Friday, March 26, 2021

प्रतिरोध के प्रति उदासीन जनता अपना ही बेड़ा गर्क करती है

साथी हिमांशु कुमार गांधीवादी चिंतक तथा सामाजिक कार्यकर्ता हैं । जनता के काफी निकट और पक्षधर होकर भी वास्तविक सच को नकारते नहीं । वे कहते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में क‌ई नामचीन हस्तियों का जो हश्र हुआ उसके लिए कोई सरकार या सत्ता कि विपक्षी राजनीतिक दल दोषी नहीं थे । जिसे वे एक  सामान्य सी कहानी के माध्यम से साफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं । वस्तुत: हम लगातार हताश निराश जनता शोर-शराबा तो बहुत करते हैं पर जब घड़ी निर्णायक स्थिति को अपनी विजय में बदल पाने के लिए आती है तब सही कार्रवाई से खुद को अलग कर जनतंत्र का गला घोंटने में मददगार बन जाते हैं । यह हमारे लिए ज़लालत भरा काम है । आओ साथियों पुनर्विचार करें और अपनी गलतियों को सुधारें निकट विधानसभा चुनाव में नीति का वरण करें , दुर्नीति का त्याग करें , ताकि स्वस्थ्य समाज के निर्माण में हम ईमानदार और कारगर बन सकें ।
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पिछली बार ईरोम शर्मिला चुनाव हार गई,

सोनी सोरी चुनाव हार गई,

दयामनी बारला चुनाव हार गईं,

मेधा पाटकर चुनाव हार गईं,

खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते ?

तो उस फ़कीर ने कहा कि तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. 

पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है 

और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है .

धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . 

उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं .

 ० Himanshu Kumar की वाल से साभार.

अस्मिता और पहचान

अस्मिता और पहचान की राजनीति ने देश को न सिर्फ धार्मिकता और अंधविश्वास के गर्त में ढकेला, बल्कि जाति और श्रेष्ठता बोध के रास्ते हमें काफी संकीर्ण और संकुचित भी बना दिया . यह यही न संभल कर , इस कदर हमें तुच्छ और तुष्टिकरण के मार्ग में ले गया है कि हम जातिवाद जातिबोध के बैनर उठाये हिंसक हो बैठे हैं. यह समाज के लिए अनुपयोगी तो है ही देश को तोड़ने वाला भी है. साथी हिमांशु कुमार का यह पोस्ट विचार और दृष्टि से आज पुनर्विचार की मांग कर रहा है कि हम कुछ तो सुधरें कुछ तो बदलें . 

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अस्मिता और पहचान की राजनीति की एक सीमा होती है,

दलित अस्मिता,आदिवासी अस्मिता, अल्पसंख्यक अस्मिता आन्दोलन की ज़रुरत तो है,

लेकिन इंसान को अस्मिता के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है,

दलित, आदिवासी, ओबीसी, अल्पसंख्यक को रोज़गार,शिक्षा तरक्की की ज़रुरत भी है,

अस्मितावादी आन्दोलनों के साथ मेरे दोस्ताना सम्बन्ध रहे हैं,

मुझे यह देख कर बेचैनी होती है कि इन आंदोलनों में कुछ लोग अतिवादी हो गए हैं,

ये लोग अपनी समूह अस्मिता के अलावा दूसरी अस्मिता और पहचानों से नफरत करने लगते हैं,

यहाँ तक कि मैंने कुछ दलित अस्मितावादियों में जाटव कार्यकर्ताओं को बाल्मीकियों के खिलाफ लिखते देखा है,

अनेकों कार्यकर्ता तो इतिहास के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं,

व्हाट्सएप पर गलत जानकारियों से भरे मेसेज पढ़ कर उनकी नफरत और गहरी हो गयी है,

जाति मुक्त और साम्प्रदायिकता मुक्त समाज बनाने की जगह जातिगत घृणा फैलाई जा रही है,

गांधी के खिलाफ भयंकर माहौल बनाया जा रहा है,

पिछले दिनों भंवर मेघवंशी भाई बता रहे थे कि गांधी की मृत्यु के बाद अम्बेडकर साहब वहाँ पहुँच गए और आधी रात तक वहीं गांधीजी के शव के पास बैठे रहे,

आंबेडकर साहब गांधी की शव यात्रा में पैदल चल कर गए,

लेकिन आज संघी गांधी के खिलाफ कम ज़हर उगलते हैं खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले गांधी के खिलाफ ज्यादा घृणा फैला रहे हैं,

कई  बार खुद को अम्बेडकरवादी कहने वाले जाकर भाजपा और शिव सेना में शामिल हो जाते हैं,

अम्बेडकर जातिनाश चाहते थे,

लेकिन कुछ लोगों ने अम्बेडकर को किसी ख़ास जाति की दूकान में बिकने वाले माल की तरह एकाधिकार कर लिया है,

मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ क्या यह मेरा अपराध है ?

क्या इसलिए मैं अम्बेडकरवादी नहीं हो सकता क्योंकि मैं किसी ख़ास जाति में पैदा नहीं हुआ ?

कुछ लोग तो इतना ज़हरीला लिख रहे हैं और सारी ज़िन्दगी आदिवासियों दलितों और अल्पसंख्यकों की समानता के लिए काम करने वाले और कुर्बानियां देने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की जातियों के कारण उनकी आलोचना कर रहे हैं,

यह तो जातिवाद को बढाने वाली हरकत ही है,

देश भर के वंचित और शोषित लोगों की समस्याओं को समझना और उनके आन्दोलनों की आपसी एकता एक ज़रूरी काम है,

लेकिन ऐसा करने की बजाय अगर आप नफरत फैलाने को फायदे का काम समझ रहे हैं,

तो आप अपने न्याय की लड़ाई को ही नुकसान पहुचाएंगे,

सुरेश शर्मा

सुरेश शर्मा बीसवीं सदी के नवें दशक के कवि हैं । मानवीय मूल्यों के स्थापत्य के प्रति कटिबद्ध तथा निरंतर चिंतनशील कवि हैं । उनकी रचनाशीलता समाज सापेक्ष घटनाओं- परिघटनाओं से जुड़कर सामाजिक ताना-बाना का न सिर्फ रचाव करती है , बल्कि समाजोपयोगी जरूरतों का ख्याल रख , ईमानदार सामाजिकता अथवा कि मानवीय सरोकार के भी होते हैं । यानी उसका कायांतरण वे जिस सरल-सुलभ ,अनूठे सौन्दर्य बोध में रचते हैं बतौर पाठक मुरीद होना ही , होता है । हालांकि तमाम सहमति-असहमति के, बतौर ग़ालिब कहें तो

'ग़ालिब' बुरा न मान जो वाइज़ बुरा कहे 
ऐसा भी कोई है कि सब अच्छा कहें जिसे "

 चचा ग़ालिब के इस शेर का उद्धरण मैं इसलिए ही दे पा रहा हूँ कि इतनी बेहतरीन भाव ,संवेग , कला , सौंदर्य दृष्टि , जीवन बोध जिनकी कविताओं में हो , वह कवि आखिर परिदृश्य पर उस तरह से क्यों नहीं देखा जा सका , जिस तरह से समकालीन साथी देखे जा सके हैं ? तो इसका एक बड़ा कारण एक तो यह है कि कि सुरेश शर्मा की कविता में अधिक मानवीय तटस्थता है । जीवन को अधिक व्यवहारिक रूप में देखने का तटस्थ नजरिया है । तथा दूसरा बड़ा कारण हिंदी का दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी है कि हिंदी समाज में मान का व्यक्ति पूजन नजरिया , व्यक्ति केन्द्रित और ईर्द-गिर्द का है । जिसका कि ड्रा बैक इस रूप में सामने आता है । एक संपन्न और समृद्ध कला अपने कलावादी मानकों से अधिक ससंपन्न, परिष्कृत,और समृध्द तो दिखता है परन्तु वह मुकाबले अपाहिज और विपन्न इसलिए है कि पक्ष में स्पष्टता का अभाव प्रतीत होता है । यह तब हो रहा है जब हम एकांगी हो बहुविध, बहुरंग को नकार गए होते हैं । तथापि अब कहना न होगा कि हिंदी कविता में ठहराव या कि संकुचन की इस प्रवृत्ति का प्रभाव उसके नकार की प्रवृत्ति खेमों के , विचारों के , आग्रहों के प्रचलन में साफ़ और स्पष्ट रूप में पहले से कहीं अधिक गहराए हुआ दिख रहा है । यानी सुरेश शर्मा की कविता का एक बड़ा पाठक वर्ग होने के बावजूद यदि वे नामित नहीं दिखाई देते हैं तो इस तरह के प्रश्न या कि जिज्ञासा का होना लाजिम है ।

यह सच है कि कठिन समय पर सिर्फ अपनी ईमान और निष्ठा ही हमें बचाता है । तमाम छद्म या कि आडंबर स्वत: विरक्ति लिए चला जाता है । उस समय बस!शब्दों का रहता है साथ । शब्द ही बनाए रख सकते हैं विश्वास । कहना ना होगा

"ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार"

बचा पाएगी हमें । 
चूंकि

"कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम 
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम"

 चलेगा ! 
चूंकि छूटे,टेढ़े-मेढ़े सब रास्ते तभी संग साथ होते और रहे हैं जब तक कि चीजें आपसे नियंत्रित होता है अन्यथा सब कुछ तमाम हो जाता है । यह बात और उस समय को एक सजग कवि जल्दी ही समझ जाता है । इसलिए ''वे लोग" उसे क्या नकारेंगे , वह खुद ही

"भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ"

एक पक्षधर कवि का मनोविज्ञान यह बखूबी जानता है , जानता है कि कठिन समय के आगे के दिनों में उसका विश्वास ही मूल्यवान है । इसलिए वह

" ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...! "

और वह भरपूर

"बचा!मंचासीन 
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा.. 
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा.. 
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा

हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!"

फिर 

"सहेजता रहा 
आग और उम्मीद और कोंपल
 का हरापन जो सुरक्षित था अभी" भी

बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास 

‌वस्तुत: यह लौटना है कठिन दिनों में , शब्दों के सहारे शब्दों के साथ लौटना है । 

मनुष्य के जीवन में रिश्ते भी बुनियादी जरुरत की तरह हुए । बुनियादी जरूरतों को मनुष्य ने काफी हद तक अपने ही संघर्ष से हासिल किया । किन्तु रिश्ते को वह प्रयास से कभी हासिल नहीं कर सका । यह संभव भी नहीं है । रिश्ते जज्ब करने की बात है, अनुभूत करने की बात है, यह त्याग और समर्पण तथा मान के मांग के बाद स्वत: करीब आई बात है । हिंदी कविता में कि वैश्विक कविता में जो दर्जा मां को मिली है वह शायद ही किसी और को मिला , मिला भी तो लगभग प्रेम में डूबे प्रेमी जोड़ों को मिला । इन मायनों में पिता संभवतः दूसरे नम्बर पर है । इस बीच पिता पर जो कविताएं मुझे दिखी उसमें नीरज नीर #Vijay Kumar #Rajat Krishna #Mohan Kumar Nagar #Vivek Chaturvedi #Santwana Shrikant मिथिलेश कुमार राय की कविता भी उल्लेखनीय कविताएं हैं । उसी कड़ी में छोटे छोटे टुकड़ों पर लिखी सुरेश शर्मा की यह कविता भी काव्य के संप्रेषण ,संवेदना ,भाषा और शिल्प के मामले में स्तरीय रहकर उनके उपस्थिति-अनुपस्थिति से बने अभावों और प्रभावों का एक रूपक बिंब बनाती है । मसलन कि

"पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े"

 प्रभाव साफ़ है
और अभाव उतना ही स्पष्ट

"फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !"

इसी तरह इस दूसरी , तीसरी कविता में भी

"थे / पिता 
तो अंगूठे पर था जमाना,"

पहले प्रभाव है , उसके बाद अभाव । देखिए

"अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!"

"बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार"

"पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!"

प्रतिरोध का यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह राजनीतिक सत्ता का ही विरोधी रहे । विरोध के लिए सैकड़ों वैकल्पिक मोर्चे हमारे ही आसपास मौजूद हैं । जिसे छूना जरूरी ही नहीं उस पर समान रुप से आक्रमण करना भी आवश्यक है । यानी उनमें से एक ,यह भी है कि जिस पर सबसे अधिक विश्वास किया और उसका ही नेपथ्य में चला जाना है ! बाकी तो यह मंच विदूषकों के अट्टाहस से भरा हुआ है । कहना न होगा कि अभी , इन बहुरुपियों का शिनाख्त बेहद जरूरी के साथ कम मुश्किल काम नहीं है । चूंकि ये वो लोग हैं जो दांए-बांए सबमें खड़े भव्य पुरूषों के यशोगान में मुग्ध हैं । जबकि वस्तुस्थिति यह है कि

देश !
बाजार में बदल रहा था 
बदल रहे थे आँगन और चौपाल 
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी 
और फूहड़ता शनैः शनैः तब्दील हो रही थी 
संस्कृति में

इसलिए सुरेश शर्मा के इस कथन का मान और भी अधिक बढ़ जाता है कि

इस विकट समय में/कौन जतन करें 
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
 थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!

मसलन कि किसान आंदोलन को लेकर जो फब्तियां कसी जा रही है जो अविश्वास पैदा किए जा रहे हैं 

इस विकट समय में/कौन जतन करें

विद्रोह के तरीके और तेवर ईजाद करने के मामले में कुछ टूल्स बड़े मायने रखते हैं ; एक तो कवि की मजबूती के साथ रखा गया कथ्य , दूजा नक्काशी की बारीकियों में यानी करीने से भाव व विचार को बिल्कुल सही-सही जगह रख जाए वह शिल्प । तिसरका उसके टकसाल से सुगठित ढाला गया देशज बिम्ब । जो एक कवि के कविता के भीतर उसके काव्य भाषा , मुहावरों , और कहन की शैली यानी , कथनीयता से आते हैं और काव्य के संप्रेषण को बहुत दूर तक ले जा पाने समर्थ होते है । बताना न होगा कि इस संदर्भ में प्रत्येक कवि का रकबा-खसरा अपना-अपना होता है । यही बात सुरेश शर्मा के विरोध और तेवर के संदर्भ में कहा जाए तो सुरेश शर्मा बिल्कुल ही उन अलहदा कवियों में शुमार हैं जो तेज व्यंग्यात्मकता में शालीन विद्रोह को रचते हैं । मांग के मुकाबले पूर्ति अहम् है । किन्तु जरूरत भर मांग के आगे दरकार भर पूर्ति की संभावनाएं क्षींण हो तो , जो शक्ल से आदमी होगा , भाव विचार से मनुष्य होगा वह , उसके बेचारगी का शोक मनाते कहेगा ही

"राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से"

 वह मांगेगा भी तो

"अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना"

सुरेश शर्मा की इस कविता की भाव भंगिमा जो प्रत्यक्षत: दिख रही है वह करूण तरूणाई में है किन्तु अदृश्य में तथा अप्रत्यक्ष में जो वे कह रहे हैैं वह कम अप्रत्याशित अट्टाहस में, नहीं निकली है । उसके लिए ; जिन्होंने ने हमारे हिस्से की मुट्ठी भर धूप और छांह को कैद कर रखा है, उनके लिए वे कहते हैं

"पृथ्वी 
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी 
जो सुख में दे दुख में काम!"

सुरेश शर्मा की इस कविता के कैनवास को देखें तो यह व्यंजना से कहीं अधिक अभिधा में , शालीन विरोध की साफ़गोई में , सही और जरूरी के चुनाव में है । 

"जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार... 
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की" !

के लिए साफ़ इंकार भी करती है

"ऐसे में 
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !"

सुरेश शर्मा की कविताओं में उनका मानवीय प्रेम का कायांतरण अभिभूत करने वाले हैं । चालू मुहावरों के बनिस्बत साहसी प्रतिरोध का अलख जगाता एक लामबंद सामूहिक चेतना का आविष्कार करता है । अतः प्रचलित चालू मुहावरों के वैशिष्ट्य से आगे

"शुरू करनी ही होगी 
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी 
जो खतरों के भय से"

सुरेश शर्मा की कविता अनुकूलन-प्रतिकूलन के उर्ध्व में खड़े रह , अनुकूल का तलाश तो करती ही है ; प्रतिकूल का तराश करने में भी मुस्स‌असल लिए आरोह में बनी रहती है ।

"पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को 
 और चाहिए संकल्प 
एक जिंदा लड़ाई को"

 वह कैसे ? 
इसका भी , प्रत्युत्तर रचते वे कहते हैं

"कि,जैसे 
भूख को पीठ पर लादे 
संकटों के पहाड़ चढ़ती है 
मजूर औरत की आँखों में 
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है" 

मनुष्य के साहस गाथा का जो बिंब , वृतांत , वृत्त चित्र सुरेश की कविता में आए हैं वह असीमित अपरीमित और पक्षीय विश्वास से आए हैं ।

"कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता 
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है" 

मौजूदा खतरों के जद़ में कौन नहीं है ? बचा कौन है ?? इसकी बेहतर शिनाख्तगी तथा उन शिनाख्त बिंबों के मार्फत सुरेश शर्मा हर-एक को अपने चिंतनशील विचारों से अवगत कराते ,आश को दीप्त रखते हैं । ठीक वैसे ही

जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर 
उड़ान भरती है चिड़िया!

दुनिया उम्मीद पर टिकी है और कायम भी है तो ऐसे विश्वासों से भरे रह सकने के कारण है ; हम कह जाएं तो ग़लत क्या!

असमाजिक तत्वों के जब्बर नुकीले दांत और ख़ूनी पंजों से बेटियों को बचाया जाना जरूरी है । एक कवि की चिंता में यह झलक रहा है कि खटकने लगी है तो निश्चय ही यह हमारी भी चिंता का सबब होना चाहिए । सुरेश शर्मा आम रचाव के इतर गहन मानवीय संवेदना , सावधानी और जरूरतों के कवि हैं जिनकी काव्यात्मकता भी उन आम रचाव के आगे की है ; जो एक रोड मैप तय करती है । चूंकि समय और परिवेश तथा परिस्थितियां अतिरिक्त सतर्कता का आग्रह लिए चौकन्ना रहने का समय है ! कि

लड़कियाँ खिलखिलाती हैं 
सीखते हुए वर्णमाला और 
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है 
आँगन में, मगर सावधान ! 

"यह बाज़ के झपटने का समय है"

कि

"लड़कियाँ गुनगुनाती है 
अम्मा का दुःख बंटाते हुए 
और घण्टियों की रुनझुन 
बज उठती है मन में,मगर सावधान!"

"यह चीतों के घात लगाने का समय है"

कि

"लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा 
और झूमने लगता है हरसिंगार 
मगर सावधान!"

"यह तेजाबी हमलेका समय है"

कि

"लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह 
नापती है ज़मीन,पहाड़ और 
आसमान, मगर सावधान!"

"यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है"

"आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे 
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !"

 यही वह गंभीर सवाल है , प्रश्न है हमारी भाव संवेदना और विचार दृष्टि पर कि सुरेश शर्मा की इस कविता में सवाल के परस्पर जवाब भी अपने समग्र चिंताओं में सन्निहित है । और यह तब तक कि जब तक हमारे भीतर बचा रहेगा कुछ आदिम राग और गंध । ये चिंताएं भी बची रहेगी पूरे जोश ओ खरोश में । हालांकि भाव संवेदना के स्तर पर इस कविता में जो मार्मिकता दिख रही है वह धरातल पर नहीं है यानी हम जितना भी प्रगतिशील होएं , दिखें , जब चुनना हो , तय करना हो हमारी प्राथमिकताएं हमारा विश्वास धरा का धरा रह जाता रहा है । यह सबसे दुखद पहलू है और कवि की कविताई सार्थकता इस बात पर है कि वह शोषित का पक्षकार है शोषक के विरूद्ध है ।

एक आदमी अपने जीवन में यदि नमक को कर्ज अदायगी रूप में चुकाने की जतन और चिंता कर रहा है तो मैं उसके विश्वास का हिमायती होऊंगा , उसकी नेक नीयती का पूरा सम्मान करुंगा कि हमारे भीतर आज भी मनुष्य के नमक और कर्ज के मोल को लेकर गंभीरता बनी हुई है । कोई तो है , जो उसे सस्ते उत्पाद अथवा वस्तु से अलग कर , सचेष्ट मूल्यवान रूप में देख रहा है । इन आशयों से मनुष्य के मनुष्य बने रहने में नमक की बड़ी भूमिका है । इसका होना कितना नितांत और जरूरी है यह इस कविता की केन्द्रीकता है । यकीनन इस जीव जगत में वस्तु , रूप , भाव, विचार के होने को वरीय प्राप्त है । परन्तु यह सचेत होने की बात है कि उसकी अधिकता ज़हर समान होगा , नासूर-सा होगा , अन्धत्व पैदा करेगा ( यह इस कविता में जो नहीं है दर्ज ) यदि नमक को हम सीमित अर्थ और सरोकारों में ले ले तो , कि बहुत ध्वनित अर्थ में ले तो भी यह इसी सैद्धांतिकी का भाग है । पर सुरेश शर्मा इस नकारात्मकता को पीछे ढकेल सकारात्मक बन जिस दृष्टि सम्पन्न चेतना लिए सामने आते हैं वहां हर्ज की क्या गुंजाइश रह जाए , यह तो खुशी देने वाली है । चूंकि सुरेश शर्मा की प्रस्तुत कविता का नमक ,ज़रूरी खारेपन से और जीवन सम्मत विचार में संश्लेषित है । कि वे कहते हैं

"किसी दिन 
समंदर से लूँगा नमक 
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर 
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना" 

यह अभिधा कम व्यंजना और नेकनीयती कामना में 
से तथा उसके वजूद से है कि कवि दर्ज़ करता है

"नमक से ही 
वज़ूद होता है समंदर का 
जैसे हौंसले से पहाड़ का"

चूंकि आज आदमी के भीतर आदमियत की जगह मक्कारी ने ले ली है
तो कहना लाज़िम है

"जीवन में 
यदि बचा रहे नमक 
तो आस बची रहती है 
बची रहती है उम्मीद 
भरोसा बचा रहता है 
आदमी में आदमी का"

तय तो है ही और कहना भी न होगा कि यह जो 'बोओगे वहीं काटोगे' । भद्र होंगे तो भद्रता की प्राप्ति होगी । दुर्जन होओगे तो दुर्जनता की ही प्राप्ति होगी । तब समय कठिन होगा । अतः उस कठिन समय से बचने व उसके आने से पहले सुरेश शर्मा संगत कर सकने पर जोर देते हैं यकीन दिलाते हैं आशा , धैर्य , यश और विश्वास से अर्जित नमक का स्वाद

कठिन दिनों में 
दूर तक साथ देता है नमक 
और उतर जाता है आदमी 
बाढ़,अकाल और आग की नदी से 

इसलिए 
बचाए रखो! 
जैसे बचाए रखता है समंदर 
जैसे बचाए रखता है पहाड़ 

बचाए रखो नमक 
अपने वज़ूद के लिए!!

          

आइए पढ़िए Suresh Sharma की कुछ कविताएँ
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            कठिन समय में 
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कठिन समय में 
बस!शब्दों का रहा साथ
ना सभा-समारोह,ना बहस बौद्धिक
ना छद्म व्यवहार,इसलिए!
भरोसे के कवियों में स्वीकार नही हुआ

कठिन समय में
ना लाल-पीला,ना हरा सलाम 
ना मार्ग वाम,ना दाहिने से काम 
छूटे,टेढ़े सब रास्ते तमाम इसलिए!
भद्रजनों की पंक्ति में शुमार नही हुआ

 कठिन समय 
 के आग दिनों में 
 ना मंदिर में गया ना मस्ज़िद में...! 

बचा!मंचासीन 
भव्य पुरुषों की भव्यता से बचा.. 
रिरियाते विद्वजनों की दीनता से बचा.. 
जो थे 'कापुरुष' उनके पौरुषेय चिंतन से बचा
हर संभव,छल-छद्म और पाखंड से बचा..!

सहेजता रहा 
आग और उम्मीद और कोंपल
 का हरापन जो सुरक्षित था अभी 
बुजुर्गों और बच्चों और पृथ्वी के पास 

कठिन दिनों में 
इस तरह शब्दों का रहा साथ !!

                  पिता
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                    (1)

पिता
घनी छाँह थे !
छाँह में पले-बढ़े, हम हुए खड़े 
फिर/ बड़े..हम इतने बड़े हो गए
कि, पिता स्मृति में खो गए !

                     (2)

थे / पिता 
तो अंगूठे पर था जमाना,
अब! जमाने के अंगूठे पर हम
था, पिता में कितना दम !!

                    (3)

बरसों-बरस रहे,
पिता के कांधे सवार!
घूमे शहर-शहर/ घूमे मेले हज़ार
पिता, एक ही बार..आए कांधे हमार
चले हम हरिद्वार!!

             सच में 
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जब बेहद जरूरी था 
सच के समर्थन में खड़े होना 
सबसे भरोसेमंद जा चुके थे नेपथ्य में 

मंच 
विदूषकों से भरे थे.. 
अट्टाहसों से गूंज रहे थे सभागृह 
और उम्मीद थी जिनसे वे भव्य पुरुषों के
 यशोगान में लीन थे 

देश !
बाजार में बदल रहा था 
बदल रहे थे आँगन और चौपाल 
भाषा अपरिचय की दहलीज पर खड़ी थी 
और फूहड़ता शनै शनै तब्दील हो रही थी 
संस्कृति में

 महानुभाव 
इस विकट समय में/कौन जतन करें 
कि थोड़ी-सी उम्मीद...प्रेम थोड़ा-सा
 थोड़ा-सा भरोसा बचा रह जाए!!
                
               राजन
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राजन!
बहुत कम चाहिए हमें
बहुत भव्य तुम्हारी दुनिया से
अनाज उतना!दे चिड़िया को पेट भर
जल उतना!दे सरोवर अंजुरी भर जितना

पृथ्वी 
सारी तुम्हारी राजन
बस छाँह भर अपनी 
जो सुख में दे दुख में काम!

राजन! भव्य होगा दरबार यकीनन
होंगे वजीर,सेनापति,सभासद-सलाहकार
होगी सेना चतुरंगिणी हाथी-घोड़े,पैदल सवार

मगर क्षमा करें
अभी बेहद जरूरी हैं कुछ काम
मसलन, बचाये रखना है नमक
जो गुम हो रहा जीवन से/बचाये रखनी है आग जो मद्धम हो रही लगातार... 
बचाये रखना है, हँसी बच्चों की !

ऐसे में 
संभव नही किसी मुनादी पर
शाही जलसे में शरीक होना
राजन ! क्षमा करें .. ! !

जैसे उड़ान भरती है चिड़िया
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पंख को चाहिए आकाश
बीज को जमीन
थोड़ा साहस पैरों को 
 और चाहिए संकल्प 
एक जिंदा लड़ाई को

कि,जैसे 
भूख को पीठ पर लादे 
संकटों के पहाड़ चढ़ती है 
मजूर औरत की आँखों में 
उम्मीदें दूब-सी ऊगती है 

कि,अनन्त काल से पृथ्वी को नापता 
एक आदमी,भयावह सुरंग से गुजरता है आंगन में एक टुकड़ा छाँह का ठहरता है 

कि,हवा के बवंडर में फंसी चिड़िया 
एक लड़ाई पंखों से लड़ती है 
बच्चों की चोंच में दाना आस का रखती है 

ख़तरा 
मौजूद है हर तरफ़
सारे सभागार और चौपाल
आंगन और क़िले,ज़द में है ख़तरों के

शुरू करनी ही होगी 
स्थगित यात्राएं,स्थगित थी 
जो खतरों के भय से

जैसे,शुरू करती है मंजूर औरत
जैसे,सुरंग से गुजरता है आदमी
जैसे,बच्चों की आस पर 
उड़ान भरती है चिड़िया!
          

यह चौकन्ना रहने का समय है !
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लड़कियाँ खिलखिलाती हैं 
सीखते हुए वर्णमाला और 
गंध धूपबत्ती की फैल जाती है 
आँगन में, मगर सावधान ! 
यह बाज़ के झपटने का समय है

लड़कियाँ गुनगुनाती है 
अम्मा का दुःख बंटाते हुए 
और घण्टियों की रुनझुन 
बज उठती है मन में,मगर सावधान!
यह चीतों के घात लगाने का समय है

लड़कियाँ बतियाती है
सपनों में, परियों से
बासंती हो जाती है हवा 
और झूमने लगता है हरसिंगार 
मगर सावधान!यह तेजाबी हमलेका समय है

लड़कियाँ बाजवक्त हिरनी होती है
कुलाचों में भरकर इरादे वह 
नापती है ज़मीन,पहाड़ और 
आसमान, मगर सावधान!
यह बेहद चौकन्ना रहने का समय है
             

           माफ़ करना
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माफ़ करना
नवजात शिशुओं
नही बचा पाए दम घुटने से 
कि जब बचाना था तुम्हें,

बचा रहे थे हम
महान देश के महा बाबाओं को!

माफ़ करना
असहाय बेटियों
नही बचा पाए हत्यारों से
कि जब बचाना था तुम्हें,

कोरस गा रहे थे हम
महान देश की महा संस्कृति का!

माफ़ करना
ख़ामोश करदी गई बुलंद आवाजों
कि इस कायर समय के भद्रजन
अपना समर्थन और विरोध भी
सुविधा से करते हैं,

हत्यारे से
सब डरते हैं..!!

         लापता करोड़ बेटियाँ 
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पता नही 
समाज शास्त्रियों की गणना में 
किस तरह शामिल हैं, वे!

दर्ज कितनी-कितनी / लापता कितनी 
वे! जो धरोहर थी सृष्टि की 
बेटियाँ पृथ्वी की !

धूप थी उनके हिस्से की 
उनके हिस्से की हँसी, 
बसन्त था,उनके हिस्से का 
भरापूरा एक आसमान था उनका !

उनके सपने थे / सवाल थे उनके 
आख़िर कौन इच्छाओं से,जन्म ले रही थी वे 
और मार दी गई,कौन इच्छाओं से !

गुनाह नही थी वे..हादसा नही थी.. 
माताएँ थी उनकी..उनके भी जनक थे,
वे!जो धरोहर थी सृष्टि की,बेटियाँ/पृथ्वी की! 

वे होती 
तो करोड़-करोड़ हाथों से 
बुहारती आंगन पृथ्वी का, 
वे होती तो चाँद पर डालती झूले 
लाँघती नदियाँ..पहाड़ और आसमान अंतरिक्ष तक गूंजती उनकी हँसी!

बेटियाँ 
जो गुम हुई नदियों के बहाव में 
बेटियाँ जो राख हुई..ख़ाक हुई आग में 
जाने क्यों लौट रही 
फिर सपनों में बारबार!!
      

                नमक
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 किसी दिन 
समंदर से लूँगा नमक 
और रख दूंगा बेस्वाद जुबानों पर 
कितना नीरस होता है जीवन नमक के बिना

नमक से ही 
वज़ूद होता है समंदर का 
जैसे हौंसले से पहाड़ का 

जीवन में 
यदि बचा रहे नमक 
तो आस बची रहती है 
बची रहती है उम्मीद 
भरोसा बचा रहता है 
आदमी में आदमी का

कठिन दिनों में 
दूर तक साथ देता है नमक 
और उतर जाता है आदमी 
बाढ़,अकाल और आग की नदी से 

इसलिए 
बचाए रखो! 
जैसे बचाए रखता है समंदर 
जैसे बचाए रखता है पहाड़ 

बचाए रखो नमक 
अपने वज़ूद के लिए


हरिओम राजोरिया

कविताएं , मुझे जब तक बेचैन नहीं कर देतीं , किसी जरूरी बातों के लिए उद्देलित नहीं कर देते ; मतलब , बहुत सारी पीड़ाओं और यातना गृह की यातनाओं से मेरे भीतर सिहरन पैदा नहीं कर देती , उस पर एक लफ्ज़ भी बोलना या कि लिखना मेरे वश का नहीं रहता । अमूमन रोज़ दस बीस कविताओं से मेरा वास्ता होता ही है , पर सभी कविताओं के साथ ऐसा नहीं होता , जैसा कि हरिओम राजोरिया की कविताओं से रूबरू होते हुए आज हुआ । हरिओम राजोरिया अशोक नगर इप्का के रंगकर्मी साथी हैं समकालीन हिंदी कविता के नवें दशक की हिंदी कविता से पहचाने गए । वे नासिर अहमद सिकंदर , बुद्धि लाल पाल , शरद कोकास ,आलोक वर्मा , पूर्णचंद्र रथ , शाकिर अली , विजय सिंह , निरंजन श्रोत्रिय , मदन कश्यप , कुमार अंबुज , देवीप्रसाद मिश्र ,  मोहन कुमार नागर के समानांतर जैसे आए हैं , वैसे ही गतिमान बने हुए हैं । बल्कि पहले के मुकाबले अधिक गतिशील और  एक्टिविस्ट की भूमिका में मोर्चा संभाले दिखाई दे रहे हैं । यहां दर्ज कविताएं इसकी ही पुष्टि है । ये कविताएं हमारे समय के सबसे मुश्किल और जटिल दौर की कविताएं हैं । जहां पक्ष और पहचान भी मुश्किल था ।  पर हरिओम राजोरिया ने बहुत खूबी के साथ अपना पक्ष बता दिया है । इस मुश्किल दौर में हरिओम राजोरिया की कविताएं जनता से सीधे रूबरू हो संवाद स्थापित करती हैं । ऐसा इसलिए भी कि इन कविताओं में आज को रचा गया । इस बर्बर समय को रचा गया । मनुष्य के विरुद्ध होने वाली साजिश को रचा गया । हरिओम की इन कविताओं में तात्कालिकता और सपाटबयानी के प्रभाव को लेकर आलोचक खड़े होंगे , कहेंगे इन कविताओं के जीवन व मर्म पर बहस भी छोड़ देंगे ? कालजीवी होने पर संदेह जताते फिरेंगे । मैं फिर कह रहा हूं 'कवि अपने आज को लिखें '
जिन कविताओं में अपना आज नहीं वह कालजीवी भलि कैसे हो सकता है ? आप अपने समय , साक्ष्य , निष्कृष्ट और बर्बर इतिहास के दस्तावेजीकरण को नकार कैसे काल को जीना चाहेंगे । यानी , वे कविताएं ही क्या जिनमें अपने समय के सच और संताप को कहने , जीने का सामर्थ्य भी न रहे । उसके दुख संतापो को देख पाने का सुविचारित नजरिया न रहे ; बल्कि उससे टकराने की जगह घालमेल करते बगल खड़े हो जाए । मूर्त कलाएं कभी फ़ासिज़्म का शिकार नहीं हो सकती , वह विद्रोह पैदा करेगा । चुनौती बनेगा । इन मायनों में निश्चय ही तात्कालिक प्रतिक्रिया अथवा स्टेटमेंट के बरक्स हरिओम राजोरिया की कविताएं सम समायिकता का अतिक्रमण करती हैं और काल को जीती कविताएं हैं ।

   डर लगता है
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कौन नहीं डरता
डराए जाने के बाद
विश्वविद्यालय में निर्दोष छात्र पिटते हैं
और झूठ बोलती है पुलिस
मंत्री जवानों को सलाह देते हैं
तनिक नरमी से काम ले पुलिस

कौन नहीं डरता
अपनी पहचान और चेहरा छुपाए जब
आम जन पर लहराई जाती है लचीली लाठी 
आप पूछ तक नहीं पाते कि क्यों ?
क्यों कर ऐसा होता है कि पूरा तंत्र
एक दिन सत्ता के झूठ में शामिल हो जाता है

कौन नहीं डरता
जब झूठ बोल रहा होता है तंत्र 
और संकट में होता है जन
ऐसे समय में प्रधान कुमार जी 
विचित्र तरह से विचित्र विषयों पर 
करने लगते हैं मन की बात
कभी श्रृंगार करते , कभी जाकेट बदलते
कभी किसी बच्चे के कान उमेठते
टी वी स्क्रीन पर दिखाई पड़ जाते हैं
उधर विश्वविद्यालयों में प्रयोग करती पुलिस
देश के होनहार छात्रों पर 
लाठियां फटकार रही होती है

हो सकता है फिलहाल 
आपको न लगता हो डर
पर एक चालाक न्यूज एंकर की भंगिमाएं
आपको भीतर तक डरा सकती है
जो विद्यार्थियों को नागरिक की तरह नहीं
विधर्मियों की तरह चित्रित कर रहा होता है - 
" एक आंख ही तो गई है
एक हाथ काम नहीं भी कर रहा तो क्या
दूसरा तो अब लगभग ठीक है
दोनों पैर भले ही काम न कर रहे हों
पर चेहरा तो पूरी तरह ठीक है "1

एक दिन ऐसा भी आता है
जब छाता तलवार बना दिया जाता है
और बटुआ पत्थर का ढेला
झूठ को इस तरह परिष्कृत किया जाता है
कि आपको नए सिरे से लगने लगता है डर
आप एक साधारण से नागरिक को
धीरे - धीरे एक दंगाई में तब्दील होते हुए देखते हैं 
तब सचमुच लगता है डर
देश के इस विकृत नव मानस से
प्रधान कुमार जी एक वरिष्ठ दंगाई की तरह
प्रशिक्षु दंगाइयों की ढाल बन जाते हैं
तब वे आम नागरिकों को भी
कपड़ों से पहचानने की बात करते हैं

आप तरह तरह से जय बोल रहे होते हैं
और इस हिंसक जयकारे के बीच
कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं पड़ता
प्रधान कुमार जी जहरीली हंसी हंसते हैं
और इस हंसी की जड़ में कहीं
छुपी होती है हिंसा की प्रेरणा

तब , जब न्याय के पक्ष के लिए
समर्थन में उठते हैं कुछ हाथ
और राजद्रोही के रूप में
चिन्हित कर लिये जाते हैं
तब होती है डर लगने की शुरूवात 
स्वप्न में सुनाई पड़ती है कहीं
हिटलर के फिर लौटने की आहट
तब लगने लगता  है डर
लगातार अपरिचित होते जाते 
अपने ही आसपास से ।
                    
  
                        
            डील
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डील होने ही वाली है
डील अब होकर ही रहेगी
डील तो होनी ही चाहिए
भारत भी चाहता है कि डील हो
अमेरिका भी चाहता है कि डील हो
सारी दुनिया की नज़र डील पर है
फिर दिक्कत क्या है
होने को तो  कुछ भी नहीं 
पर चूकि डील हो ही रही है
इसलिए डील को हो ही जाना चाहिए

डील देशहित में हो रही है
डील होने के लिए ही नहीं हो रही 
कारोबारियों का कारोबार टिका है डील पर
डील पर ही देश का सारा दारोमदार है
डील के लिए राष्ट्र प्रमुख मिल रहे हैं
डील के पक्ष में सटोरिए भी कुछ कह रहे हैं
डील तो अन्ततः होकर ही रहेगी 
बडी अगर न भी हो सकी
तो उससे कुछ  छोटी डील होगी

डील एक तरह का पेंचीदा मसला है
डील भूमंडलीकरण से पैदा हुआ
एक षडयंत्रकारी शब्द भर नहीं है
कहीं भी होती हुई डील में से कुछ 
गडबड होने की गंध आती है

डील होने का मतलब 
अकेली डील होना ही नहीं होता
आप देख पा रहे होते हैं कि
इधर डील हो रही होती है
और उधर दिल्ली में दंगा  ।

         नोमोस्ते इंडिया 
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भाड़े के गायक आए हैं
भाड़े के नर्तक
भाड़े के वादक
स्कूलों से बच्चे छोड़ दिए गए हैं
महंगे स्वागत द्वार बने हैं
तरह तरह से विचित्र सा कुछ हो रहा है
अद्भुत , अविश्वसनीय , अकल्पनीय
इंतजाम से भी बड़ा इंतजाम 
सुरक्षा ही सुरक्षा 
परिंदा पर नहीं मार सकता 
परिंदे की औकात ही क्या है ?

दोस्त आया है
दोस्ती का पैगाम लाया है
हथियार बेचने वाले देश का प्रमुख आया है
उतरते ही साबरमती आश्रम जा रहा है

प्रधान कुमार बोल रहे हैं
प्रधान कुमार को समझने की कोशिश कीजिए
अभिभूत , अचंभित जन सुन रहे हैं

नया इतिहास बन रहा है
मेरे दोस्त ट्रंप 
अमेरिका से सीधे यहां साबरमती पहुंचे हैं
दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में
ये आसमान तक गूंजती हुई आवाज
और प्रेसीडेंट
और फर्स्ट लेडी और परिवार
और ग्रेटर और क्लोजर रिलेशनशिप
हम नमन करते हैं
हम नमस्ते करते हैं
मिस्टर प्रेसीडेंट
इस शंकर भाषा में आपका स्वागत है

नमस्ते स्वीकार करें
एक ने सबसे बड़ी मूर्ति लगाई
और दूसरा हमारे बीच है
हम दोनों एक दूसरे के बीच हैं
मुझे खुशी है
भारत अमेरिका की फ्रेंडशिप गहरी हुई है
फ्रेंड्स 
ट्रंप बड़ा सोचते हैं
फर्स्ट लेडी ट्रंप
आप बच्चों के लिए बड़ा कर रही हैं

इंवाका दोबारा भारत आईं हैं
इनके पति लाइम लाइट से दूर रहते है
उच्चारण की समस्या न होती
तो उनके पति का नाम भी हम लिखते

पूरी दुनिया आपको सुनना चाहती है
माइ फ्रेंड को सुनने ...
नमस्ते ट्रंप
नमस्ते ट्रंप
130 करोड़ भारतीयों का नमस्ते

नोमोस्ते इंडिया !!

         प्रश्न अभ्यास 
       ------------------

दंगे पर कविता लिखिए 
पुलिस की छूट की व्याख्या कीजिए
दंगाइयों के पांच प्रकार बताइए
भक्त से दंगाई होने की आशंका और
संभावनाओं पर विचार कीजिए
हिंसक समय का क्रमिक विकास लिखिए

बच्चों को घृणा करना कैसे सिखाएं
निर्लज्जता से झूठ बोलने की विधियां लिखिए
दंगों में जय बोलने के महत्व 
और गालियों से आक्रमकता पैदा करने के 
प्रयोग पर एक सारगर्भित टिप्पणी करो
चाचाजी पहले अंश कालीन दंगाई थे
उनके पूर्णकालिक दंगाई बनने की यात्रा का
विस्तार पूर्वक चित्रण कीजिए
दो दंगाई विचारकों के नाम बताइए
दंगे और नरसंहार में अंतर स्पष्ट कीजिए

मनुष्य होने की हानियां लिखिए
" दंगा होता नहीं है करवाया जाता है "
इस प्रचलित झूठ पर  निवंध लिखिए
पढ़ो और पढ़ने दो की जगह
लड़ो और लड़ने दो को रेखांकित कीजिए
दंगाइयों को कपड़ों से पहचानने का
सचित्र वर्णन कीजिए

एक प्रतिबद्ध दंगाई की प्राथमिकताएं बताइए
अग्निशमन यंत्र और देशी कट्टे का रेखाचित्र खींचिए
' आभासी भय और दंगा ' 
इस वाक्य की दंगों के संदर्भ में
विस्तार पूर्वक व्याख्या कीजिए
दंगों में प्रयुक्त हथियारों के प्रकार लिखिए
ईट फेंकते दंगाई का भाव चित्रण कीजिए

इस तरह के दंगा केन्द्रित प्रश्न अभ्यास से
अपने कुछ मौलिक प्रश्न तैयार कीजिए ।
                 

  
हमारे मतलब उनके विचार
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हम चाहें तो 
घंटा भर में रास्ता खाली करवा सकते हैं
हम चाहें तो डंडा बजा सकते हैं
आपको पता होना चाहिए 
कि हमने अभी तक कुछ चाहा नहीं
आप अगर कहें तो हम 
यहीं खड़े - खड़े आपका न्याय कर सकते हैं
जब- जब भी न्याय नहीं हो पाता
तो जो होता है वह अन्याय ही होता है

दो महीने से कोई बैठा - बैठा न्याय मांग रहा है
तो न्याय मांगने की भी एक हद होती है
अब आप ही बताओ
किसी भी तरह के नागरिक को 
अपने भीतर की घुटन से बचने के लिए
भारत सरकार ने सड़कें थोड़े ही बनवाईं हैं
कि जब जी चाहे यहां आकर बैठ जाएं
और अपने भीतर की बेचैनी दूर करें

हम गोली भी चलवा सकते हैं 
( हालांकि हम चलवा भी चुके हैं )
पर न्याय नहीं कर सकते
हम बुर्के पर चुटकुले बना सकते हैं
आंदोलन में बच्चो के इस्तेमाल पर
भावुकता से भरा वक्तव्य दे सकते हैं 
कह सकते हैं आपके खाबिंद घर पर हैं
और आप मोहतरमा आप 
आप यहां चौराहे पर आकर बैठी हैं ।

हम अच्छी तरह जानते हैं
और धार्मिक पुस्तकों में भी लिखा है
कि स्त्री की जगह घर में ही है 
पढ़ने और लड़ने की जरूरत नहीं
कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं
न नागरिक कभी थीं 
न नागरिक अभी हो
स्त्री के सड़ने की जगह घर में है ।

नया भारत बन रहा है
...........................

लाचारों की भीड़ में से 
चिन्हित किया जा सकता है आपको
संभव है बगैर सहमति और मर्जी के 
आप ट्रायल पर ले लिए जाओ
नव निर्मित बैक्सीन का टीका
कोई आपके कूल्हे पर ठोककर चला जाये
बन गई है जो बनी हुई व्यवस्था 
इस व्यवस्था ने कितना आसान बना दिया है
कि वे जब चाहें छीन सकते हैं
गरीब-गुरबों से जीने का प्राकृतिक अधिकार 

आप अब नए भारत के नागरिक हैं
इसे डिजीटल इंडिया भी कह सकते हो
यहां आपकी बग़ैर मर्जी के 
सरकार आपका भला कर सकती है
इन्कार करने का 
विकल्प नहीं रहा आपके पास
घंटा और शंख बजाने के विकल्प ज़रूर खुले  हैं

पता नहीं क्या-क्या होने लगा है इन दिनों
एक सुरीले गले वाली  स्त्री 
बार-बार  फ़ोन मिलाती रहती है और फिर फिर
शून्य ब्याज दर पर लोन लेने की सलाह देती है 
वर्क ऐट होम पर सुबह से ही एक पिता 
अपने बेटे को काम करता हुआ देखता है
और उसे एक अंजाना असुरक्षाबोध 
दबे पांव आकर दबोच लेता है
इन दिनों जिस खबर को पढ़ने  को 
आप अखबार खोलते हो
उसी खबर को अखबार से गायब पाते हो

छल बढ़ रहा है
जहां पहले से ही अघोषित कर्फ्यू था
वहां और पुलिस बल बढ़ रहा है
आप सरकार से असहमत नहीं रह सकते 
इस जनतन्त्र में आपको हुंकारें भरने
और जय बोलने का नियमिय अभ्यास होना चाहिए
भीतर एक राष्ट्रभक्ति की लौ जलती रहनी चाहिए 
आपके मन में राष्ट के प्रति
सकारात्मकता और आस्था का भाव होना  चाहिए 

बन रहा है नया भारत
नए भवन , नए पथ , नए कानून बन रहे हैं
खुलता जा रहा है विकास का दरवाजा 
यहां से आप स्मार्ट सिटी में प्रवेश करेंगे 
आप देर रात घर के पलंग पर ही सोयेंगे 
पर सुबह न्यू इंडिया में खुलेगी आपकी आंख ।

                 

       हरिओम राजोरिया

विवेक चतुर्वेदी

'स्त्रियां घर लौटती हैं' विवेक चतुर्वेदी का पहला काव्य संग्रह है जो कि वाणी प्रकाशन न‌ई दिल्ली से प्रकाशित हुआ है।संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए ज्ञात होता है कि विवेक की कविताई न सिर्फ जोड़-घटाव के प्रछन्न से मुक्त है बल्कि एक कवि की शुद्ध-चित्ति की सुदीर्घ बयानी भी है । आशय यह कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई  गुणा-भाग , लाभ-हानि के व्यापारिक हित वाली काव्य-साधना न होकर ;  बल्कि, जिसे मन ने माना , ह्रदय ने जिसकी थाह ली ;  वस्तुत: वह है ।
 यही बात ही उनकी कविताओं में काव्य-सत्य के रूप में आगे आई है  इन अर्थों में मुझे लगता है कि विवेक चतुर्वेदी की कविताई समकालीन चेतना से भी पृथक , हमारे समय के यथार्थ से टकराकर टूटने के अनुभूत सच और उससे उपजी द्वंदात्मकता से , फलीभूत हुई मानवीय संवेदना की कविताएं , अधिक हैं । कहना न होगा इस दानवीय यंत्रणा से भरे इस समय में अच्छा होने-चाहने के तमाम उपाय जब निरर्थकता के कगार में है , और देखने-चाहने के जैसा कुछ होता नहीं दिखाई दे रहा ; तब इस कवि की स्वप्नजीवी मंगल-कामना आश्वस्ति प्रदान करने वाली लगती है ! परन्तु ऐसा सोचना या स्वीकारना भी एक अंतहीन स्थिति के प्राप्य में विकल्पहीनता को परोक्ष बल देता है और संघर्ष के बोध को बाधित करता है । अतः और अक्सर मैं इस विकल्पहीन दशा पर , दिशा की तलाश का हिमायती होता हूं । विपरीत स्थितियों से मुखालिफ़ होने का हिमायती होता हूं । जो विवेक की कविताओं के आस्वाद से भिन्न , एक अलग आस्वाद के मांग की भी हुई है । बावजूद , विवेक की कविताओं के प्रभाव से मैं मुक्त भी नहीं हो पाता हूं और इन चिंताओं से इत्तेफ़ाक रखता हूं क्योंकि विवेक चतुर्वेदी में आस्वाद को लेकर या उसकी मांग पर, धीरता और गंभीरता दोनों हैं ।

विवेक के इस संग्रह की पहली कविता  "स्त्रियाँ घर लौटती हैं" है ! जो अपने शीर्षक के भाववादी रूझान के कारण विमर्श की स्थिति में घिरते-फंसते दिख रही है । यह वाद-विवाद और संवाद की स्थिति को पैदा करती , प्रतीत हो रही है । तो दरअसल विवेक के इस चुनाव में ज्ञान पीछे है और संवेदना आगे । यानी विवेक "संवेदनात्मक ज्ञान" के राह चल प्राप्त हुए श्रम सौंदर्य को प्राथमिक बनाते हैं । जबकि ज्ञानात्मक संवेदन पूरी तरह इसका उलट तब हो जाता है , जब स्त्रीवादी चेतना और रुझान यह कहते हुए दिखाई देंगे और सवाल भी करेंगे कि स्त्रियाँ ही क्यों घर लौटती हैं ? क्या घर सिर्फ पुरूष का ही है ! कि सिर्फ स्त्री ही लौटती है !! या फिर यह स्त्री कहीं भाग गई होती हैं !!! दोनों अपनी जगह हैं । संवेदना जहाँ पहले कथ्य रुप में आएगी वहाँ भावुक हो आएगी । अकथ पीड़ा को दर्ज करती आएगी । जबकि ज्ञान मार्ग से आती संवेदना भावुकता को दरकिनार कर तर्क और स्थापनाओं से चीज़ों को काटने का यथासंभव प्रयास करेगी , और काटेगा ! बावजूद इन सबके महत्वपूर्ण यह है कि कवि की कविता क्या कह रही हैं ?

"स्त्रियाँ घर लौटती हैं
पश्चिम के आकाश में
आकुल वेग से उडती हुई
काली चिड़ियों की पांत की तरह" 

मतलब तय है कि यह सांझ का समय है , गोधूलि का समय है । तमाम व्यवहारिक प्रक्रियाओं के जीवों के लौटने का समय है । यहां , सामान्य और क्रियात्मक अर्थों में 'लौटना' यानी वापसी है और दृश्य ग्रमीण कम महानगरीय अधिक है ।  श्रम-साध्य कामकाजी स्त्रियाँ अपने सफल कार्य निष्पादन के बाद जब, कल-कारखानों से झुंड में निकलती हैं वे और घर को पहुंचती हैं तो उनके पहुँचने में जो असहज और असमान्य बातें हैं वह विवेक चतुर्वेदी की कविताई चेतना को न सिर्फ संवेदित करता है झकझोरता भी है कि आखिर एक स्त्री के रोज प्रति-रोज होने के अर्थ में यह सब शामिल हैं ? तो मैं समझता हूँ कि विवेक इस कविता में कोई स्थायी लकीर की बात नहीं कर रहे होते कि कोई अतिरिक्त महिमामंडन नहीं कर रहे होते हैं ; अपितु वास्तविक परिस्थितियों 
 को बयां करते हैं , जो किन्हीं अर्थों में स्त्री को पारंपरिकता के खोह में बनाए रख , पैठ जमाए बैठी है । चूंकि स्त्री के जीवन में दायित्व से ज्यादा, अपेक्षा की बहुलता भरी है । जो बहुत अप्रत्याशित और विपरीत परिस्थिति को पैदा करने वाले होते हैं । परन्तु इन मायनों में विवेक की स्त्री निसंदेह घर को पहुंचती सेल्फ आईडेंटिटीफाईड है । संघर्ष करती संवेदनशील स्त्री है । जो काम के बाद घर में किस तरह उतरती है ? कैसे आती है ?? यहाँ यह देखा जाए 

"स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है
वह एक साथ आंगन से
चौके तक लौट आती है"

लौट आती है

"स्त्री बच्चे की भूख में'
'रोटी बन कर लौटती है 
स्त्री लौटती है 
दाल भात में... टूटी खाट में 
जतन से लगाई मसहरी में 
वो आंगन की तुलसी 
और कनेर में लौट आती है "

विवेक की कविता किसी ठस्स बौद्धिकता की मांग को पूरी करने के लिए बांडेड न होकर संवेदना से उपजी कविता है । इस कविता में स्त्री का लौटना कोई बांडेशन की तरह नहीं है और न  पूजा की ही तरह है ! यहाँ तो वह "अबला" भी नहीं , अपितु कर्मठ स्त्री है । अत: कविता उसकी उपस्थिति की महत्ता को रेखांकित करने का उपक्रम  जान पड़ता है । एक रचना की पूर्णता के आग्रह में सिर्फ नकार ही नकार उचित नहीं है स्वीकार भी किए जाने चाहिए । हमें यह नहीं भूलना चाहिए स्त्री जब भी लौटेगी अपने घर लौटेगी ! पुरुष जब भी लौटेंगे अपने घर लौटेंगे ! और यदि वह घर उसके अपने न हो तो यह लौटना संभव ही नहीं ही है !!! अत: विवेक की कविता को जरा विवेक के चश्मे में ही उतर कर देखा जाना लाजिम होगा । चूंकि विवेक की 

"स्त्री है... जो प्रायः स्त्री की तरह नहीं लौटती 
पत्नी, बहन मां या बेटी की तरह लौटती है"

किसी दबाव अथवा बांडेड में नहीं बल्कि सेल्फ रेस्पेक्ट और रेसपांसिबल , हो लौटती है उनकी स्त्री वह

"स्त्री है...जो बस रात की नींद में नहीं लौट सकती
उसे सुबह की चिंताओं में भी लौटना होता है"

 यह विवेक की पीड़ा और मर्म को समझने सहायक होगा ! 

"स्त्री चिड़िया सी लौटती है... 
और थोड़ी मिट्टी 
रोज पंजों में भर लाती है
छोड़ देती है आंगन में" 

विवेक की यह स्त्री यकीनन बांड की जगह दायित्व बोध की प्राथमिकी में , स्नेह , प्रेम और ममत्व से भरी छलकती स्त्री है ।
विवेक की कविता आवश्यक कला मांगों के अनुरूप जरूरी आंशिक फैंटेसी का सहारा भी लेती है मसलन कि दृष्ट्या कथनीयता को लें , देखें

"घर भी एक बच्चा है स्त्री के लिए 
जो रोज थोड़ा और बड़ा होता है"

अतः विवेक की कविता का लोक-राग और रंग में जब

"लौटती है स्त्री...
तो घास आंगन की
हो जाती है थोड़ी और हरी
कबेलू छप्पर के रंग
हो जाते हैं जरा और लाल"

इतना कुछ होने के भीतर या कि ; उस सबमें असल स्थापत्य तो यह है

"दरअसल एक स्त्री का घर लौटना
महज स्त्री का घर लौटना नहीं है 
धरती का अपनी धुरी पर
लौटना है"

विवेक की कविताएं यद्यपि 'लाल' नहीं हैं परन्तु लाल रंग का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में उनकी चार-पांच कविताओं में दिखाई दिए । वे उन कविताओं में लाल रंग , लाल मुरूम लाल रूमाल लाल चादर , लाल कालीन , जैसे प्रतीक बिम्बों का प्रयोग करते हैं और कहते हैं कि

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा...
लाल मुरम के रास्ते दूर जाती 
कविता के भीतर की स्त्री को"

 तो इसके माने क्या है ? अब सवाल तो बनेगा ही ! कि लाल मुरूम कविता के भीतर की स्त्री को मार रहा है ? या फिर कविता के भीतर स्थापित कर दी गई 'ढांचागत स्त्री' के मुक्ति की कामना के साथ उसे पुनर्जीवन देने एवं उसमें प्राणवायु भरने का उपक्रम कर रही है ।  विवेक चतुर्वेदी पर मुझे प्रबल विश्वास है कि वे नियतिवादी नहीं हैं , यथास्थितिवाद को पोषित करने वाले कवि नहीं हैं । अपितु प्रगतिशील चेतना के संवाहक हैं और लाल मुरूम कहीं न कहीं इसका ही एक बड़ा पर्याय है । अन्यथा वे यह नहीं ही कह पाते

"अनुभूति के 
भग्न होते दुर्ग तक पहुँचूँगा 
भाषा की सीढ़ियों से 
और पुकारूँगा..." 

उनके इस कथन का आशय में , यथासंभव इधर की स्त्री स्वातंत्र्य बोध की वायवीयता का अस्वीकार जितना है उतना ही उसके निरपेक्ष स्त्री होने के मान का सम्मान भी है । एक स्त्री के दैवीय रुप दर्पण जो कि स्थापित किया जा चुका है उसमें , उसके तलहटी में एक स्त्री का विच्छेदन भंजन है । विवेक चतुर्वेदी की इस कविता की मानें तो एक स्त्री को वे उनके तरलाई में , तरुणाई में और खुरदुरेपन में देखने का एक स्वायत्त नजरिया है । यहां सबसे अधिक जरूरी और उल्लेखनीय बात यह है कि विवेक की स्त्री न देवी है न 'दानव' ।  बल्कि एक जीता-जागता मानव है ।

विवेक के इस संग्रह की अधिकांश कविताओं की केन्द्रीयता में स्त्री ही है । वह स्त्री मां है , बहन है , बेटी है , कामकाजी मजदूरनी है , जीवन रथ को खींच रही एक टायपिस्ट है । दृष्ट्या कविता में मां का वह रूप-सौन्दर्य निखर आता है जिसके हाथ विभेद की गुंजाइश नहीं है , त्याग ऐसा है कि अपने भी हिस्से को बांट प्रसन्न होती जीवनदायिनी है ।

"मां सिंदूरी आम की
फांके काटती
हम देखते रहते
कोई फांक छोटी तो नहीं
पर न जाने कैसे
बिल्कुल बराबर काटती मां
हमें बांट देती"

"खुद गुही लेती"

 कहना न होगा कि विवेक की यह कविता स्मृतिजीवी है । उन स्मृतियों को अपने आज में देख-झांक रही है । परन्तु अतीतजीवी नहीं ; यानी वह नहीं है जो नामवर सिंह ने इस संदर्भ में एक सुंदर बात बहुत पहले कही , कि 

"अतीतजीवी होना मनुष्य को अकर्मण्यता की ओर ले जाता है"

विवेक की कविता का स्त्री यद्यपि अपने काल की सीमाओं से आगे बढ़ , 'अपने पुरुषार्थ' में घर परिवार के सुख-दुख , हर्ष-विषाद से जूझने में वह कहीं साहसी दिखी ,कि स्वाभिमानी हुई किन्तु क‌ई मायनों में वह , अब भी बलात् छली गई है । यह भी विवेक की कविता या कि चिंता में पूरे मानवीय बोध के अधिकार चेतस रूप में है । मसलन कि 

सुनो ! इस सदी में
कितने-कितने पुरूषों ने
देखी है लाल मुरुम बिछने की राह।
ये जो स्त्री सो रही है तुम्हारे बगल में
तुम्हारे तप्त चुम्बन से घुट रही है जिसकी सांस
क्या लाए थे इसे तुम
लाल मुरुम की सड़क से
नहीं.... तुम लाए थे इसे
धन, प्रतिष्ठा ,पद , बल या छल से

विवेक की कविता है तो बड़ी ही सीधी सादी , अभिधात्मक ही है । सीधी समझ की है । परन्तु कहीं कहीं ऐसा भी आभास होता है कि वह सिर्फ उसी तरह का नहीं है जैसा कि हमारी आंखें उसे देख रही है । अतः हमारे समय की कुटिल चालों और कुदृष्टि से बने बहुस्तरीय आंतरिक फांकों को अभिव्यक्त करने उनकी कविता व्यंजना का भी हाथ थामती है , उन गूढ़ भाव रहस्य , प्राग इतिहास की गुफ़ा तक की यात्रा करती है जिसमें 

"लड़की दौड़ती है तो थोड़ी तेज हो जाती है धरती की चाल"

या कि

"औरत टांक रही है बच्चे के अंगरखे पर सुनहरा गोट
और गर्म हो चली है सूरज की आग"

इस तरह से देखें तो विवेक की कविता में समानांतर रेखाओं के इतर अनेक आड़ी-तिरछी एक-दूसरे को काटती तिर्यक रेखाएं भी है , जो चीज़ों की सरल समझ 
के आगे की हैं ।
नैतिकता, स्वतांत्र्यबोध , अभिव्यक्ति के अधिकार के बड़ी बातों के बाहर के सच में छिपा सामंती स्वरूपों को कथात्मक और वाचनीयता में चाल चरित्र छद्म की बेहतर शिनाख्तगी की गई है वह भी बौद्धिक जगत को केन्द्र में रखकर । अच्छी और पठनीय कविता है ।
"दुनिया के लिए जरूरी है" शीर्षक कविता वस्तुत: भौतिक लिप्साओं और स्वार्थ के दलदल से ग्रसित मनुष्य का , मनुष्य और प्रकृति के विरोध में किए गए कारनामों से उत्पन्न हो रही रिक्तियों की चिंता  तथा उन प्रवृत्तियों का नकार है जो परोक्ष-अपरोक्ष मानव व प्रकृति विरोधी है । विवेक कविता के इस पहले स्टैंजे में इसकी भूमिका तय करते हैं कि जरुरी क्या है ? जब हमारे ही हाथों हत्या हमने ही मुकर्रर की हो
 कि बहुत-सी ख़ूबसूरत बातें मिटती जा रही हैं दुनिया से । मसलन

जैसे गौरैया
जैसे कुनकुनी धूप
जैसे बचपन
जैसे तारे
और जैसे एक आदमी , जो केवल आदमियत की ज़ायदाद के साथ जिंदा है" 

के जैसे अनगिन चिंताओं के मध्य विवेक कविता के इस दूसरे अन्य स्टैंजे में  क्या कह रहे हैं ध्यातव्य है और अनुकरणीय भी

"सुनों... दुनिया के लिए ज़रूरी नहीं है मिसाइल
ज़रूरी नहीं है अंतरिक्ष की खूंटी पर
अपने अहम् को टांगने भेजे ग‌ए उपग्रह
जरुरी नहीं है दानवों सी चींख़ती मशीनें
हां... क्यों ज़रूरी है मंगल पर पानी की खोज ? 

कविता में आए सवाल और तथ्य विकास के माडल का विरोध करता है न कि प्रगति के पथ का ।

 'स्त्रियां घर लौटती हैं और अन्य कविताएं' विवेक के इस संग्रह की ख़ासीयत ही यही है कि उन्होंने स्त्री के परस्पर  घर , परिवार , समाज उसके ताने-बाने में छिपी लिप्साओं , छद्मों का यथा तथ्यात्मक बहुआयामी चित्रण पूरी जिम्मेदारी से किया है जो इस संग्रह में 'मां' 'रावण'  'औरत की बात' 'टाइपिस्ट' 'स्त्री विमर्श'  'शोरूम में काम करने वाली लड़की' 'पेंसिल की तरह बरती गईं घरेलू स्त्रियां'  व 'डोरी पर घर' 'पृथ्वी के साथ भी' के विशाल कैनवास पर चहलकदमी करता मुहर लगाती है ।
'दुनिया के लिए ज़रूरी है' कि तरह जरूरी कविताओं की श्रृंखला में 'पिता' 'पेड़ की मृत्यु' 'तुम आये बाबा' 'वर्गवादी'  'गोधूलि' 'लाल रूमाल'  'सुबह होगी...''पसीने से भीगी कविता' मेरे बचपन की जेल' 'पिता की याद'कविताएं अपनी मार्मिकता में अनूठी कविताएं हैं ।  कुल मिलाकर विवेक के इस संग्रह को हिंदी के स्त्रीवादी कविताओं  और मुहावरों के बनिस्बत समग्र स्त्रीकाल दर्शन के रूप में भी देखा जा सकता है । 
                     

कविता- संग्रह- स्त्रियाँ घर लौटती हैं
कवि- विवेक चतुर्वेदी
वाणी प्रकाशन
प्रथम संस्करण-2020
मूल्य-रु 199

  

लोक चेतना

लोक की समझ या कि चेतना में इलीट कभी भी शामिल नहीं है । इसलिए वह हमेशा 'दूसरे तरह' का ही प्रतिद्वंदी रहा । एकदम साफ़ और खुला दिखता हुआ । परन्तु उनसे भिन्न और अमूर्त रूप में असल प्रतिद्वंदी तो वही ही हैं जो लोक के साथ खड़े होने का , दिखने का बेहतर अभिनय कर रहे होते हैं और व्यवस्था के विद्रोही दिखते हुए , व्यवस्था से सुविधाएं प्राप्त करने रत्तीभर संकोच नहीं करते । वे शत्-प्रतिशत सामन्ती मान्यताओं , अवधारणाओं और विश्वासों के पैरोकार हो लोक की प्रथा तथा चेतना को खंडित कर रहे होते हैं । साथी हमें सावधान रहना होगा ।  हमारे यहां लोक के तात्पर्य को जहां तक मैं समझता हूं Vijendra Kriti Oar  ने बहुत ठीक और सारगर्भित ढंग से क्रमबद्ध समझाया है । उनके यहां लोक ग्राम्य जीवन खेतिहर किसान, मजूर तक ही सीमित नहीं है । उससे भी बहुत आगे जाते हुए शहरी निम्न मध्यवर्गीय लोग भी , लोक की श्रेणी में हैं जो उत्पादक के नियोजन जैसे अनेक असंगठित क्षेत्र को अपने  साध्य-असाध्य श्रम से बल प्रदान करते हैं । यह भी , यही पर ही सीमित नहीं है । अपितु स्वनियोजन से जुड़े वे लोग भी शामिल हैं जो रेहड़ी , ठेली ,रिक्शे से भी अपना जीवन गुजर- बसर करते जीवन में सादगी और मनुष्यता को विस्तार देते हैं ।

जसिंता केरकेट्टा

जसिंता केरकेट्टा झारखंड से आती हैं । सुस्पष्ट दृष्टि संपन्न कवि हैं । आदिवासी समाज और उनके दुःख दर्द की व्यापक समझ और चेतना के परस्पर ही वे राष्ट्रीय सामाजिक , आर्थिक , वैश्विक चेतना से भी लैस हैं । समकालीन कवियों की जमात में उनकी उपस्थिति इन अर्थों में ध्यान आकृष्ट कराता है कि वे सतत राजनीति के छद्म चरित्र को अधिक से अधिक केन्द्रीय बनाए हुए हैं । साथी पेशे से पत्रकार हैं । आदिवासी इलाकों में संघर्षरत लोगों के साथ निरंतर उनकी आवाज बने हुए हैं । अतः उनकी  कविताओं में उनके बुनियादी सवाल व संवेदना के समानांतर उनका दर्द भी अधिलिखित रुप में उपस्थित है ।
 

कविता 'राष्ट्रवाद' केवल यह एक कविता ही मेरे उल्लेखित तथ्य को पुष्ट बनाने में एक पूरी और समग्र कविता है कहना ग़लत न होगा । जसिंता कहती हैं

'जब मेरा पड़ोसी
मेरे ख़ून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया'

कविता विस्तार के आधार पर छोटी कविता है , पर बड़े कथ्य और उन्नत शिल्प के कारण अपनी व्यापकता में देश-काल , उसके समाजिक परिदृश्य का सफल रचाव करती है । 

देश के रचनात्मक सामाजिक परिवेश में भला वे कौन लोग हैं जसिंता सवाल करती हैं

'साब ! जहां कुछ भी नहीं पहुंचता
वहां धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुंचता है'

जबकि आवारा पूंजी और 
व्यवस्था पहाड़ के लोगों को बदहाल छोड़ जरुरी और बुनियादी सुविधाओं से दूरी बनाए खनिज संपदाओं के दोहन को ही असली उद्देश्य मानते हैं । स्वार्थ और विष से भरे समाजिक यथार्थ के द्वंदात्मकता में जसिंता का यह कहना गौर ए तलब और दृष्टव्य है

'पहाड़ पर लोग पहाड़ का पानी पीते हैं
सरकार का पानी वहाँ तक नहीं पहुँचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुँचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंँचता
बिजली नहीं पहुँचती इंटरनेट नहीं पहुँचता
वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता'

पहाड़ और पहाड़ के लोगों का अंतर्संबंध के संदर्भ में जब तक आपके पास व्यवहारिक संवेदना नहीं होगा आप इन अंतर्संबंधों की बारीकियों से अर्धज्ञानी ही होंगे और ठीक उतना ही ख़तरनाक जितना एक हाफ 'झोलाछाप' डांक्टर होता है । उनके अंतर्संबंधों की परख सूंघकर जंगल की गंध जो बता सकते हैं , जो नाड़ी छूकर उसकी देह का ताप नाप सकते हैं , उसके चेहरे की रंगत देख उसका मिजाज बता सकते हैं ! असल में , साब ! आप कुछ नहीं जानते ;

'वे पहाड़ के सीने में दिल की तरह तरह बस्ते हैं
जिनके धड़कने से पहाड़ बचे रहते हैं'

आप खालिस लुटेरों की तरह पहाड़ में आते जाते लोग हैं साब ! वाकई आप कुछ नहीं समझते ; यह बखूबी समझते हैं पहाड़ के पहरेदार ! जो कर रहे हैं आपको खबरदार !! 

जसिंता 'पहाड़ के पहरेदार' कविता में व्यवस्था और उनके नुमाइंदों की असलियत को रखते हुए बताती हैं

'पर एक दिन शहर के चौकीदार
अपने मालिक का इशारा पाकर
पहाड़ पर आते हैं
और कई दिनों से भूखे खोजी कुत्ते की तरह
पहाड़ पर अकेली घूमती स्त्री को देख लार टपकाते हैं
स्त्रियों को मांस का लोंधा समझने को अभिशप्त
ये जंगल की स्त्रियों के मांस पर टूट पड़ते हैं
और भोर उठकर पेड़ से शलप उतारने जा रहे
उनके प्रेमियों को गोली मार देते हैं
ये शहर लौटकर गर्व से चिल्लाते हैं
देखो, जंगल से हम माओवादी मारकर आते हैं
 
ये पहाड़ पर अपने तमगे की तलाश में भटकते हैं
और आदमियों का शिकार कर लौटने के बाद
उनकी लाश बिछाकर, शहर से सम्मान लेते हैं
ये कौन हैं?
ये उस जमात के लोग हैं
जो जानवरों का नाम लेकर सदियों से
आदमियों को मारने के अभ्यस्त हैं
काग़ज़ के टुकड़ों के आगे जो
मालिकों के इशारे पर जीवन भर नाचते हैं
और देह के भीतर अपनी ही आत्मा का मुंह
कस कर पट्टियों से बांधते हैं'

बर्बर और अमानवीय व्यवस्था ने पूंजी के समानांतर दहशत गर्दी को बकौल अंजाम पहुंचाने कोई कसर नहीं छोड़ी । उसने वहीं किया , जो पूंजी ने चाहा । जंगल खाली कराए ,जलाए जंगल और मानवीयता को शर्मशार किया । उसने देश के विरुद्ध सेना का प्रयोग कर जता दिया कि उनकी प्राथमिकी में पूंजी है । 

युद्ध का दौर खत्म हो गया
अब सीमा की सेना का रुख उधर है
मेरा स्कूल-कालेज , गांव-घर , जंगल-पहाड़
जिधर है 

(क्रमश: लिखा जाना है) पर हाल फिलहाल पढ़िए जसिंता केरकेट्टा की वे पांच कविताएं जिससे जसिंता को लेकर एक नजरिया बने ।  सस्नेह जसिंता । 
साभार: जानकीपुल

 
राष्ट्रवाद
………..

जब मेरा पड़ोसी
मेरे ख़ून का प्यासा हो गया
मैं समझ गया
राष्ट्रवाद आ गया ।

 
जहाँ कुछ नहीं पहुंचता
……………………………

 
पहाड़ पर लोग पहाड़ का पानी पीते हैं
सरकार का पानी वहाँ तक नहीं पहुँचता
मातृभाषा में कोई स्कूल नहीं पहुँचता
अस्पताल में कोई डॉक्टर नहीं पहुंँचता
बिजली नहीं पहुँचती इंटरनेट नहीं पहुँचता
वहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
 
साब! जहाँ कुछ भी नहीं पहुँचता
वहाँ धर्म और गाय के नाम पर
आदमी की हत्या के लिए
इतना ज़हर कैसे पहुँचता है?
 

 
पहाड़ और पहरेदार
……………………............

पहाड़ के पहरेदार
जन्म से पहाड़ को जानते हैं
सूंघ कर जंगल की गंध बताते हैं
नाड़ी छूकर उसकी देह का ताप
और उसके चेहरे के बदलते रंग बताते हैं
पहाड़ों, पेड़ों, झरनों यहां तक कि
मिट्टी के नीचे दबे कंद मुल के नाम जानते हैं
वे पहाड़ के सीने में दिल की तरह बसते हैं
जिनके धड़कने से पहाड़ बचे रहते हैं
 
पहाड़ों की उम्र क्या है
पूछने पर वे क्या कहते हैं?
उनका प्यार ही पहाड़ की उम्र है
यह प्यार उनके पुरखों के पुरखों के पुरखों से
शुरू होता है
पहाड़ की नसों में पीढ़ी दर पीढ़ी
उनका ही प्यार खून की तरह बहता है
इसलिए पहाड़ सदियों तक जिंदा रहता है
 
पर एक दिन शहर के चौकीदार
अपने मालिक का इशारा पाकर
पहाड़ पर आते हैं
और कई दिनों से भूखे खोजी कुत्ते की तरह
पहाड़ पर अकेली घूमती स्त्री को देख लार टपकाते हैं
स्त्रियों को मांस का लोंधा समझने को अभिशप्त
ये जंगल की स्त्रियों के मांस पर टूट पड़ते हैं
और भोर उठकर पेड़ से शलप उतारने जा रहे
उनके प्रेमियों को गोली मार देते हैं
ये शहर लौटकर गर्व से चिल्लाते हैं
देखो, जंगल से हम माओवादी मारकर आते हैं
 
ये पहाड़ पर अपने तमगे की तलाश में भटकते हैं
और आदमियों का शिकार कर लौटने के बाद
उनकी लाश बिछाकर, शहर से सम्मान लेते हैं
ये कौन हैं?
ये उस जमात के लोग हैं
जो जानवरों का नाम लेकर सदियों से
आदमियों को मारने के अभ्यस्त हैं
काग़ज़ के टुकड़ों के आगे जो
मालिकों के इशारे पर जीवन भर नाचते हैं
और देह के भीतर अपनी ही आत्मा का मुंह
कस कर पट्टियों से बांधते हैं
 
पहाड़ जानते हैं
जीवित आत्माओं का संघर्ष
आत्मा विहीन ऐसी लाशों से है
जिन्होंने खुद को अनवरत बेचा है
जीवन को जुगाड़ ही देखा है
नौकरी करते हुए गुलामी कमाई है
और ऊपर से आदेश आते ही हमेशा
पहाड़ की समृद्ध संस्कृति पर गोली चलाई है
 
ये पहाड़ के कभी नहीं थे
न कभी हो सकेंगे
ऐसे लोगों से पहाड़ के लोग लड़ते हैं
सिर्फ़ इसलिए
कि वे पहाड़ से प्यार करते हैं 

 

 
सेना का रुख़ किधर है ?
………………………….........

युद्ध का दौर खत्म हो गया
अब सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है
 
कौन साध रहा है अब
चिड़ियों की आंख पर निशाना ?
इस समय ख़तरनाक है सवाल करना
और जो हो रहा है उस पर बुरा मान जाना
क्योंकि संगीनों का पहला काम है
सवाल करती जीभ पर निशाना लगाना
 
खत्म हो रही है उनकी
बातें करने और सुनने की परंपरा
अब सेना की दक्षता का मतलब है
गांव और जंगल पर गोलियां चलाना
और सवाल पूछते विद्यार्थियों पर लाठियां बरसाना
 
यह दूसरे तरीके का युद्ध है
जहां संभव है
गांव में बहुतों के भूखे रह जाने का
किसानों के आत्महत्या कर लेने का
और शहर में आधे लोगों का
बहुत खाते हुए , तोंद बढ़ाते हुए
अपनी देह का भार संभालने में असमर्थ
एक दिन नीचे गिर जाने का
और अपनी ही देह तले दबकर मर जाने का
 
किसी युद्ध में बम के फटने से
यह शहर धुआँ-धुआँ नहीं है
यह तो विकास करते हुए
मंगल ग्रह हो जाने की कहानी है
इस विकास में न बच रहे जंगल -पहाड़
न मिल रही सांस लेने को साफ़ हवा
और लोग ढूंढ रहे कि कहां साफ़ पानी है
 
कोई युद्ध न हो तब भी सेना तो रहेगी
आख़िर वह क्या करेगी ?
वह कैंपों के लिए जंगल खाली कराएगी
जानवरों की सुरक्षा के लिए
गांव को खदेड़ कर शहर ले जाएगी
और शहर में सवाल पूछते
गांव के बच्चों पर गोली चलाएगी
 
आख़िर क्यों सीमा की सेना का रुख़ उधर है
मेरा स्कूल-कॉलेज, गांव-घर, जंगल-पहाड़ जिधर है?

 
बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
…………….………………………………

हिटलर की मौत के बाद भी लंबे समय तक
कई घरों में छिड़ी रही एक लंबी लड़ाई
जहां चुप रहने और विरोध न करने के लिए
कई बच्चे अपने पिता को माफ़ न कर सके
वे माफ़ न कर सके उन पड़ोसियों को भी
जो बंद रहे अपने घरों में चुप
दूसरों के लिए सड़कों पर निकल न सके
 
एक दिन युवा सड़कों पर उतरे
अपने पिता और पड़ोसियों के
चुप रहने, प्रतिरोध न कर पाने का प्रायश्चित करने
जिनके लिए उनके पिता न लड़ सके
विश्वविद्यालयों से उनके बच्चे बाहर निकले
मारे गए लोगों को उनका हक दिलाने
 
और फिर एक दिन
जहां ढह गया था युद्ध में
हिटलर का पुराना दफ़्तर
युवाओं की मांगों ने ठीक उसी जगह
मारे गए हर आदमी के नाम का
पत्थर की सिल्लियों वाला विशाल स्मारक बनवाया
 
कुछ लोगों ने मिलकर हर उस घर को ढूंढा
जहां मारे गए लोगों में से कभी कोई रहता था
फिर ऐसे हर घर के सामने
उनके नाम का लोहे का प्लेट लगवाया
और फिर से उनकी यादों को जिंदा करवाया
 
एक आदमी जिसे जर्मनी ने पहले प्यार किया
फिर उसी आदमी से नफरत भी किया
जिसने देश को पूरी तरह गर्त में पहुंचाया
आज ठीक वैसा ही एक आदमी
जगह और समय बदलकर
एक सी घटनाओं के साथ फिर नजर आया
 
इससे पहले कि वह आदमी
फिर से किसी देश को गर्त में ले जाए
इससे पहले कि पीढ़ियों को सदियों तक
उसके पापों का प्रायश्चित करना पड़े
इससे पहले कि बच्चे अपने पिता
और पड़ोसियों को
चुप रहने और प्रतिरोध न करने के लिए
कभी माफ़ न कर सके
उस आदमी में बसे हिटलर को
पूरी ताकत के साथ
उसकी असली जगह दिखा देनी चाहिए ।
 

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...