
क़ानून की लाठियों
घृणा की ठोकरों और मौत के मोड़ों के बावजूद
 
बापू ने गमछे को मास्क बना लिया है
 
 
                   ८
मन बहुत उदास है बहोत
वजह क्या बताऊँ
ग़म ए जानां और ग़म दौरां एक हो गए हैं
 
चलो चाय पीते हैं
 
मेरे हाथों में शाम की चाय है
और तुम्हारे हाथों में सुबह की
मेरी दार्जिलिंग तुम्हारी असम
मेरी फीकी तुम्हारी शीरीं
चलो आज चुस्कियाँ टकराते हैं –
और चीयर्स की किताब में नया क़ायदा जोड़ते हैं
 
और चुस्कियाँ भी वो नहीं
जो तहज़ीब की अटारी पर
बैठी चिड़िया की तरह चुपचाप बोले
खुलकर पीते हैं आज अपनी दादियों की तरह
और चाय के सुड़कने की आवाज़
उन केबल्स में बहने देते हैं
जो मृत्यु भय से सहमे महासागरों
और महादेशों के हृदय से गुज़रते हैं !
 
                        ९
जब तुम कॉल करती हो तो कहता हूँ –
रुको, अभी लगाता हूँ
दरअसल मैं उन तकियों को हटाने लग जाता हूँ
जिनका बिस्तर पर होना
शब ए फ़िराक़ की शिद्दत का सबूत है
 
जब तुम कॉल करती हो तो कहता हूँ –
रुको, अभी लगाता हूँ
और मैं उन किताबों को हटाने लग जाता हूँ
जो फ़सीलों की तरह मुझे घेरे रहती हैं
क्योंकि जानती हो तुम
कि ये मेरे “पारा-पारा हुआ पैराहन ए जान “
के पेपरवेट हैं
 
इन्हें हटाकर तुझे बताना चाहता हूँ
कि मैंने आँधियों को बाएँ पैर के अँगूठे से दबा रखा है
 
पृथ्वी घूम रही है मगर हम नहीं घूम सकते
हवाओं की आवाजाही जारी है
मगर हम महदूद
क्या आवास और क्या प्रवास
पंछियों की चोंचें
एक दूसरे को नेह के दाने खिला रही हैं
और हम पाबंदी ए रोज़ा के ग़ुलाम
 
एक वाइरस मौत और मज़हब का रिश्ता तय कर रहा है!
 
                      १०
तुम्हारे मंदिर में हड़ताल है
रूठे हैं सारे विग्रह
एक जैसे फूलों और फलों के प्रसाद से ऊब गए हैं वे
 
सपने में आते हैं अक्सर और कहते हैं
कि यार गोंद के लड्डू और काजू कतली खाए
महीनों हो गए
 
सोचता हूँ, उज्जैन में काल भैरव का क्या हाल होगा
कैसे तैरता होगा मछली-मछली मन
सूखी हुई दूबों पे ओस के बिखराव में
 
आस्तिकता कानों में फुसफुसाती है –
शराब की दुकानें उन्हीं की मर्ज़ी से खुली हैं!
 
                     ११
तुम जब गयी थी परदेस
आम की फुनगियाँ सूनी थीं
दिखाया था न तुम्हें कि कैसे मँजरा गयी थी
अपनी आम्रपाली
पिछवाड़े का बीजू भी पीला हो गया था
अब दोनों ही अपनी पीली आभा खो चुके हैं
और नन्हीं-मुन्नी अमियों के हरापन से भरे हैं
 
कभी-कभी कहते हैं वे कूदती गिलहरियों से –
समय तो काल है
मत देखो उसे
ऋतुएँ बाहर नहीं रगों में बहती हैं
रुको कुछ दिन, लौटेंगे फिर से मंजरियो के रंग
आर्द्रा की खीर में टपकेगा मेरा प्यार
स्वाद और सुगंध की दावत होगी ज़रूर होगी !
 
                       १२
कुछ ही कमरे खुले हैं घर के
बाक़ी बंद हैं
ताले सिर्फ़ सरकार के पास ही नहीं
गृहिणियों के पास भी होते हैं
और वह जब घर में नहीं हो
तो चाबियाँ दौलत हो जाती है
 
ख़ुशी होगी जानकर तुम्हें
कि मैं इन चाबियों की झंकार
पाज़ेब की तरह सुनता हूँ
और उन्हें दिल की तिजोरी में बंद रखता हूँ!
 
                     १३
लिखना बंद नहीं हुआ है
सच तो यही कि बहुत लिखने लगा हूँ
होड़-सी लगी है
कि सन्नाटा जीतता है या छंद
ख़ालीपन की ख़बरें जीतती हैं
या फ़सलों से भरे खेतों और
बच्चों के शोर से भरे आँगनों के गीत
सूना आसमान जीतता है
या चूमे हुए होंठ सा खिला चाँद !
 
                     १४
अपने मेडिकल कॉलेज में
मरीज़ों के आँसू पोंछती बेटी थोड़ी बड़ी हो गयी है
समझदार भी
 
याद है न खिचड़ी की तरफ़ देखती तक नहीं थी
अब खाती भी है और बनाती भी
 
छोटी कविताएँ लिखकर चल देनेवाली छुटकी
हज़ारों शब्द लिखकर भी नहीं ऊबती
 
हाय रे भागती हुई दुनिया
तू जो ठहर गयी है तो बच्चे
अपने भीतर लौटने लगे हैं !
 
                     १५
तुम जहाँ हो वह जेल नहीं घर है
हमारे टूँसे हैं वहाँ
हमारे होने का अर्थ
हमारी शाखाएँ हैं वहाँ
जिसके साये में सरहद की खाट नहीं
मनुष्यता की जाजिम है
 
पुकारना तो चाहता हूँ तुम्हें उस तकिए की तरह
जिसके गिलाफ़ कई महीनों से रजनीगंधा बालों के इंतज़ार में धुलते-धुलते फीके पड़ गए हैं
मगर जब देखता हूँ
कि गुन्नू के होठों से तुम्हारी
और तुम्हारे होंठों से गुन्नू की हँसी झर रही
तो इस जादू के आलोक में ठिठक जाता है
मेरी आवाज़ से उठता तुम्हारा नाम
जिसे उचारते-उचारते
मैं तोता से हंस में बदल गया हूँ!
 
: विनय कुमार

शंभू बादल

शंभू बादल बहाव में नहीं बहे । बहाव के विपरीत रहे और प्रतिरोध को रचते रहे । साबूत हाथ पांव के होते आदमी घुटनों के बल नहीं आता , नहीं टेकता मत्था । वह टकराता है अपने समय के तमाम - तमाम जटिलताओं से और उन छद्मों को भी बेनकाब करता है जो अदृश्य रूप में हमारे ही बीच पैठ बनाए फिरता है । यह वही स्वभाव है जो हमें मनुष्य होने के बोध से जोड़े रखती है । यद्यपि नामचीनों की श्रेणी में वे बड़े कवि नहीं भी हैं पर हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि तो जरुर हैं । उनकी यह कविता इसी प्रतिरोध की पुष्टि भी करती है

एक बात बताऊँ ?
तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है
उसके तो शब्द-शब्द
झूठे अर्थ के दबाव से
फूट-फूटकर रोते हुए
बिखर जाते हैं

फिर नये लोभ से
नए-नए शब्द
बुलबुले की तरह उगते
युवा होते

Friday, August 28, 2020

प्रतिरोधी चेतना के सशक्त कवि हैं रंजीत वर्मा

इधर रंजीत वर्मा ने कुछ बेबाक और दहकते सवालों को अपना काव्य विषय बनाया । उनकी कविताई में काव्य विषय का चयन और कहन की शैली का जो तारतम्य है वह मुझे भी प्रभावित करता है । यानी कथ्य और शिल्प के बीच यथार्थ का जो गुथम-गुथी उनकी कविताओं में देखा गया , वह एक अलहदा खूबियों में परिलक्षित होता है । कहना न होगा कि रंजीत वर्मा की काव्य दृष्टि अपने सामर्थ्यवान खूबियों के कारण न सिर्फ सराही जाती हैं बल्कि हमारे समय को एक गंभीर इतिहास बोध से जोड़ , मंत्रणा से भर देता है । रंजीत वर्मा की कविता वस्तुत: हिंदी कविता में प्रतिरोधी चेतना की सशक्त कविताओं के साथ , हमें अपने वास्तविकता से रूबरू कराए रखने वाली जरूरी कविताएं हैं  । ये कविताएं अपने लक्ष्य तथा मुहिम के साथ आती हैं । कोई दुराव कि छिपाव नहीं होता । मतलब कि जब कोई कवि आग को आग की तरह और पानी को पानी की तरह देख-समझ लेता है तो बात को वह गोलियों के बौछारों की तरह धांय-धांय उड़ेल ही देता है । रंजीत वर्मा की शिनाख्तगी भी इसी रूप में किया जा सकता है । हमारे समय के तमाम लीपा-पोती को रंजीत वर्मा सीधे-सीधे यानी फूल को फूल और शूल को शूल कहने , देर नहीं करते । वे अपनी कविता में , कोई क्रियेटिव स्केच यदि बनाते भी हैं तो स्केच के बाहर के दृश्य और संभावनाओं को भी तल्खी में बता जाते हैं । किन्तु इधर देख रहा हूं कि हिंदी कविता में कुछ कायर और कोढ़ दिमाग के कवियों का समाज सक्रिय हो गया है , उनके द्वारा कविता की मुख्यधारा को कोसना और गरियाना जारी है । प्रतिरोध अथवा क्रांति की कविताओं से ये लोग अपने लिजलिजे संदर्भों की कविता से तुलना  करते , मुख्यधारा की कविता से अड़ाने की चेष्टा में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं । परन्तु मुख्यधारा की कविता है कि उत्तरोत्तर गतिमान है । वजहें जो भी है पर यह साफ़ है कि उनकी पेट से जुबां तक इंफेक्शन वैचारिक कविताओं के बेधक साहस से गहराया हुआ जान पड़ता है । जहां तक मैं देख पा रहा हूं ये लोग हर दूसरे-तीसरे लफ्ज़ पर वाम को गरिया विचारधारा के ऊपर लांछन लगाने को अपनी शग़ल बना चुके हैं । घिन मुझे उन तथाकथित काव्य प्रेमियों के प्रयोजन व उस तरीके पर नहीं आते  , जो पीछे दरवाजे से सत्ता की चाकरी बजाते हुए अपना काम कर रहे होते हैं । यकीनन यह चरित्र उनका ऐतिहासिक चरित्र है ! पर मुझे घिन और उबकाई आने लगती है उनके घटिया और गैर जरूरी अल्लुक खल्लुक दांव-पेंच पर । घिन आती है उस मानसिकता पर जो सुन्दर , सजीव , और यथार्थ कला से लबरेज़ कविताओं को नकार ढुलमुल कविताओं और लिजलिजे विचारों की डुगडुगी बजाते खड़े हो जाते हैं  । वाम कवियों लेखकों में तकनीकी त्रुटियां हो सकती है , किन्तु उनके विचारों में उनके तरह के कोई भी घटिया पूर्वाग्रह नहीं है , जैसा कि इधर के उन लिजलिजे दिलों दिमाग वाले कवियों में है ।  बेसिकली ये खलियार लोग हैं । उकताए लोग हैं । और असल में अफीमी ,भंगेड़ी लोग हैं । जो चड्डी में हैं और त्रिशूल भाले के नुकीले इशारे पर चड्डी में ही दौड़ पड़ते हैं । हिंदी कविता की ऊर्वर भूमि में यदि ये लोग चिन्हित नहीं हुए या नकार दिए गए तो दोष विचारधारा का कि मार्क्सवाद का नहीं है । दोष उस भाव भूमि की है जिसमें प्रतिरोध की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी का भान नहीं है । ये वो 'वीर' हैं  और उसकी संतानें हैं जिससे एक दिन इतिहास को शर्मिंदा होना ही है ।  सस्नेह सादर पढ़िए रंजीत वर्मा की कविताएं  Ranjit Verma Mili Mukherji Prashant Jain Prashant Rahi u Pratibha Upadhyaya Jyoti Sparsha Jyoti Khare Mamta Kalia Mamta Singh Naresh Saigal नदीम हसन चमन Rajanand Jha वि राग विनोद Yugal Gajendra अरविंद यादव  योगिता यादव Ramprakash Kushwaha Ram Pyare Rai Ramkumar Tiwari Shubhra Singh

आओ मुझे गिरफ्तार करो
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अगर तुम लिखने के जुर्म में 
वरवर राव को गिरफ्तार कर सकते हो
तो मुझे क्यों नहीं
मैं भी तो कविताएं लिखता हूँ
आओ मुझे गिरफ्तार करो

लेकिन यह जान लो
तुम भले मुझे गिरफ्तार कर लो
कविताओं को गिरफ्तार नहीं कर पाओगे
कहाँ गिरफ्तार हुईं वरवर राव की कविताएं भी
वे आंधियों के हवाले हैं
वे खुद आंधियां हो चुकी हैं
और बेखौफ अपना काम कर रही हैं
तुम आओ मुझे गिरफ्तार करो

ऐसा क्या है कि तुम
वरवर राव की कविता से तो डरते हो
मेरी कविता से नहीं
क्या मेरी कविता में कुछ कम कविता है
क्या मेरे प्रतिरोध में कुछ कम प्रतिरोध है
कहाँ रह गई कमी मुझमें
मैं भारी बोझ में जी रहा हूँ
मैं इन्हें ठीक करना चाहता हूँ

मैं जीवन से लाऊंगा चुनकर हर जरूरी चीज
भूख 
टूटी हुई नींद
अनवरत जागते सपने
उदासी गुस्सा भय अपमान
मैं लाऊंगा सब
अपनी हार
और उम्मीद भी
लेकिन नहीं नहीं
मैं कविता को ही ले जाऊंगा
किताब के पन्नों से निकालकर बाहर
हर पल चोट खाती जिंदगी के बीच
जहाँ हर पल सैलाब उमड़ता रहता है

अगर फासिस्ट यह सोचता है
कि काल कोठरी का ठंडा भय दिखाकर
बर्फ कर देगा वह मेरी कलम की स्याही को
वह भोथरे कर देगा शब्द 
कलम के भीतर ही
तो वह गलती में है
यहाँ खून में डुबोकर अंगुलियाँ 
कविता लिखने का रिवाज है
यही कहा था फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 
अपने जमाने के फासिस्ट से

ओ मेरे जमाने के फासिस्ट
सुनो
यह उठती करोड़ों आवाजें 
ढाह देंगी तुम्हारी जेल की दीवारें
मैं भीतर की आवाज में शामिल होना चाहता हूँ

      मुर्दाखोर हँस रहा था
____________________

एक जिंदा आदमी भटकता है
एक जिंदा शहर की तलाश में
और मुर्दा हो जाता है

टेलीविजन पर एक मुर्दा
चीखता हुआ पूछता है मृत सवाल
जिसका मृत जवाब
चीखता हुआ देता है दूसरा मुर्दा 
टेलीविजन पर

मृत सपने लिए
करोड़ों लोग निकल पड़े हैं
वे जहाँ से आ रहे हैं
वह जगह पहले से मरी हुई थी
वे जहाँ जा रहे हैं उसे 
मुर्दों की बस्ती घोषित किया जा चुका था

जनतंत्र पहले ही मर चुका था
संसद मर चुका था
अदालतें मर चुकी थीं
बहसें मर चुकी थीं
फैसले जो भी आते थे
मरे हुए आते थे
संविधान का नाम
मरी हुई किताबों की सूची में
सबसे ऊपर लिखा मिलता था

मरे हुए लोग देख रहे थे
लोगों को मरते हुए
प्लेटफॉर्म पर
सड़क पर
पेशाबघर में
और उनके इस तरह मरने पर 
वे उन्हें गालियाँ दे रहे थे

मुर्दाखोर हँस रहा था
जिंदगी मौत से ज्यादा काली हो चुकी थी।

आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
____________________

मैंने सबसे पहले गोगोई की जाति जाननी चाही
पता चला कि वे ताई अहोम हैं
जिसे अनुसूचित जाति में शामिल करने की 
कशमकश चली थी 
इसी सरकार की शुरुआत में
आगे क्या हुआ पता नहीं

मुझे तुरंत राष्ट्रपति की जाति का ख्याल आया
वे भी अनुसूचित जाति के निकले
और अपने प्रधानमंत्री तो खैर
खुद को पिछड़ी जाति का
कहते ही रहते हैं

जातियों को लेकर
यूपीए के समय जो संजोग थे
उस पर भी एक नजर डाल लीजिए
प्रधानमंत्री सिख थे
और सत्ताधारी दल की अध्यक्ष क्रिश्चियन
और शुरूआती चार वर्ष मुस्लिम राष्ट्रपति 
मतलब तीनों अल्पसंख्यक थे
इस बीच तीन वर्षों के लिए 
भारत के मुख्य न्यायाधीश पद पर
कम से कम एक दलित तो थे ही

यह दो हजार चार से दो हजार बीस तक के 
भारत के लोकतंत्र में मौजूद
सबसे ताकतवर पद पर बैठे 
लोगों की बातें हैं
इतर इन सबके कुछ ऐसे राज्य भी रहे
जैसे बिहार और उत्तरप्रदेश
जहां पिछले तीस वर्षों से लगातार
या तो पिछड़े मुख्यमंत्री रहे या दलित
लेकिन इन सबके बावजूद
ऐसा कभी लगा नहीं कि
सामाजिक न्याय की जड़ें देश में गहरी हुई हों
या ब्राह्मणवाद ज़रा भी 
टस से मस हुआ हो
या पूंजीवाद की चूलें हिली हों
हालांकि कोई कह सकता है कि
इस बीच कुछ ब्राह्मण राष्ट्रपति भी हुए थे
और कुछ ब्राह्मण मुख्य न्यायाधीश भी 
लेकिन यह जान लीजिए
अगर ये नहीं होते तब भी सब कुछ 
इसी तरह घटित होता

दरअसल ब्राह्मणवाद एक सिस्टम है
भारत में शताब्दियों से जो अपना काम कर रहा है
पहले यह सामंतवाद का मजबूत किला था
आज यह पूंजीवाद के कत्लगाह का जिम्मा
अपने हाथों में लिए हुए है
कोई भी व्यक्ति या जाति
अपनी पूरी ताकत लगा कर भी
इसे खत्म नहीं कर सकता 
ब्राह्मण भी नहीं
भले ही यह वाद उसका अपना हो
हां वह इसे मजबूत जरूर कर सकता है
और यह काम वह दूसरों के मुकाबले ज्यादा
खतरनाक ढंग से कर सकता है
बल्कि कहिए कि यही वह कर भी रहा है

अगर इन्हें देखना है तो
कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं
साहित्य की दुनिया में ही देख लीजिए
यहां ब्राह्मणवाद का जोर इतना है कि
आज जब करोड़ों लोग सड़कों पर
भूखे मर रहे हैं
आत्महत्याएं कर रहे हैं
खून के आंसू रो रहे हैं
तब ये लोग उनकी सुध लेने की जगह
रामचन्द्र शुक्ल के नब्बे साल पहले लिखे गये 
इतिहास-लेखन को लेकर
उठे बेहद पुराने सवाल पर तलवार खींचे हुए हैं
जबकि सामान्य जानकारी रखनेवाला भी जानता है
कि इतिहास रोज बनता है
और उसे रोज लिखना पड़ता है
लेकिन इनके लिए वक्त जैसे ठहर चुका है
इतिहास की गति को अगर ये समझते तो जानते
कि बाद के नब्बे साल का इतिहास काफी है
पहले की दबा दी गई कड़ियों को ढूंढ निकालने के लिए
लेकिन इन्हें इन सबसे क्या मतलब
ये ब्राह्मणवाद की खुराक बन चुके लोग हैं
तनिक भी आँच आए उन पर
ये बर्दाश्त नहीं कर पाते
ये अपनी कविता की आलोचना पर बिफर जाते हैं
ये इस कदर अहम् के शिकार होते हैं
कि साथी लेखक की मृत्यु पर उसे नहीं पहचानने को
अपने बड़े होने के प्रमाण के तौर पर 
दुनिया के सामने रखने से भी नहीं हिचकते

आपको इनका रवैया भले ही अटपटा लगे
लेकिन सिस्टम को बनाए रखने में
इनका रवैया बड़ा कारगर साबित होता है
ये लोग चाहे किसी भी जाति के हों
अंततः ब्राह्मणवाद का कलपुर्जा होकर रह जाते हैैं
यह उनकी मजबूरी होती है
और विडंबना यह कि 
इसे वे अपनी मजबूरी नहीं समझते
वे उसे खुशी-खुशी अपनाते हैं
और खुद को धन्य समझते हैं
और ताकतवर होने का भ्रम पालते हैं

आपको ब्राह्मणवाद खत्म करना है
तो आपको सिस्टम से बाहर निकलना होगा
दिमाग में पहले से जमी
गर्द की मोटी परत आपको झाड़ फेंकनी होगी।

        जन्म की तारीख
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पहले मुझे 
ऐसे लोगों से ईर्ष्या हुआ करती थी 
जिनके जन्म की तारीख दो अक्टूबर
चौदह नवंबर
पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी
हुआ करती थी

कई बड़े साहित्यकारों का
जन्मदिन भी देखा है मैंने
किसी बड़े ख़ास दिन पर पड़ते हुए
जैसे कि बुद्ध पूर्णिमा बसंत पंचमी 
या मजदूर दिवस 

मेरे जन्म की तारीख
एक सामान्य तारीख है
लेकिन मैं यह सोचकर खुद को 
खुशनसीब मानता हूँ 
कि अगर वह कोई महान दिन नहीं है
तो वह पांच अगस्त भी नहीं है
छह दिसम्बर नहीं है
छब्बीस जून या
सत्ताईस फरवरी की सुबह नहीं है
तीस जनवरी भी नहीं है

तारीख तो तारीख होती है
अगर इनमें से कोई भी तारीख होती
तो क्या हो जाता
आप जिंदगी में क्या करते हैं असल बात यह है
तारीखें नहीं
आप प्लीज़ ऐसा कुछ मत कहिएगा

यह भी नहीं कहिएगा
कि हजारों वर्षों में हजारों बार
ये तारीखें आई होंगी
ऐसे में यह हिसाब रखना असम्भव है
कि किस तारीख में कितना खून गिरा
और किसका गिरा
बेमतलब का उपदेश है यह सब
अब आप चुप हो जाइए
और सुनिए क्या कह रहे हैं लोग

मुझे तो मिलने लगे हैं वैसे लोग
वे इतराते हुए कहते हैं 
कि जिस दिन
तीन सौ सत्तर हटाया गया था
या जिस दिन नागरिकता के सवाल पर
असम में लोगों को खदेड़ा जा रहा था
या जिस दिन राममंदिर का शिलान्यास किया गया था
या कश्मीर की घाटियों में ताला लगाया गया था
बस समझिए कि वही हमारे जन्म की तारीखें हैं
वे अब आठ नवंबर नहीं कहते
अपने जन्म की तारीख नोटबंदी बताते हैं

कुछ लोग तो ऐसे मिले
जो दाभोलकर पानसरे कलबुर्गी गौरी लंकेश
कि हत्याओं की तारीखों से जोड़कर
बताते थे अपने जन्म की तारीखें 
और छूरे चमकाते थे

एक बड़े गर्व से कह रहा था
कि उसके जन्म की तारीख वही है
जिस दिन पहलू खान की हत्या की गई थी
एक की मुस्कुराहट बहुत घिनौनी थी
उसने उसी घिनौनी मुस्कुराहट के साथ कहा
वह जिस दिन पैदा हुआ था
उसी दिन आसिफा का बलात्कार किया गया था
और फिर हत्या

अगर कुछ कहना है तो यहाँ कहिए
जितनी ताकत है अंदर
सब बटोरकर चीखते हुए कहिए
हाथ-पांव सुन्न हो रहे हैं तब भी कहिए
बाहर देखिए दरवाजे पर खड़ा है पागलपन
जिसके अंदर आते ही
जिंदा रहने को तरस जाएंगे।

शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
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वे जहाँ से आ रहे थे
वहाँ उनके लिए कुछ नहीं बचा था
न कोई उम्मीद न कोई सपना
वे हारे हुए सैनिक की तरह लौट रहे थे
शहर उनके लिए गिद्ध हो चुका था
जो उसे नोच खाने के लिए
मंडरा रहा था 
चिमनियों के ऊपर

वे हजारों मील के सफर में थे
कभी उनके पांव के नीचे पहाड़ आते थे
कभी दबी आग 
कभी उनके साथ चलती आती थी 
लोहे की वीरान पटरियाँ
उनके पांव के नीचे पत्थर होते थे 
कांटे होते थे
गहरी खाइयां होती थीं
उनकी नींद में
थोड़ा बारुद रखा होता था

हमसफ़र रास्ते
जिनसे होकर कभी 
उनका जाना हुआ था
लौटते वक्त 
उनके खून के ताजे धब्बों से 
तर-बतर थे
हत्यारे हर कदम पर थे

हत्यारा जब भी हत्या करता था
पीछे उनकी कहानियाँ 
छोड़ जाता था
कभी टूटे चप्पल
कभी मैले-कुचैले कपड़े
इस बार पटरियों पर
रोटियाँ छूटी थीं
जिसके पास भूख की
अनगिनत कहानियाँ थीं

कुछ कहानियाँ उनका पीछा करती
गाँव तक चली आई थीं
अफसोस कि
गाँव वही नहीं रह गया था
वहाँ उनके पहुंचने से पहले
अफवाहें पहुंच गयी थीं
धमकियां पहुंच गयी थीं
अफसोस यह भी है
कि वे भी अब वही मजदूर नहीं रह गये थे
वे सस्ते मजदूर में बदलते जा रहे थे
वे बंधुवा मजदूर में बदलते जा रहे थे

यही समय है साथियों
कि आप रोक दें अपना पलायन
और खड़े हो जाएं डटकर सामने
हर उस तिकड़म के खिलाफ
इस उलटे बहते समय के खिलाफ
जो आपको सस्ता बना रहा है
बंधुवा बना रहा है

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि आपका नहीं होना 
रोक देगा देश का 
घूमता पहिया

क्या आप तक खबर नहीं पहुंची
कि बौखलाए हुए हैं पूंजीपति
और बौखलाई हुई हैं 
सरकारें भी
यह सोचकर कि उनसे ज्यादा जरूरी हैं 
आप देश के लिए
लोग यह समझने लगे हैं

वे मुसीबत बनकर टूट पड़े हैं 
आप पर 
अपनी जरूरतों के लिए
आपको निचोड़ने के लिए

जब वे खुलकर सामने आ गये हैं
तो आपकी ओर से देरी क्यों
आप भी टूट पड़ें
उनपर मुसीबत बनकर
अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए
हक और अरमान के लिए
श्रम के लुटेरों को
सबक सिखाने का
यही वक्त है
इंतजार क्यों

       यह कैसा झूठ है
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यह कैसा झूठ है
जिससे न्यू इंडिया गढ़ा जा रहा है
जहाँ जनता के पैसों को करदाताओं का पैसा 
कुछ इस तरह बताया जा रहा है मानो
वे कोई मुठ्ठी भर लोग हों
जो देश का खर्च उठाने के लिए 
सदाशयता में अपनी जेबें ढीली करते हों
जबकि सच्चाई यह है कि हल्कू भी देता है टैक्स

और वह सिर्फ टैक्स ही नहीं देता
श्रम भी करता है हाड़तोड़
वे जिसे जीडीपी कहते हैं
कभी उसके महक को देखो
हल्कू के पसीने की गंध मिलेगी 
यहां तक कि वे जिस कमाई पर टैक्स देते हैं
उसके पीछे भी हल्कू का ही श्रम लगा है
और तब यह कहना कि 
कर्जे से लदा अंबानी देश चलाने वाला करदाता है
और कड़ी मेहनत कर
देश का पेट भरने वाला हल्कू 
कर के उस रुपये पर मौज करनेवाली जनता
तो यह कपट और दुष्टता से भरे वक्तव्य 
के सिवा और कुछ नहीं है

हमारी मांग है
कि देश को देश की तरह समझा जाए
एनजीओ की तरह नहीं
करदाता को करदाता समझा जाए
फंडिंग एजेंसी नहीं
कर में प्राप्त धन को
अतिरिक्त कमाई करने के अपराध में
वसूला गया दंडित धन समझा जाए
अनुदान में दिया गया धन नहीं

हमारी यह भी मांग है
कि देश को देश ही समझा जाए 
कोई दुकान नहीं 
जहां वे हमसे कहें कि शिक्षा खरीदो
स्वास्थ्य खरीदो
न्याय खरीदो
खुशियां खरीदो सपने खरीदो उम्मीदें खरीदो
बिजली खरीदो पानी खरीदो
सुरक्षा खरीदो

जब देखो तब
वे लगातार कहते रहते हैं
खरीदो खरीदो खरीदो
लेकिन हम जानते हैं
मन में उनके चलता रहता है
बिको बिको बिको 
उन्हें लगता है कि यह
खरीदेगा नहीं तो बिकने का सोचेगा कैसे
दरअसल उनको बिक जाने वाले लोग चाहिए
अपनी मेहनत का वाजिब दाम मांगती 
मेहनतकश अवाम नहीं
उन्हें गुनहगारों की गिड़गिड़ाती भीड़ चाहिए
ताकि उसकी जिंदगी को 
वे जब चाहें चबा जाएं
जब चाहें उसके नुमाइंदे को
खरीदकर अपने गोदाम में डाल दें

यह कैसी सोच है आपकी सरकार
बेशर्मी की हद पार कर
आप बहुत आगे निकल गए हैं
यहाँ हम देश को सहेजे रखने में 
दांव पर लगा दिए हैं अपना सब कुछ
और आप पूरे देश को बरबाद कर
उसे भीख की जिंदगी जीने को बाध्य किए हुए हैं
क्या यह महज संयोग है कि
इसी दौरान भारत का एक आदमी
एशिया का सबसे धनी आदमी बन जाता है
और हमसे कहा जाता है कि
हम इसे अपनी उपलब्धि समझें
क्या आपको दिख नहीं रहा यहां हमारी जिंदगी
कीड़े-मकोड़ों से भी बदतर हो गई है
अन्न के दाने को तरसती पूरी आबादी
सड़कों पर रेंग रही है

दुश्मन हैं देश के तो
दुश्मन की तरह खुलकर सामने आइए
छिपकर वार करने जैसा घृणित काम मत कीजिए।

एकता नाहर की कविता : सपाट सीने वाली लड़कियां

कोई अधिक अथवा अधिकारिक जानकारी नहीं है मुझे । परन्तु यह केवल एक कविता ही है जो मुझे एकता नाहर का मुरीद बनाती है । पेशे से पत्रकार साथी एकता नाहर विद्रोही तेवर की हैं । अपनी उपस्थिति को सीधी सपाट बयानी में दर्ज़ करती हैं । हालिया प्रकाशित उनके काव्य संग्रह 'सूली पर समाज' की कविता साभार वेब पत्रिका 'अपना मोर्चा डाट काम' से ।
इस कविता को पोस्ट करने की वजह ‌और आशय साफ है समकालीन हिंदी कविता में यौनिकता के मार्फत आती अश्लीलता के बनिस्बत इस कविता से कवि कुछ यथार्थ को पकड़े ना कि अश्लील संवाद अथवा रेखाचित्र बनाएं । जहां एक उत्कृष्ट रचना अपनी रचनात्मकता में पूरी तरह समाजिक होती है। समाज में फैले वैमनस्य भावों को ठीक-ठीक रेखांकित करती है , सवाल खड़ा करती है । न्यूनतम के प्रति ईमानदार होती है । वही छद्म रचनाशीलता आपको पब्लिश करायेगा । आह ,वाह से नवाजेगा । सरोकारी नहीं बना पाएगा । यह समझने की जरूरत है । 

सपाट सीने वाली लड़कियां
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सपाट सीने वाली लड़कियां हर जगह से ठुकराई गयीं

 

रिश्ते की बात करने आए लड़के वालों ने 

जब नजर भर के उसे देखा तो फिर 

उसका कोई और हुनर मायने न रहा 

 

पुलिस की नौकरी में आवेदन करने से भी, 

लोक सेवा आयोग ने शर्तों में लिखा है

कि कितने इंच का होना चाहिए सीना

 

किसी चित्रकार ने अपने खूबसूरत चित्रों में

जगह नहीं दी उस स्त्री को

जिसके सीने पे उभार न था

चित्र बनाने के लिए सुडौल शरीर का बिम्ब सबसे आकर्षक था.

 

आए दिन देखा तिरस्कार 

सहेलियों की बातों में, पति की नज़रों में 

अंतरंग क्षणों में भी वो प्रेमी के सामने सहमी-सहमी सी रही

कभी खुद को ही आइने में देख हुई शर्मिंदा 

कभी पैडेड ब्रा में छिपाती रही खुद से खुद को ही 

 

उसके लिए छाती पर दुपट्टा डालना

भरे बदन वाली लड़की जितना ही जरूरी था 

ताकि वो बचा सके खुद को उस पर हंसती हुई लालची नज़रों से 

हां...भरे बदन का मतलब भरी हुई छातियों से ही है शायद. 

 

ये लोग नहीं कर सके उन्हें पूरा प्रेम 

लेकिन इन सबने चुटकुले बना कर हंसा उन पर खूब 

क्योंकि हम बड़े हुनर बाज हैं 

हर चीज को अपने चुटकुलों में जगह देते हैं.

Thursday, August 20, 2020

अश्लीलता और देहराग के सवाल पर अनिल पांडेय की टिप्पणी

Indra Rathore के यौनिकता सम्बन्धी एक पोस्ट पर दी गयी टिप्पणी कुछ इस तरह है-

ये खाए पिए अघाए हुए लोग हैं जिन्हें जन की व्यथा न दिखाई देकर योनि और गुदा दिखाई दे रहा है| रीतिकाल का विरोध क्यों किया जाता है? क्यों आदिकालीन साहित्य को जनता का साहित्य नहीं कहा जाता? यह उनसे पूछिए जो अश्लीलता को उचित ठहरा रहे हैं| खाली दिमाग ऐय्यास होता है| सम्पन्न कवि सुरा और सुंदरी खोजता है| अशोक वाजपेयी, शुभम श्री, मोनिका कुमार, अम्बर पाण्डेय जैसे कवियों के समय और भी कवि हैं जिनके यहाँ नंगई नहीं है| मैथुन और थ्रीसम जैसी परिकल्पना नहीं है| इसलिए नहीं कि वे भारतीय कला और शास्त्र से परिचित नहीं हैं, इसलिए कि उन्हें जन-जीवन का चित्रण करने उनकी यथा-व्यथा को अभिव्यक्ति करने से ही फुर्सत नहीं है| 

रीतिकाल के कवि जहाँ दरबारी ऐय्यासी की उपज थे वहीं इस काल के अधिकांश ऐसे कवि पोर्न मोवीज के उपज हैं| यह कार्य महज कविताओं में नहीं है| कहानी में इससे भी अधिक दुर्दशा है| गीताश्री जैसी कथाकार फेसबुक पर चैट करते करते स्त्री पात्र से पुरुष पात्र को सम्भोगरत दिखाती हैं, ऐसा रसात्मक वर्णन करती हैं कि पूछिए मत, यह मामूली बात नहीं है| साहित्यकार अपने जीवन के संचित अनुभवों से ही विषयों को विस्तार देता है| उचित हो कि व्यक्तिगत कुंठाओं को परोसने की अपेक्षा कुछ सामाजिक हित की बात की जाए| 

हो सकता है कि कुछ लोग खजुराहो आदि को उचित ठहराएं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कला और साहित्य में अंतर है| इस प्रकार के साहित्य को हिंदी साहित्य में लुगदी साहित्य कहा जाता है| सरस सालिस, मनोहर कहानियां, आदि पत्रिकाएँ यहीं सब कर रही हैं| वे भी करें कौन रोक रहा है लेकिन गम्भीर साहित्य की परिधि से उन्हें दूर ही रखा जाए| 

फ़िल्में बन रही हैं कुछ पारिवरिक बन रही हैं, कुछ सामाजिक बन रहीं हैं| कुछ केवल बालिगों के लिए बन रहीं हैं| वहीं कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो पोर्न मूवीज बना रहे हैं| पोर्न बना रहे हैं उन्हें समाज में दिखाना अनुचित माना गया है| तो ऐसे लोगों का विधिवत बहिष्कार किया जाए| चर्चा ही न किया जाए| मैं तो यही समझता हूँ|

Tuesday, August 18, 2020

पंकज चतुर्वेदी अटल प्रकरण

"अटल जी निश्चय ही प्रमुख तौर पर उत्तर भारतीय उच्च-मध्यवर्गीय भद्रलोक की इस मरीचिका के प्रतिनिधि राजपुरुष थे कि सरेआम फ़ासिस्ट हुए बग़ैर भी दक्षिणपंथी हुआ जा सकता है। मगर यह मरीचिका अब ध्वस्त हो चुकी है। परदा गिर गया है। दक्षिणपंथ का नग्न और बर्बर फ़ासीवादी संस्करण हमारे सामने है ।  

(पंकज को समझने के लिए उसकी कविता के भीतर तक जाना होगा ; मूर्खतापूर्ण असहमति से चीज़े दुरस्त नहीं की जा सकती )

"स्मृति में 
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फ़ासीवाद के 
सुघड़ शिल्पकार की 
स्मृति में 
बर्बर सब दुखी हैं 
संगठित और कृतज्ञ

जानते हैं कि शुरूआत में 
उसी नाटकीय 
शालीनता की बदौलत 
वे स्वीकार्य हुए 
और अब 
शीर्ष पर क़ाबिज़ हैं"

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...