Monday, December 28, 2020

परसाई : अरस्तू की चिठ्ठी १

हरिशंकर परसाईं हिंदी व्यंग विधा में पितृ पुरूष की तरह ख्याति अर्जित किए  । उनका हर-एक , कहा-लिखा समय आने पर शिलालेख की तरह चमचमाती हुई दिखी । अब इस 'परिवर्तन' के लिए लिखा उनका अरस्तू की चिट्ठी - १ को ही देखिए आज के राजनीतिक सत्ता तथा उसके छद्म आचरण का यह कितना जीवंत रुप है । सत्ता की शक्ति पर काबिज होने की मंशा का भला इससे बढ़िया उदाहरण क्या होगा ? कितना सटीक और नंगा यथार्थ प्रस्तुत करते हैं हरिशंकर परसाई कि मुरीद हुए बगैर नहीं रहा जाता ‌।

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तुम्हारे प्रधानमन्त्री में यह अदा है। इसी अदा पर तुम्हारे यहाँ की सरकार टिकी है, जिस दिन यह अदा नहीं है या अदाकार नहीं है, उस दिन वर्तमान सरकार एकदम गिर जायेगी। जब तक यह अदा है, तब तक तुम शोषण सहोगे, अत्याचार सहोगे, भ्रष्टाचार सहोगे - क्योंकि तुम क्रोध से उबलोगे, तुम्हारा प्रधानमन्त्री एक अदा से तुम्हे ठंडा कर देगा। तुम जानकर आश्चर्य होगा कि तुम्हारे मुल्क की सारी व्यवस्था एक अदा पर टिकी है।
प्रधानमंत्री ने कहा - 'टैक्स दो' और तुम देने लगे। प्रधानमंत्री ने कहा - 'बजट ठीक है' तुमने कहा - 'बिलकुल ठीक है'। उनने कहा - 'दूसरी योजना के लिए त्याग करना पड़ेगा', तो तुमने कहा - 'लँगोटी उतरवा लो।'
और अब तुम्हारे प्रधानमन्त्री ने कहा कि दो साल बाद तुम्हारी हालत सुधर जायगी।
तुमने बात मान ली। तुम अदा पर मरते हो।

- अरस्तू की चिट्ठी १
(परिवर्तन, 01.जून.1957)

-हरिशंकर परसाई

राजेश सक्सेना

स्त्री के संघर्ष की गाथा प्रागैतिहासिक है । तब तुलनात्मक पुरूष के स्त्री बराबर की भागीदार थी । सहभागी रही । वह सहअस्तित्व के सिद्धांत पर सत्तासीन थी । पर समय का पहिया घूमता गया और लिखित अथवा ऐतिहासिक काल के आते-आते स्त्री के वजूद पर पुरूष का हस्तक्षेप बढ़ने लगा । जो स्त्री अपने वजूद को लेकर प्रारंभ से ही स्पष्ट रही शनैः शनैः पुरूष के आधिपत्य को स्वीकारने लगी । उनमें यह भाव और आगे आकर ज्यादा ही बलवती होती रही । वह रक्षात्मक होने लगी । या कह सकते हैं सुरक्षा के लिहाज से ही सही पर दासत्व भाव उनमें पनपने लगा । पर यह पूरा का पूरा सच भी नहीं है । चूंकि तब भी स्त्री में संघर्ष और अपनी मुक्ति की कामना मौजूद थी , और रही । उनमें कुशल नेतृत्व क्षमता का विपुल भंडार था । जिसका कि रजिया बेगम , रानी लक्ष्मीबाई , रानी अवंती बाई के नेतृत्व से लेकर आज तक विभिन्न राष्ट्रों के शीर्ष पदों को सुशोभित कर चुके विदुषियों के ताकतों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है । ये भी आसमान से उतरी कोई उड़नपरी थी न कोई जादुई  जिन्न । ये भी हमारी- तुम्हारी तरह बच्चा जनने वाली स्त्रियां ही थी। हमारी-तुम्हारी तरह तमाम तरह के परिवारिक, समाजिक और राजनैतिक दायित्वों का निर्वहन करती स्त्री थी । हां जरूर ये कोई पद्मावती नहीं थीं । और न इन्हें पद्मावती होना चाहिए । एक स्त्री  में केवल और केवल पद्मावती (जायसी के) का चरित्र जो लोग देखते हैं  वे निश्चित ही ढपोर संघी तथा काम पिपासा से आह्लादित हैं । वे दकियानूस लोग स्त्री की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर सदैव मंडराते रहे ,पहरेदारी करते रहे । उनका यह ऐतराज स्त्री को उसी तरह देखना और ठिठका हुआ रहना चाहता है जैसा कि बाज़ार की वस्तु को लेकर नज़र -ए -आम है । वे स्त्री के संघर्ष और  मुक्ति की कामना को सिरे से ख़ारिज करने के यत्न में लगे हैं । यद्यपि यहां प्रस्तुत  राजेश सक्सेना की कविता स्त्री के पक्ष से प्रारंभ होती है और प्रथम दृष्टया स्त्री संवेदना पर एक बेहतरीन कविता जान पड़ती है ;  चूंकि स्त्री को लेकर इस कविता में उतनी ही चिंताऐ ,उतना ही कंटेंट समाहित है जितना कि पारंपरिक मूल्य बोध के ठेकेदारों की आवश्यकता है । भय उनकी आवश्यकता का प्रथम सोपान है । और इस पर वे अपनी सफलता की ताकीद मुकर्रर भी करते हैं । राजेश सक्सेना की इस कविता में संवेदना स्तर इतना गहरा है कि थाहना मुश्किल  हो जाता है और व्यक्ति गोते लगाने के उपक्रम पर शामिल रह जाता है ।  कंगना रानावत एक बेहतरीन अदाकारा हैं और स्त्री मुक्ति की कामना को उनकी तमाम गतिशीलता से निश्चय ही बल भी मिलता है ; तो इसमें दिक्कत क्या है ? कवि डर क्यों रहा है ! कंगना न तो उसकी बहन है , न बेटी और न मित्र भी । तो क्या कवि को कंगना अच्छी लगती है इसीलिए मात्र , वह डर रहा है । एक बेहतर स्त्री , एक बेहतर प्रकृति भी है और एक बेहतरीन समाज भी ।उसे बचाए जाने की जिम्मेवारी हम सबका है । पर उस स्त्री के बेहतर को सामने आने से ; क्या एक तरह से उसे, यह रोकने के जैसा नहीं है ?
पूरी कविता में असंगत किस्म का भय मुझे दिख रहा है जो कि कंगना के बहाने स्त्री की स्वतंत्रता व मुक्ति की कामना में शामिल स्त्रियों को समझाने का प्रयत्न प्रतीत हो रहा है अथवा कि उस पर दबाव बनाया जा रहा है या कि उन्हें  डराया जा रहा है । माना कि समय भयानक और बहुत ही बुरा है तो क्या बुरे वक्त के खिलाफ़ 'अच्छे दिनों' की आश की तमाम लड़ाई व यात्राएं स्थगित कर दी जानी चाहिए ?

'तुम्हारे दोषों में शामिल है
तुम्हारा लड़की होना
तुम्हारी हंसी भी खटकती है
बाजवक्त हमारे समय को
सवाल करना तो सबसे 
बड़ा जुर्म है ही स्त्रियों का
यह धरती फट चुकी है
स्त्रियों के सवालों से'

देखा जाए तो यह एक पूरी मुकम्मल कविता की पंक्ति है ।आम स्त्री की कविता है ।
पर---

'पता नहीं क्या तुम्हे कंगना ?'

कह
 राजेश सक्सेना इतने निजी और एकांगिक कैसे हो सके ? जबकि एक होनहार कवि अपनी निजता में भी समाजिक संसार का ताना-बाना और प्रगतिशील मूल्यों की रक्षा करता समाजिक मूल्यों , दायित्वों का बिंब स्थापित करता है ।

'क्यों बोलती हो
अपनी दिक्कतों के बारे में 
आदर्श सुशोभित वाक्यों की आत्मा के
निविड़ एकांत में 
सुस्ता कर रो लिया करो
निथार लिया करो ये खारापन

राजेश का यह व्ययंग भाव पूरी तरह, स्त्री के पक्ष का होकर भी उसका नहीं रह जाता । बल्कि इसके उलट एक विदुषी व विद्वान स्त्री के मनोबल को कमज़ोर करने लगता है ।

Friday, December 11, 2020

आशीष त्रिपाठी

हिंसा अपने किसी भी रूप में रहे बर्दाश्त कर पाना मुमकिन नहीं है । भय और अक्रांतकारी सत्ता अपने राजनीतिक , आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक चरित्र में इस बर्बरता का  पक्षकार बराबर बना हुआ है नतीजतन न्याय भी , नाउम्मीदी में बनी हुई है । संवेदना मनुष्य के भीतर नैसर्गिक है । मनुष्य अपने स्वभाविकता में कभी भी उतना उग्र नहीं है जितना कि अन्याय या अप्रीतिकर परिघटनाओं के बाद होने लगता है मसलन निर्भया कांड , उन्नाव रेप केस , कि रांची में हुई घटना को लेकर होता दिखा । वह तब और अधिक उग्रता में देखा गया कि उसने न्यायिक प्रक्रिया की लचरता से आजिज़ आ , पुलिस द्वारा कथित एनकाउंटर को भी जायज माना । हालांकि यह दुखद पहलू है कि वह न्याय प्रणाली से और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनासक्त हुआ। लेकिन इनघटनाओं-परिघटनाओं के विपरीत एक कवि ने उसे , स्त्री को उनकी सार्थक समाजिक सरोकार से वंचित रखे जाने के षडयंत्र के रूप में देखा है और कहा --- 

बेटियों डरना मत
इसलिए हो रहा है यह सब
कि तुम लौट जाओ
घर की कैद में
पर तुम्हें बढ़ना है आगे
मुकाबला करना है

 यह कविता उन्हें लेकर , उनसे जुड़ी तमाम चिंताओं को लेकर, पूर्णतः स्त्री अस्मिता को लेकर है  । एक पिता की चिंता , एक भाई की चिंता , एक पूरे परिवार की चिंता भी इस कविता में अभिव्यक्त होता है । कविता केवल बलात्कार को ही लेकर लिखी बिल्कुल भी नहीं है । परन्तु कवि ने इस कविता को सम समायिक बलात्कार की घटनाओं से जोड़ इसकी व्याप्ति को और अधिक व्यापक किया । किसी कवि की कविता में मौजूदा समय का भान और भविष्य की संभावनाओं की संकल्पना उसके काव्य संप्रेषण को अधिक पुष्ट बनाती है । यह इस कविता के भीतर मौजूद है । 
कवि में एक ओर जहां स्त्रियों से साहस से उठ खड़े रहने का आग्रह है वहीं उस समय और स्थिति को देखने की आकुलता है , प्रतीक्षा है । उनके लौटने में लौटना वैसे नहीं है , जैसा भय से उत्पन्न लौटने में होगा । वे साफ़ और मुखर हो कहते हैं 'लौटना'

पर हत्यारों के भय से नहीं
अपनी काम खत्म कर लौटना वापस
मैं सदियों तक उस घड़ी का इंतजार करूंगा

Monday, December 7, 2020

त्युंसदे

तेनजिंन त्सुंदे की यह कविता छद्म व कृत्रिमता के आवरण से मुक्त व निरपेक्ष तथा उस स्वीकारोक्ति से संबद्ध है जिसमें एक अजन्मे देश की नासूर टींस व पीड़ा है । तथाकथित संयुक्त राष्ट्र संघ, मानव अधिकार संगठन के होते एक काली निरीह इतिहास है । खानाबदोश व दिन ब दिन पलायन के दंश को अपने भीतर समेटे लोगों की मनोदशा है । त्सुंदे उन्हीं संभावनाओं ,उन्हीं अनुष्ठानों, उन्हीं प्रक्रियागत वस्तुनिष्ठता का स्मरण अपने थके हुए पांवों से कर रहे हैं; तो निश्चय ही उनके इस ठहराव में वह स्पेस है जिसका कि भरा जाना है ।  वे यह क्यों और किस लिए कर रहा है का साइक्लिंग कौतूहल रच दोगले और पिछलग्गू वैश्विक समूह का खबर लेते हैं । राष्ट्र आदमी का पहचान है और राष्ट्रीयता उसका धर्म । हिन्दुस्तान के संदर्भ में भी यह इसी तरह का है । पर तथाकथित राष्ट्रवाद के झंडाबरो ने इसकी अलग ही व्याख्या कर इसके रूप को ढाँचागत अपने फ्रेंम में मढ़ने कोई कसर नही छोड़ा है । राष्ट्रवाद का ऐसा वीभत्स व विकृत रूप आजादी के बाद पहली मर्तबा दिख रहा है। तेनजिंग जहां अपने राष्ट्रीय पहचान की लड़ाई लड़ रहे हैं वही हम अपने सांस्कृतिक पहचान व उसके संघर्ष  के निमित्त भगवा आतंकवाद का लगातार मुकाबला कर रहे है दोनो ही संघर्ष इन अर्थो में  समरूप होते हैं कि  वे मानवीयता को अर्थवान बनाते हैं । त्सुंदे अपनी इस    कविता में थकने की  बात भले कह गए हों पर वे थके कहां हैं ? विचार और संघर्ष कभी खत्म नहीं होते, वह   कभी नहीं थकता, वह सतत प्रक्रियाधीन है ।वह चरम के खिलाफ है,  अनवरत है । त्सुंदे की इस कविता का एक बड़ा पक्ष जो मै देख रहा हूँ  वह यह कि ,वे बजाय स्वप्न जीवी के स्वप्नदर्शी हुए   ।                                (क्रमश: )

दुष्यंत कुमार

दुष्यंत कुमार हिंदी गज़ल के वे गज़लगो हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को उसके पारंपरिक रोमैंटिज्म से मुक्त करा जन पक्षीय चेतना से जोड़ा । आज उर्दू अथवा हिंदी गज़ल का जो रूप हमारे सामने है वह दुष्यंत कुमार जैसे गज़लगो की वजह से है । ऐसा नहीं है कि दुष्यंत कुमार को विरोध का सामना न करना पड़ा , परन्तु आज वे खुद एक आधुनिक ग़ज़ल में परम्परा हैं ।  दुष्यंत कुमार अपनी ग़ज़लों में तत्काल का जिस तरह से अतिक्रमण किए हैं वह आज के परिप्रेक्ष्य में कितना सटीक है कि  कहना हो रहा है  ---

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

Wednesday, December 2, 2020

ganesh gani

अन्याय अथवा असमाजिकता का क्रिया व्यवहार है कि वह नैतिक मूल्यों का अतिक्रमण करें । विजय की लालसा का यह छद्म रूप राजनीतिक , आर्थिक और कुटनीतिक वैभवों के समानांतर ही एक  अविछिन्न सत्ता का संघर्ष-सा है ।  मौजूदा हिंदी कविता और कवि इससे अछूते नहीं हैं । परन्तु न्याय की मांग और उसका प्रतिवादी संघर्ष अपने समय के साक्ष्य बन अपनी सार्थकता को साबित करने प्रत्युत्तर हुआ ही है । यह देशी राग है ।
यह देशी ही है जब अपनी धुन में आए तो एक ही सांस में  कितनों को ठिकाने लगा दे । कितनों की पतलून गीली कर दे , कि नाड़े ही खींच दे । वैसे मैं इसका कभी हिमायती नहीं रहा पर हिंदी में कुछ वरिष्ठ - गरिष्ठ पदार्थों की पतनशीलता मुझे भी उनका प्रतिवादी बनाती है । ठीक वैसे ही जैसे कृष्ण कल्पित , ganesh Pandey अपनी कविताओं में मुखर हो जाते हैं

वरिष्ठ कवियो !

वे जो जिनकी कविताएँ दीवारों पर खुद चुकी हैं
वे जो पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं
वे जो अन्य भाषाओं में अनूदित हो चुके हैं
वे जो छात्रों की भाषा ख़राब कर चुके हैं
वे जो जिनकी प्रतिनिधि कविताएँ कबाड़ी ले जा चुके हैं
वे जो जिन्हें दफ़नाया जा चुका है अपनी क़ब्रों में

कितना लहू पिओगे
कितने युवा कवियों का कलेजा चबाओगे

वरिष्ठ कवियो, जाओ
सुसज्जित सभागारों में आपकी प्रतीक्षा हो रही है
फूलमालायें मुरझा रही हैं आपके इन्तिज़ार में

वे जो जिनकी भाषा एक अरसे से ठहरी हुई है विचार धुंधलाया हुआ है और कल्पनाशक्ति हर-रोज़ क्षीण हो रही है वे जिन्हें रोज़ कच्ची कोंपलें चबाने को चाहिये वे जो अपनी ख्याति के दलदल में धंसे हुये क़दमताल कर रहे हैं

वे जो जिनकी आँखों से लहू नहीं लालच टपकता रहता है हर-घड़ी वे जो किसी असम्भव प्रेम की आशा में अभी भी लिखे जा रहे हैं प्रेम-कविता

वरिष्ठ कवियो, थोड़ा हटो
रास्ता दो युवा कवियों को

एक जो एक मृत चित्रकार के पैसे से हर साल पेरिस में गर्मियाँ गुज़ारता है

एक जो अब भूलता जा रहा है कि जीवन में किन किन स्त्रियों का नमक खाया है

एक बरसों से अचेत है
उसे अचेतावस्था में ही किया गया सम्मानित

एक मुम्बई में घायल है
एक देहरादून के एक होटल में पस्त है

एक जयपुर में उपेक्षित है
एक पटना में सम्मानित है

एक लखनऊ में बांसुरी बजा रहा है
एक भोपाल में चित्रकारी कर रहा है

एक संगीत में डूबा हुआ है एक सिनेमा में
एक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में स्कॉच पी रहा है और दूसरा लक्ष्मी नगर में ठर्रा

आदिवास का एक कवि किसी आदिवासी की हत्या से नहीं
किसी पेड़ से पत्ते झरने से व्यथित होता है

एक कवि कथाकारों की बस्ती में फ़रारी काट रहा है
एक को अभी-अभी निगमबोध घाट पर जला कर आ रहे हैं

एक जो किसी रामानन्द की लात  की प्रतीक्षा में
मणिकर्णिका घाट की सीढ़ियों पर लेटा हुआ है बरसों से

एक गठिया से परेशान है एक आंधासीसी का शिकार है
एक को नोबेल का शक पड़ गया है

एक ग़ालिब की आड़ में जिन्ना की भाषा बोलने लगा है
एक ने कब लिखी थी कविता उसे याद नहीं

जिसकी एक भी पंक्ति नहीं बची
उसके पास सर्वाधिक तमगे बचे हुये हैं

वरिष्ठ कवियो, जाओ
अपनी-अपनी क़ब्रों में अपने-अपने तमगों के साथ सो जाओ अब अधिक धूल मत उड़ाओ

कृपया जाओ
खिड़की से धूप आने दो
और मुझे खींचने दो चिल्ला !

कविता : साभार गणेश गनी

Tuesday, December 1, 2020

तगड़ा कवि

कविता में दम है तो , यह मायने ही नहीं रखता कि उसे किसने लिखा ! पर इस कविता में आए भाव व विचार उस कवि के प्रति मुझे कृतज्ञ बना जाता है । अमूमन हिंदी कविता में वैचारिक आग्रह की कविताएं चुनौती की कविताएं रही है , प्रतिवादी कविताएं हुई  । जो अपने साहस व सामर्थ्य से हिंदी को एक विजन तक ले जाती रही है । इस कवि की कविता भी उसी बड़े विजन का भाग है । उसी का ही एक विस्तृत फलक है । कवि के चैलेंजिग साहस को देख लगता है कवि जरुर कोई तगड़ा कवि होगा । हाल फिलहाल दिल्ली में डटे हुए साथियों का आदर करते  और शहीद किसान भाई को श्रद्धांजलि देते , इस कवि को पढ़ें ,गुनें  ; उस तगड़ा कवि की हिमाकत देखें.   

आलोक धन्वा Madan Kashyap 

          मैं किसान हूँ
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आसमान में धान बो रहा हूँ
कुछ लोग कह रहे हैं
कि पगले! आसमान में धान नहीं जमा करता
मैं कहता हूँ पगले!
अगर ज़मीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो दोनों में से कोई एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा।

युद्ध करूणा का अंत है

यदि आपके पास थोड़ा-सा समय है , थोड़ा-सा धैर्य है , बचा हुआ ! यकीनन , थोड़ी फुरसतिया में हों और ठहर सकें तो ठहरिए , रुकिए और देखिए !! नीलोत्प...