Friday, March 26, 2021

विवेक चतुर्वेदी

'स्त्रियां घर लौटती हैं' विवेक चतुर्वेदी का पहला काव्य संग्रह है जो कि वाणी प्रकाशन न‌ई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है।संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए ज्ञात होता है कि विवेक की कविताई न सिर्फ जोड़-घटाव के प्रछन्न से मुक्त है बल्कि एक कवि की शुद्ध-चित्ति की सुदीर्घ बयानी भी है । आशय यह कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई  गुणा-भाग , लाभ-हानि के व्यापारिक हित वाली काव्य-साधना न होकर ;  बल्कि, जिसे मन ने माना , ह्रदय ने जिसकी थाह ली ;  वस्तुत: वह है ।
 यही बात ही उनकी कविताओं में काव्य-सत्य के रूप में आगे आई है  इन अर्थों में मुझे लगता है कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई समकालीन चेतना से भी पृथक , हमारे समय के यथार्थ से टकराकर टूटने के अनुभूत सच और उससे उपजी द्वंदात्मकता से , फलीभूत हुई मानवीय संवेदना की कविताएं , अधिक हैं । कहना न होगा इस दानवीय यंत्रणा से भरे इस समय में अच्छा होने-चाहने के तमाम उपाय जब निरर्थकता के कगार में है , और देखने-चाहने के जैसा कुछ होता नहीं दिखाई दे रहा ; तब इस कवि की स्वप्नजीवी मंगल-कामना आश्वस्ति प्रदान करने वाली लगती है ! परन्तु ऐसा सोचना या स्वीकारना भी एक अंतहीन स्थिति के प्राप्य में विकल्पहीनता को परोक्ष बल देता है और संघर्ष के बोध को बाधित करता है । अतः और अक्सर मैं इस विकल्पहीन दशा पर , दिशा की तलाश का हिमायती होता हूं । विपरीत स्थितियों से मुखालिफ़ होने का हिमायती होता हूं । जो विवेक की कविताओं के आस्वाद से भिन्न , एक अलग आस्वाद के मांग की भी हुई है । बावजूद , विवेक की कविताओं के प्रभाव से मैं मुक्त भी नहीं हो पाता हूं और इन चिंताओं से इत्तेफ़ाक रखता हूं क्योंकि विवेक चतुर्वेदी में आस्वाद को लेकर या उसकी मांग पर, धीरता और गंभीरता दोनों हैं ।

विवेक के इस संग्रह की पहली कविता  "स्त्रियाँ घर लौटती हैं" है ! जो अपने शीर्षक के भाववादी रूझान के कारण विमर्श की स्थिति में घिरते-फंसते दिख रही है । यह वाद-विवाद और संवाद की स्थिति को पैदा करती , प्रतीत हो रही है । तो दरअसल विवेक के इस चुनाव में ज्ञान पीछे है और संवेदना आगे । यानी विवेक "संवेदनात्मक ज्ञान" के राह चल प्राप्त हुए श्रम सौंदर्य को प्राथमिक बनाते हैं । जबकि ज्ञानात्मक संवेदन पूरी तरह इसका उलट तब हो जाता है , जब स्त्रीवादी चेतना और रुझान यह कहते हुए दिखाई देंगे और सवाल भी करेंगे कि स्त्रियाँ ही क्यों घर लौटती हैं ? क्या घर सिर्फ पुरूष का ही है ! कि सिर्फ स्त्री ही लौटती है !! या फिर यह स्त्री कहीं भाग गई होती हैं !!! दोनों अपनी जगह हैं । संवेदना जहाँ पहले कथ्य रुप में आएगी वहाँ भावुक हो आएगी । अकथ पीड़ा को दर्ज करती आएगी । जबकि ज्ञान मार्ग से आती संवेदना भावुकता को दरकिनार कर तर्क और स्थापनाओं से चीज़ों को काटने का यथासंभव प्रयास करेगी , और काटेगा ! बावजूद इन सबके महत्वपूर्ण यह है कि कवि की कविता क्या कह रही हैं ?

"स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
आकुल वेग से उडती हुई
काली चिड़ियों की पांत की तरह" 

मतलब तय है कि यह सांझ का समय है , गोधूलि का समय है । तमाम व्यवहारिक प्रक्रियाओं के जीवों के लौटने का समय है । यहां , सामान्य और क्रियात्मक अर्थों में 'लौटना' यानी वापसी है और दृश्य ग्रमीण कम महानगरीय अधिक है ।  श्रम-साध्य कामकाजी स्त्रियाँ अपने सफल कार्य निष्पादन के बाद जब, कल-कारखानों से झुंड में निकलती हैं वे और घर को पहुंचती हैं तो उनके पहुँचने में जो असहज और असमान्य बातें हैं वह विवेक चतुर्वेदी की कविताई चेतना को न सिर्फ संवेदित करता है झकझोरता भी है कि आखिर एक स्त्री के रोज प्रति-रोज होने के अर्थ में यह सब शामिल हैं ? तो मैं समझता हूँ कि विवेक इस कविता में कोई स्थायी लकीर की बात नहीं कर रहे होते कि कोई अतिरिक्त महिमामंडन नहीं कर रहे होते हैं ; अपितु वास्तविक परिस्थितियों 
 को बयां करते हैं , जो किन्हीं अर्थों में स्त्री को पारंपरिकता के खोह में बनाए रख , पैठ जमाए बैठी है । चूंकि स्त्री के जीवन में दायित्व से ज्यादा, अपेक्षा की बहुलता भरी है । जो बहुत अप्रत्याशित और विपरीत परिस्थिति को पैदा करने वाले होते हैं । परन्तु इन मायनों में विवेक की स्त्री निसंदेह घर को पहुंचती सेल्फ आईडेंटिटीफाईड है । संघर्ष करती संवेदनशील स्त्री है । जो काम के बाद घर में किस तरह उतरती है ? कैसे आती है ?? यहाँ यह देखा जाए 

"स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
वह एक साथ आंगन से
चौके तक लौट आती है"

लौट आती है

"स्त्री बच्चे की भूख में'
'रोटी बन कर लौटती है 
स्त्री लौटती है 
दाल भात में... टूटी खाट में 
जतन से लगाई मसहरी में 
वो आंगन की तुलसी 
और कनेर में लौट आती है "

विवेक की कविता किसी ठस्स बौद्धिकता की मांग को पूरी करने के लिए बांडेड न होकर संवेदना से उपजी कविता है । इस कविता में स्त्री का लौटना कोई बांडेशन की तरह नहीं है और न  पूजा की ही तरह है ! यहाँ तो वह "अबला" भी नहीं , अपितु कर्मठ स्त्री है । अत: कविता उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित करने का उपक्रम  जान पड़ता है । एक रचना की पूर्णता के आग्रह में सिर्फ नकार ही नकार उचित नहीं है स्वीकार भी किए जाने चाहिए । हमें यह नहीं भूलना चाहिए स्त्री जब भी लौटेगी अपने घर लौटेगी ! पुरुष जब भी लौटेंगे अपने घर लौटेंगे ! और यदि वह घर उसके अपने न हो तो यह लौटना संभव ही नहीं ही है !!! अत: विवेक की कविता को जरा विवेक के चश्मे में ही उतर कर देखा जाना लाजिम होगा । चूंकि विवेक की 

"स्त्री है... जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती 
पत्नी, बहन मां या बेटी की तरह लौटती है"

किसी दबाव अथवा बांडेड में नहीं बल्कि सेल्फ रेस्पेक्ट और रेसपांसिबल , हो लौटती है उनकी स्त्री वह

"स्त्री है...जो बस रात की नींद में नहीं लौट सकती
उसे सुबह की चिंताओं में भी लौटना होता है"

 यह विवेक की पीड़ा और मर्म को समझने सहायक होगा ! 

"स्त्री चिड़िया सी लौटती है... 
और थोड़ी मिट्टी 
रोज पंजों में भर लाती है
छोड़ देती है आंगन में" 

विवेक की यह स्त्री यकीनन बांड की जगह दायित्व बोध की प्राथमिकी में , स्नेह , प्रेम और ममत्व से भरी छलकती स्त्री है ।
विवेक की कविता आवश्यक कला मांगों के अनुरूप जरूरी आंशिक फैंटेसी का सहारा भी लेती है मसलन कि दृष्ट्या कथनीयता को लें , देखें

"घर भी एक बच्चा है स्त्री के लिए 
जो रोज थोड़ा और बड़ा होता है"

अतः विवेक की कविता का लोक-राग और रंग में जब

"लौटती है स्त्री...
तो घास आंगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी
कबेलू छप्पर के रंग
हो जाते हैं जरा और लाल"

इतना कुछ होने के भीतर या कि ; उस सबमें असल स्थापत्य तो यह है

"दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
महज स्त्री का घर लौटना नहीं है 
धरती का अपनी धुरी पर
लौटना है"

विवेक की कविताएं यद्यपि 'लाल' नहीं हैं परन्तु लाल रंग का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में उनकी चार-पांच कविताओं में दिखाई दिए । वे उन कविताओं में लाल रंग , लाल मुरूम लाल रूमाल लाल चादर , लाल कालीन , जैसे प्रतीक बिम्बों का प्रयोग करते हैं और कहते हैं कि

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा...
लाल मुरम के रास्ते दूर जाती 
कविता के भीतर की स्त्री को"

 तो इसके माने क्या है ? अब सवाल तो बनेगा ही ! कि लाल मुरूम कविता के भीतर की स्त्री को मार रहा है ? या फिर कविता के भीतर स्थापित कर दी गई 'ढांचागत स्त्री' के मुक्ति की कामना के साथ उसे पुनर्जीवन देने एवं उसमें प्राणवायु भरने का उपक्रम कर रही है ।  विवेक चतुर्वेदी पर मुझे प्रबल विश्वास है कि वे नियतिवादी नहीं हैं , यथास्थितिवाद को पोषित करने वाले कवि नहीं हैं । अपितु प्रगतिशील चेतना के संवाहक हैं और लाल मुरूम कहीं न कहीं इसका ही एक बड़ा पर्याय है । अन्यथा वे यह नहीं ही कह पाते

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा..." 

उनके इस कथन का आशय में , यथासंभव इधर की स्त्री स्वातंत्र्य बोध की वायवीयता का अस्वीकार जितना है उतना ही उसके निरपेक्ष स्त्री होने के मान का सम्मान भी है । एक स्त्री के दैवीय रुप दर्पण जो कि स्थापित किया जा चुका है उसमें , उसके तलहटी में एक स्त्री का विच्छेदन भंजन है । विवेक चतुर्वेदी की इस कविता की मानें तो एक स्त्री को वे उनके तरलाई में , तरुणाई में और खुरदुरेपन में देखने का एक स्वायत्त नजरिया है । यहां सबसे अधिक जरूरी और उल्लेखनीय बात यह है कि विवेक की स्त्री न देवी है न 'दानव' ।  बल्कि एक जीता-जागता मानव है ।

विवेक के इस संग्रह की अधिकांश कविताओं की केन्द्रीयता में स्त्री ही है । वह स्त्री मां है , बहन है , बेटी है , कामकाजी मजदूरनी है , जीवन रथ को खींच रही एक टायपिस्ट है । दृष्ट्या कविता में मां का वह रूप-सौन्दर्य निखर आता है जिसके हाथ विभेद की गुंजाइश नहीं है , त्याग ऐसा है कि अपने भी हिस्से को बांट प्रसन्न होती जीवनदायिनी है ।

"मां सिंदूरी आम की
फांके काटती
हम देखते रहते
कोई फांक छोटी तो नहीं
पर न जाने कैसे
बिल्कुल बराबर काटती मां
हमें बांट देती"

"खुद गुही लेती"

 कहना न होगा कि विवेक की यह कविता स्मृतिजीवी है । उन स्मृतियों को अपने आज में देख-झांक रही है । परन्तु अतीतजीवी नहीं ; यानी वह नहीं है जो नामवर सिंह ने इस संदर्भ में एक सुंदर बात बहुत पहले कही , कि 

"अतीतजीवी होना मनुष्य को अकर्मण्यता की ओर ले जाता है"

विवेक की कविता का स्त्री यद्यपि अपने काल की सीमाओं से आगे बढ़ , 'अपने पुरुषार्थ' में घर परिवार के सुख-दुख , हर्ष-विषाद से जूझने में वह कहीं साहसी दिखी ,कि स्वाभिमानी हुई किन्तु क‌ई मायनों में वह , अब भी बलात् छली गई है । यह भी विवेक की कविता या कि चिंता में पूरे मानवीय बोध के अधिकार चेतस रूप में है । मसलन कि 

सुनो ! इस सदी में
कितने-कितने पुरूषों ने
देखी है लाल मुरुम बिछने की राह।
ये जो स्त्री सो रही है तुम्हारे बगल में
तुम्हारे तप्त चुम्बन से घुट रही है जिसकी सांस
क्या लाए थे इसे तुम
लाल मुरुम की सड़क से
नहीं.... तुम लाए थे इसे
धन, प्रतिष्ठा ,पद , बल या छल से

विवेक की कविता है तो बड़ी ही सीधी सादी , अभिधात्मक ही है । सीधी समझ की है । परन्तु कहीं कहीं ऐसा भी आभास होता है कि वह सिर्फ उसी तरह का नहीं है जैसा कि हमारी आंखें उसे देख रही है । अतः हमारे समय की कुटिल चालों और कुदृष्टि से बने बहुस्तरीय आंतरिक फांकों को अभिव्यक्त करने उनकी कविता व्यंजना का भी हाथ थामती है , उन गूढ़ भाव रहस्य , प्राग इतिहास की गुफ़ा तक की यात्रा करती है जिसमें 

"लड़की दौड़ती है तो थोड़ी तेज हो जाती है धरती की चाल"

या कि

"औरत टांक रही है बच्चे के अंगरखे पर सुनहरा गोट
और गर्म हो चली है सूरज की आग"

इस तरह से देखें तो विवेक की कविता में समानांतर रेखाओं के इतर अनेक आड़ी-तिरछी एक-दूसरे को काटती तिर्यक रेखाएं भी है , जो चीज़ों की सरल समझ 
के आगे की हैं ।
नैतिकता, स्वतांत्र्यबोध , अभिव्यक्ति के अधिकार के बड़ी बातों के बाहर के सच में छिपा सामंती स्वरूपों को कथात्मक और वाचनीयता में चाल चरित्र छद्म की बेहतर शिनाख्तगी की गई है वह भी बौद्धिक जगत को केन्द्र में रखकर । अच्छी और पठनीय कविता है ।
"दुनिया के लिए जरूरी है" शीर्षक कविता वस्तुत: भौतिक लिप्साओं और स्वार्थ के दलदल से ग्रसित मनुष्य का , मनुष्य और प्रकृति के विरोध में किए गए कारनामों से उत्पन्न हो रही रिक्तियों की चिंता  तथा उन प्रवृत्तियों का नकार है जो परोक्ष-अपरोक्ष मानव व प्रकृति विरोधी है । विवेक कविता के इस पहले स्टैंजे में इसकी भूमिका तय करते हैं कि जरुरी क्या है ? जब हमारे ही हाथों हत्या हमने ही मुकर्रर की हो
 कि बहुत-सी ख़ूबसूरत बातें मिटती जा रही हैं दुनिया से । मसलन

जैसे गौरैया
जैसे कुनकुनी धूप
जैसे बचपन
जैसे तारे
और जैसे एक आदमी , जो केवल आदमियत की ज़ायदाद के साथ जिंदा है" 

के जैसे अनगिन चिंताओं के मध्य विवेक कविता के इस दूसरे अन्य स्टैंजे में  क्या कह रहे हैं ध्यातव्य है और अनुकरणीय भी

"सुनों... दुनिया के लिए ज़रूरी नहीं है मिसाइल
ज़रूरी नहीं है अंतरिक्ष की खूंटी पर
अपने अहम् को टांगने भेजे ग‌ए उपग्रह
जरुरी नहीं है दानवों सी चींख़ती मशीनें
हां... क्यों ज़रूरी है मंगल पर पानी की खोज ? 

कविता में आए सवाल और तथ्य विकास के माडल का विरोध करता है न कि प्रगति के पथ का ।

 'स्त्रियां घर लौटती हैं और अन्य कविताएं' विवेक के इस संग्रह की ख़ासीयत ही यही है कि उन्होंने स्त्री के परस्पर  घर , परिवार , समाज उसके ताने-बाने में छिपी लिप्साओं , छद्मों का यथा तथ्यात्मक बहुआयामी चित्रण पूरी जिम्मेदारी से किया है जो इस संग्रह में 'मां' 'रावण'  'औरत की बात' 'टाइपिस्ट' 'स्त्री विमर्श'  'शोरूम में काम करने वाली लड़की' 'पेंसिल की तरह बरती गईं घरेलू स्त्रियां'  व 'डोरी पर घर' 'पृथ्वी के साथ भी' के विशाल कैनवास पर चहलकदमी करता मुहर लगाती है ।
'दुनिया के लिए ज़रूरी है' कि तरह जरूरी कविताओं की श्रृंखला में 'पिता' 'पेड़ की मृत्यु' 'तुम आये बाबा' 'वर्गवादी'  'गोधूलि' 'लाल रूमाल'  'सुबह होगी...''पसीने से भीगी कविता' मेरे बचपन की जेल' 'पिता की याद'कविताएं अपनी मार्मिकता में अनूठी कविताएं हैं ।  कुल मिलाकर विवेक के इस संग्रह को हिंदी के स्त्रीवादी कविताओं  और मुहावरों के बनिस्बत समग्र स्त्रीकाल दर्शन के रूप में भी देखा जा सकता है । 
                     

कविता- संग्रह- स्त्रियाँ घर लौटती हैं
कवि- विवेक चतुर्वेदी
वाणी प्रकाशन
प्रथम संस्करण-2020
मूल्य-रु 199

  

लोक चेतना

लोक की समझ या कि चेतना में इलीट कभी भी शामिल नहीं है । इसलिए वह हमेशा 'दूसरे तरह' का ही प्रतिद्वंदी रहा । एकदम साफ़ और खुला दिखता हुआ । परन्तु उनसे भिन्न और अमूर्त रूप में असल प्रतिद्वंदी तो वही ही हैं जो लोक के साथ खड़े होने का , दिखने का बेहतर अभिनय कर रहे होते हैं और व्यवस्था के विद्रोही दिखते हुए , व्यवस्था से सुविधाएं प्राप्त करने रत्तीभर संकोच नहीं करते । वे शत्-प्रतिशत सामन्ती मान्यताओं , अवधारणाओं और विश्वासों के पैरोकार हो लोक की प्रथा तथा चेतना को खंडित कर रहे होते हैं । साथी हमें सावधान रहना होगा ।  हमारे यहां लोक के तात्पर्य को जहां तक मैं समझता हूं Vijendra Kriti Oar  ने बहुत ठीक और सारगर्भित ढंग से क्रमबद्ध समझाया है । उनके यहां लोक ग्राम्य जीवन खेतिहर किसान, मजूर तक ही सीमित नहीं है । उससे भी बहुत आगे जाते हुए शहरी निम्न मध्यवर्गीय लोग भी , लोक की श्रेणी में हैं जो उत्पादक के नियोजन जैसे अनेक असंगठित क्षेत्र को अपने  साध्य-असाध्य श्रम से बल प्रदान करते हैं । यह भी , यही पर ही सीमित नहीं है । अपितु स्वनियोजन से जुड़े वे लोग भी शामिल हैं जो रेहड़ी , ठेली ,रिक्शे से भी अपना जीवन गुजर- बसर करते जीवन में सादगी और मनुष्यता को विस्तार देते हैं ।

जसिंता केरकेट्टा

जसिंता केरकेट्टा झारखंड से आती हैं । सुस्पष्ट दृष्टि संपन्न कवि हैं । आदिवासी समाज और उनके दुःख दर्द की व्यापक समझ और चेतना के परस्पर ही वे राष्ट्रीय सामाजिक , आर्थिक , वैश्विक चेतना से भी लैस हैं । समकालीन कवियों की जमात में उनकी उपस्थिति इन अर्थों में ध्यान आकृष्ट कराता है कि वे सतत राजनीति के छद्म चरित्र को अधिक से अधिक केन्द्रीय बनाए हुए हैं । साथी पेशे से पत्रकार हैं । आदिवासी इलाकों में संघर्षरत लोगों के साथ निरंतर उनकी आवाज बने हुए हैं । अतः उनकी  कविताओं में उनके बुनियादी सवाल व संवेदना के समानांतर उनका दर्द भी अधिलिखित रुप में उपस्थित है ।
 

कविता 'राष्ट्रवाद' केवल यह एक कविता ही मेरे उल्लेखित तथ्य को पुष्ट बनाने में एक पूरी और समग्र कविता है कहना ग़लत न होगा । जसिंता कहती हैं

'जब मेरा पड़ोसी
मेरे ख़ून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया'

कविता विस्तार के आधार पर छोटी कविता है , पर बड़े कथ्य और उन्नत शिल्प के कारण अपनी व्यापकता में देश-काल , उसके समाजिक परिदृश्य का सफल रचाव करती है । 

देश के रचनात्मक सामाजिक परिवेश में भला वे कौन लोग हैं जसिंता सवाल करती हैं

'साब ! जहां कुछ भी नहीं पहुंचता
वहां धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुंचता है'

जबकि आवारा पूंजी और 
व्यवस्था पहाड़ के लोगों को बदहाल छोड़ जरुरी और बुनियादी सुविधाओं से दूरी बनाए खनिज संपदाओं के दोहन को ही असली उद्देश्य मानते हैं । स्वार्थ और विष से भरे समाजिक यथार्थ के द्वंदात्मकता में जसिंता का यह कहना गौर ए तलब और दृष्टव्य है

'पहाड़ पर लोग पहाड़ का पानी पीते हैं
सरकार का पानी वहाँ तक नहीं पहुँचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुँचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंँचता
बिजली नहीं पहुँचती इंटरनेट नहीं पहुँचता
वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता'

पहाड़ और पहाड़ के लोगों का अंतर्संबंध के संदर्भ में जब तक आपके पास व्यवहारिक संवेदना नहीं होगा आप इन अंतर्संबंधों की बारीकियों से अर्धज्ञानी ही होंगे और ठीक उतना ही ख़तरनाक जितना एक हाफ 'झोलाछाप' डांक्टर होता है । उनके अंतर्संबंधों की परख सूंघकर जंगल की गंध जो बता सकते हैं , जो नाड़ी छूकर उसकी देह का ताप नाप सकते हैं , उसके चेहरे की रंगत देख उसका मिजाज बता सकते हैं ! असल में , साब ! आप कुछ नहीं जानते ;

'वे पहाड़ के सीने में दिल की तरह तरह बस्ते हैं
जिनके धड़कने से पहाड़ बचे रहते हैं'

आप खालिस लुटेरों की तरह पहाड़ में आते जाते लोग हैं साब ! वाकई आप कुछ नहीं समझते ; यह बखूबी समझते हैं पहाड़ के पहरेदार ! जो कर रहे हैं आपको खबरदार !! 

जसिंता 'पहाड़ के पहरेदार' कविता में व्यवस्था और उनके नुमाइंदों की असलियत को रखते हुए बताती हैं

'पर एक दिन शहर के चौकीदार
अपने मालिक का इशारा पाकर
पहाड़ पर आते हैं
और कई दिनों से भूखे खोजी कुत्ते की तरह
पहाड़ पर अकेली घूमती स्त्री को देख लार टपकाते हैं
स्त्रियों को मांस का लोंधा समझने को अभिशप्त
ये जंगल की स्त्रियों के मांस पर टूट पड़ते हैं
और भोर उठकर पेड़ से शलप उतारने जा रहे
उनके प्रेमियों को गोली मार देते हैं
ये शहर लौटकर गर्व से चिल्लाते हैं
देखो, जंगल से हम माओवादी मारकर आते हैं
 
ये पहाड़ पर अपने तमगे की तलाश में भटकते हैं
और आदमियों का शिकार कर लौटने के बाद
उनकी लाश बिछाकर, शहर से सम्मान लेते हैं
ये कौन हैं?
ये उस जमात के लोग हैं
जो जानवरों का नाम लेकर सदियों से
आदमियों को मारने के अभ्यस्त हैं
काग़ज़ के टुकड़ों के आगे जो
मालिकों के इशारे पर जीवन भर नाचते हैं
और देह के भीतर अपनी ही आत्मा का मुंह
कस कर पट्टियों से बांधते हैं'

बर्बर और अमानवीय व्यवस्था ने पूंजी के समानांतर दहशत गर्दी को बकौल अंजाम पहुंचाने कोई कसर नहीं छोड़ी । उसने वहीं किया , जो पूंजी ने चाहा । जंगल खाली कराए ,जलाए जंगल और मानवीयता को शर्मशार किया । उसने देश के विरुद्ध सेना का प्रयोग कर जता दिया कि उनकी प्राथमिकी में पूंजी है । 

युद्ध का दौर खत्म हो गया
अब सीमा की सेना का रुख उधर है
मेरा स्कूल-कालेज , गांव-घर , जंगल-पहाड़
जिधर है 

(क्रमश: लिखा जाना है) पर हाल फिलहाल पढ़िए जसिंता केरकेट्टा की वे पांच कविताएं जिससे जसिंता को लेकर एक नजरिया बने ।  सस्नेह जसिंता । 
साभार: जानकीपुल

 
राष्ट्रवाद
………..

जब मेरा पड़ोसी
मेरे ख़ून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया ।

 
जहाँ कुछ नहीं पहुंचता
……………………………

 
पहाड़ पर लोग पहाड़ का पानी पीते हैं
सरकार का पानी वहाँ तक नहीं पहुँचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुँचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंँचता
बिजली नहीं पहुँचती इंटरनेट नहीं पहुँचता
वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
 
साब! जहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
वहाँ धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुँचता है?
 

 
पहाड़ और पहरेदार
……………………............

पहाड़ के पहरेदार
जन्म से पहाड़ को जानते हैं
सूंघ कर जंगल की गंध बताते हैं
नाड़ी छूकर उसकी देह का ताप
और उसके चेहरे के बदलते रंग बताते हैं
पहाड़ों, पेड़ों, झरनों यहां तक कि
मिट्टी के नीचे दबे कंद मुल के नाम जानते हैं
वे पहाड़ के सीने में दिल की तरह बसते हैं
जिनके धड़कने से पहाड़ बचे रहते हैं
 
पहाड़ों की उम्र क्या है
पूछने पर वे क्या कहते हैं?
उनका प्यार ही पहाड़ की उम्र है
यह प्यार उनके पुरखों के पुरखों के पुरखों से
शुरू होता है
पहाड़ की नसों में पीढ़ी दर पीढ़ी
उनका ही प्यार खून की तरह बहता है
इसलिए पहाड़ सदियों तक जिंदा रहता है
 
पर एक दिन शहर के चौकीदार
अपने मालिक का इशारा पाकर
पहाड़ पर आते हैं
और कई दिनों से भूखे खोजी कुत्ते की तरह
पहाड़ पर अकेली घूमती स्त्री को देख लार टपकाते हैं
स्त्रियों को मांस का लोंधा समझने को अभिशप्त
ये जंगल की स्त्रियों के मांस पर टूट पड़ते हैं
और भोर उठकर पेड़ से शलप उतारने जा रहे
उनके प्रेमियों को गोली मार देते हैं
ये शहर लौटकर गर्व से चिल्लाते हैं
देखो, जंगल से हम माओवादी मारकर आते हैं
 
ये पहाड़ पर अपने तमगे की तलाश में भटकते हैं
और आदमियों का शिकार कर लौटने के बाद
उनकी लाश बिछाकर, शहर से सम्मान लेते हैं
ये कौन हैं?
ये उस जमात के लोग हैं
जो जानवरों का नाम लेकर सदियों से
आदमियों को मारने के अभ्यस्त हैं
काग़ज़ के टुकड़ों के आगे जो
मालिकों के इशारे पर जीवन भर नाचते हैं
और देह के भीतर अपनी ही आत्मा का मुंह
कस कर पट्टियों से बांधते हैं
 
पहाड़ जानते हैं
जीवित आत्माओं का संघर्ष
आत्मा विहीन ऐसी लाशों से है
जिन्होंने खुद को अनवरत बेचा है
जीवन को जुगाड़ ही देखा है
नौकरी करते हुए गुलामी कमाई है
और ऊपर से आदेश आते ही हमेशा
पहाड़ की समृद्ध संस्कृति पर गोली चलाई है
 
ये पहाड़ के कभी नहीं थे
न कभी हो सकेंगे
ऐसे लोगों से पहाड़ के लोग लड़ते हैं
सिर्फ़ इसलिए
कि वे पहाड़ से प्यार करते हैं 

 

 
सेना का रुख़ किधर है ?
………………………….........

युद्ध का दौर खत्म हो गया
अब सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है
 
कौन साध रहा है अब
चिड़ियों की आंख पर निशाना ?
इस समय ख़तरनाक है सवाल करना
और जो हो रहा है उस पर बुरा मान जाना
क्योंकि संगीनों का पहला काम है
सवाल करती जीभ पर निशाना लगाना
 
खत्म हो रही है उनकी
बातें करने और सुनने की परंपरा
अब सेना की दक्षता का मतलब है
गांव और जंगल पर गोलियां चलाना
और सवाल पूछते विद्यार्थियों पर लाठियां बरसाना
 
यह दूसरे तरीके का युद्ध है
जहां संभव है
गांव में बहुतों के भूखे रह जाने का
किसानों के आत्महत्या कर लेने का
और शहर में आधे लोगों का
बहुत खाते हुए , तोंद बढ़ाते हुए
अपनी देह का भार संभालने में असमर्थ
एक दिन नीचे गिर जाने का
और अपनी ही देह तले दबकर मर जाने का
 
किसी युद्ध में बम के फटने से
यह शहर धुआँ-धुआँ नहीं है
यह तो विकास करते हुए
मंगल ग्रह हो जाने की कहानी है
इस विकास में न बच रहे जंगल -पहाड़
न मिल रही सांस लेने को साफ़ हवा
और लोग ढूंढ रहे कि कहां साफ़ पानी है
 
कोई युद्ध न हो तब भी सेना तो रहेगी
आख़िर वह क्या करेगी ?
वह कैंपों के लिए जंगल खाली कराएगी
जानवरों की सुरक्षा के लिए
गांव को खदेड़ कर शहर ले जाएगी
और शहर में सवाल पूछते
गांव के बच्चों पर गोली चलाएगी
 
आख़िर क्यों सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है?

 
बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
…………….………………………………

हिटलर की मौत के बाद भी लंबे समय तक
कई घरों में छिड़ी रही एक लंबी लड़ाई
जहां चुप रहने और विरोध न करने के लिए
कई बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
वे माफ़ न कर सके उन पड़ोसियों को भी
जो बंद रहे अपने घरों में चुप
दूसरों के लिए सड़कों पर निकल न सके
 
एक दिन युवा सड़कों पर उतरे
अपने पिता और पड़ोसियों के
चुप रहने, प्रतिरोध न कर पाने का प्रायश्चित करने
जिनके लिए उनके पिता न लड़ सके
विश्वविद्यालयों से उनके बच्चे बाहर निकले
मारे गए लोगों को उनका हक दिलाने
 
और फिर एक दिन
जहां ढह गया था युद्ध में
हिटलर का पुराना दफ़्तर
युवाओं की मांगों ने ठीक उसी जगह
मारे गए हर आदमी के नाम का
पत्थर की सिल्लियों वाला विशाल स्मारक बनवाया
 
कुछ लोगों ने मिलकर हर उस घर को ढूंढा
जहां मारे गए लोगों में से कभी कोई रहता था
फिर ऐसे हर घर के सामने
उनके नाम का लोहे का प्लेट लगवाया
और फिर से उनकी यादों को जिंदा करवाया
 
एक आदमी जिसे जर्मनी ने पहले प्यार किया
फिर उसी आदमी से नफरत भी किया
जिसने देश को पूरी तरह गर्त में पहुंचाया
आज ठीक वैसा ही एक आदमी
जगह और समय बदलकर
एक सी घटनाओं के साथ फिर नजर आया
 
इससे पहले कि वह आदमी
फिर से किसी देश को गर्त में ले जाए
इससे पहले कि पीढ़ियों को सदियों तक
उसके पापों का प्रायश्चित करना पड़े
इससे पहले कि बच्चे अपने पिता
और पड़ोसियों को
चुप रहने और प्रतिरोध न करने के लिए
कभी माफ़ न कर सके
उस आदमी में बसे हिटलर को
पूरी ताकत के साथ
उसकी असली जगह दिखा देनी चाहिए ।
 

Friday, January 1, 2021

सुलेमान हैदर

पाकिस्तानी शायर सुलेमान हैदर की इस कविता से एक बात मोटे तौर पर साफ़ हो जाती है कि विश्व के तमाम सत्तासीन लोगों का चरित्र एक- सा है । वे असहमति के विचारों को उतना ही स्वीकार पाते हैं जितना कि उनकी कुर्सी के लिए बर्दाश्त है ।  अन्यथा आप ईरान में रहें कि अमेरिका में , पाकिस्तान में रहें कि भारत में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे । अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में महारत ये लोग बेसिकली मनुष्य विरोधी विचारों से ओतप्रोत हैं । ये कभी धर्म के नाम , तो कभी जाति के नाम , या कि भाषा अथवा क्षेत्र के नाम हंगामा मचाए ही रहेंगे । अब लो न ये मनुष्य विरोधी लोगों का जत्था ही को लो देखो किसी सम्प्रदाय विशेष के लोगों को लक्षित कर उन्हें काफ़िर करार देने तुल गए हैं । जल जंगल और जमीन के लिए संघर्षरत लोगों को उनके जमीन के मालिकाना हक से , कैसे उन्हें वंचित कर राहत कैंपों में बंधक बना लेने को ठाने पूंजी पोषित ये कबरबिज्जू नित नए - नए प्रयोगों से देश को हलाकान किए फिर रहे हैं । इस कड़ी में ये संविधान को ताक पर रख क्रूरतम से क्रूरतम और पेचीदा कानून को अमलीजामा पहना रहे हैं । जो कि सर्वथा निंदनीय कृत्य है । विश्व का ऐसा कोई ऐसा भू-भाग नहीं बचा है जहां इस प्रजाति ने अपनी दानवी प्रवृत्ति से नरसंहार तक को जायज़ नहीं माना । परन्तु प्रतिरोध का यह स्वर हमेशा इनके सामने खड़ा है और दो-दो हाथ करने नहीं चूका । सलमान हैदर इसी असहमति का नाम है । जो काफ़िर क्या है ? कैसा है को इस कविता में अभिव्यक्त कर रहे हैं  पढ़िए उनकी इस अद्भुत कविता

'मैं भी काफिर तू भी काफिर,
मैं भी काफिर, तू भी काफिर
फूलों की खुशबू भी काफिर, शब्दों का जादू भी काफिर
यह भी काफिर, वह भी काफिर, 
फैज और मंटो भी काफिर
नूरजहां का गाना काफिर, 
मैकडोनाल्ड का खाना काफिर
बर्गर काफिर, कोक भी काफिर, 
हंसी गुनाह और जोक भी काफिर
तबला काफिर, ढोल भी काफिर,
प्यार भरे दो बोल भी काफिर
सुर भी काफिर, ताल भी काफिर, 
भांगड़ा, नाच, धमाल भी काफिर
दादरा, ठुमरी, भैरवी काफिर, 
काफी और खयाल भी काफिर
वारिस शाह की हीर भी काफिर,
चाहत की जंजीर भी काफिर
जिंदा-मुर्दा पीर भी काफिर, 
भेंट नियाज की खीर भी काफिर
बेटे का बस्ता भी काफिर, बेटी की गुड़िया भी काफिर
हंसना-रोना कुफ्र का सौदा, 
गम काफिर, खुशियां भी काफिर
जींस और गिटार भी काफिर, 
टखनों से ऊंची बांधो तो अपनी यह सलवार भी काफिर, फन काफिर फनकार भी काफिर
जो मेरे फतवे ना छापें, वो सारे अखबार भी काफिर
यूनिवर्सिटी के अंदर काफिर, 
डार्विन का बंदर भी काफिर
फ्रायड पढ़ने वाले काफिर, 
मार्क्स के सब मतवाले काफिर
मेले-ठेले कुफ्र का धंधा, गाने-बाजे सारे फंदा
मंदिर में तो बुत होता है, मस्जिद का भी हाल बुरा है
कुछ मस्जिद के बाहर काफिर, 
कुछ मस्जिद के अंदर काफिर
मुस्लिम मुल्क में मुस्लिम भी काफिर, 
बाकी सब तो हैं ही काफिर
काफिर-काफिर मैं भी काफिर, 
काफिर-काफिर तू भी काफिर,
काफिर काफिर दोनों काफिर, 
काफिर दोनों जहाँ ही काफिर।

Monday, December 28, 2020

परसाई : अरस्तू की चिठ्ठी १

हरिशंकर परसाईं हिंदी व्यंग विधा में पितृ पुरूष की तरह ख्याति अर्जित किए  । उनका हर-एक , कहा-लिखा समय आने पर शिलालेख की तरह चमचमाती हुई दिखी । अब इस 'परिवर्तन' के लिए लिखा उनका अरस्तू की चिट्ठी - १ को ही देखिए आज के राजनीतिक सत्ता तथा उसके छद्म आचरण का यह कितना जीवंत रुप है । सत्ता की शक्ति पर काबिज होने की मंशा का भला इससे बढ़िया उदाहरण क्या होगा ? कितना सटीक और नंगा यथार्थ प्रस्तुत करते हैं हरिशंकर परसाई कि मुरीद हुए बगैर नहीं रहा जाता ‌।

__________________________________

तुम्हारे प्रधानमन्त्री में यह अदा है। इसी अदा पर तुम्हारे यहाँ की सरकार टिकी है, जिस दिन यह अदा नहीं है या अदाकार नहीं है, उस दिन वर्तमान सरकार एकदम गिर जायेगी। जब तक यह अदा है, तब तक तुम शोषण सहोगे, अत्याचार सहोगे, भ्रष्टाचार सहोगे - क्योंकि तुम क्रोध से उबलोगे, तुम्हारा प्रधानमन्त्री एक अदा से तुम्हे ठंडा कर देगा। तुम जानकर आश्चर्य होगा कि तुम्हारे मुल्क की सारी व्यवस्था एक अदा पर टिकी है।
प्रधानमंत्री ने कहा - 'टैक्स दो' और तुम देने लगे। प्रधानमंत्री ने कहा - 'बजट ठीक है' तुमने कहा - 'बिलकुल ठीक है'। उनने कहा - 'दूसरी योजना के लिए त्याग करना पड़ेगा', तो तुमने कहा - 'लँगोटी उतरवा लो।'
और अब तुम्हारे प्रधानमन्त्री ने कहा कि दो साल बाद तुम्हारी हालत सुधर जायगी।
तुमने बात मान ली। तुम अदा पर मरते हो।

- अरस्तू की चिट्ठी १
(परिवर्तन, 01.जून.1957)

-हरिशंकर परसाई

राजेश सक्सेना

स्त्री के संघर्ष की गाथा प्रागैतिहासिक है । तब तुलनात्मक पुरूष के स्त्री बराबर की भागीदार थी । सहभागी रही । वह सहअस्तित्व के सिद्धांत पर सत्तासीन थी । पर समय का पहिया घूमता गया और लिखित अथवा ऐतिहासिक काल के आते-आते स्त्री के वजूद पर पुरूष का हस्तक्षेप बढ़ने लगा । जो स्त्री अपने वजूद को लेकर प्रारंभ से ही स्पष्ट रही शनैः शनैः पुरूष के आधिपत्य को स्वीकारने लगी । उनमें यह भाव और आगे आकर ज्यादा ही बलवती होती रही । वह रक्षात्मक होने लगी । या कह सकते हैं सुरक्षा के लिहाज से ही सही पर दासत्व भाव उनमें पनपने लगा । पर यह पूरा का पूरा सच भी नहीं है । चूंकि तब भी स्त्री में संघर्ष और अपनी मुक्ति की कामना मौजूद थी , और रही । उनमें कुशल नेतृत्व क्षमता का विपुल भंडार था । जिसका कि रजिया बेगम , रानी लक्ष्मीबाई , रानी अवंती बाई के नेतृत्व से लेकर आज तक विभिन्न राष्ट्रों के शीर्ष पदों को सुशोभित कर चुके विदुषियों के ताकतों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । ये भी आसमान से उतरी कोई उड़नपरी थी न कोई जादुई  जिन्न । ये भी हमारी- तुम्हारी तरह बच्चा जनने वाली स्त्रियां ही थी। हमारी-तुम्हारी तरह तमाम तरह के परिवारिक, समाजिक और राजनैतिक दायित्वों का निर्वहन करती स्त्री थी । हां जरूर ये कोई पद्मावती नहीं थीं । और न इन्हें पद्मावती होना चाहिए । एक स्त्री  में केवल और केवल पद्मावती (जायसी के) का चरित्र जो लोग देखते हैं  वे निश्चित ही ढपोर संघी तथा काम पिपासा से आह्लादित हैं । वे दकियानूस लोग स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर सदैव मंडराते रहे ,पहरेदारी करते रहे । उनका यह ऐतराज स्त्री को उसी तरह देखना और ठिठका हुआ रहना चाहता है जैसा कि बाज़ार की वस्तु को लेकर नज़र -ए -आम है । वे स्त्री के संघर्ष और  मुक्ति की कामना को सिरे से ख़ारिज करने के यत्न में लगे हैं । यद्यपि यहां प्रस्तुत  राजेश सक्सेना की कविता स्त्री के पक्ष से प्रारंभ होती है और प्रथम दृष्टया स्त्री संवेदना पर एक बेहतरीन कविता जान पड़ती है ;  चूंकि स्त्री को लेकर इस कविता में उतनी ही चिंताऐ ,उतना ही कंटेंट समाहित है जितना कि पारंपरिक मूल्य बोध के ठेकेदारों की आवश्यकता है । भय उनकी आवश्यकता का प्रथम सोपान है । और इस पर वे अपनी सफलता की ताकीद मुकर्रर भी करते हैं । राजेश सक्सेना की इस कविता में संवेदना स्तर इतना गहरा है कि थाहना मुश्किल  हो जाता है और व्यक्ति गोते लगाने के उपक्रम पर शामिल रह जाता है ।  कंगना रानावत एक बेहतरीन अदाकारा हैं और स्त्री मुक्ति की कामना को उनकी तमाम गतिशीलता से निश्चय ही बल भी मिलता है ; तो इसमें दिक्कत क्या है ? कवि डर क्यों रहा है ! कंगना न तो उसकी बहन है , न बेटी और न मित्र भी । तो क्या कवि को कंगना अच्छी लगती है इसीलिए मात्र , वह डर रहा है । एक बेहतर स्त्री , एक बेहतर प्रकृति भी है और एक बेहतरीन समाज भी ।उसे बचाए जाने की जिम्मेवारी हम सबका है । पर उस स्त्री के बेहतर को सामने आने से ; क्या एक तरह से उसे, यह रोकने के जैसा नहीं है ?
पूरी कविता में असंगत किस्म का भय मुझे दिख रहा है जो कि कंगना के बहाने स्त्री की स्वतंत्रता व मुक्ति की कामना में शामिल स्त्रियों को समझाने का प्रयत्न प्रतीत हो रहा है अथवा कि उस पर दबाव बनाया जा रहा है या कि उन्हें  डराया जा रहा है । माना कि समय भयानक और बहुत ही बुरा है तो क्या बुरे वक्त के खिलाफ़ 'अच्छे दिनों' की आश की तमाम लड़ाई व यात्राएं स्थगित कर दी जानी चाहिए ?

'तुम्हारे दोषों में शामिल है
तुम्हारा लड़की होना
तुम्हारी हंसी भी खटकती है
बाजवक्त हमारे समय को
सवाल करना तो सबसे 
बड़ा जुर्म है ही स्त्रियों का
यह धरती फट चुकी है
स्त्रियों के सवालों से'

देखा जाए तो यह एक पूरी मुकम्मल कविता की पंक्ति है ।आम स्त्री की कविता है ।
पर---

'पता नहीं क्या तुम्हे कंगना ?'

कह
 राजेश सक्सेना इतने निजी और एकांगिक कैसे हो सके ? जबकि एक होनहार कवि अपनी निजता में भी समाजिक संसार का ताना-बाना और प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करता समाजिक मूल्यों , दायित्वों का बिंब स्थापित करता है ।

'क्यों बोलती हो
अपनी दिक्कतों के बारे में 
आदर्श सुशोभित वाक्यों की आत्मा के
निविड़ एकांत में 
सुस्ता कर रो लिया करो
निथार लिया करो ये खारापन

राजेश का यह व्ययंग भाव पूरी तरह, स्त्री के पक्ष का होकर भी उसका नहीं रह जाता । बल्कि इसके उलट एक विदुषी व विद्वान स्त्री के मनोबल को कमज़ोर करने लगता है ।

Friday, December 11, 2020

आशीष त्रिपाठी

हिंसा अपने किसी भी रूप में रहे बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है । भय और अक्रांतकारी सत्ता अपने राजनीतिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इस बर्बरता का  पक्षकार बराबर बना हुआ है नतीजतन न्याय भी , नाउम्मीदी में बनी हुई है । संवेदना मनुष्य के भीतर नैसर्गिक है । मनुष्य अपने स्वभाविकता में कभी भी उतना उग्र नहीं है जितना कि अन्याय या अप्रीतिकर परिघटनाओं के बाद होने लगता है मसलन निर्भया कांड , उन्नाव रेप केस , कि रांची में हुई घटना को लेकर होता दिखा । वह तब और अधिक उग्रता में देखा गया कि उसने न्यायिक प्रक्रिया की लचरता से आजिज़ आ , पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर को भी जायज माना । हालांकि यह दुखद पहलू है कि वह न्याय प्रणाली से और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनासक्त हुआ। लेकिन इनघटनाओं-परिघटनाओं के विपरीत एक कवि ने उसे , स्त्री को उनकी सार्थक समाजिक सरोकार से वंचित रखे जाने के षडयंत्र के रूप में देखा है और कहा --- 

बेटियों डरना मत
इसलिए हो रहा है यह सब
कि तुम लौट जाओ
घर की कैद में
पर तुम्हें बढ़ना है आगे
मुकाबला करना है

 यह कविता उन्हें लेकर , उनसे जुड़ी तमाम चिंताओं को लेकर, पूर्णतः स्त्री अस्मिता को लेकर है  । एक पिता की चिंता , एक भाई की चिंता , एक पूरे परिवार की चिंता भी इस कविता में अभिव्यक्त होता है । कविता केवल बलात्कार को ही लेकर लिखी बिल्कुल भी नहीं है । परन्तु कवि ने इस कविता को सम समायिक बलात्कार की घटनाओं से जोड़ इसकी व्याप्ति को और अधिक व्यापक किया । किसी कवि की कविता में मौजूदा समय का भान और भविष्य की संभावनाओं की संकल्पना उसके काव्य संप्रेषण को अधिक पुष्ट बनाती है । यह इस कविता के भीतर मौजूद है । 
कवि में एक ओर जहां स्त्रियों से साहस से उठ खड़े रहने का आग्रह है वहीं उस समय और स्थिति को देखने की आकुलता है , प्रतीक्षा है । उनके लौटने में लौटना वैसे नहीं है , जैसा भय से उत्पन्न लौटने में होगा । वे साफ़ और मुखर हो कहते हैं 'लौटना'

पर हत्यारों के भय से नहीं
अपनी काम खत्म कर लौटना वापस
मैं सदियों तक उस घड़ी का इंतजार करूंगा

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...